क्या आपने कभी गौर किया है कि कुछ लोग आपसे बात करते समय बार-बार नजरें हटा लेते हैं? वे कभी नीचे देखते हैं, कभी इधर-उधर देखने लगते हैं या लगातार सामने वाले की आंखों में देखने से बचते हैं. ऐसे में अक्सर कुछ लोग तुरंत सोच लेते हैं कि शायद सामने वाला झूठ बोल रहा है, कुछ छिपा रहा है या उसे बात करने में दिलचस्पी नहीं है. लेकिन साइकोलॉजी के अनुसार ऐसा जरूरी नहीं है. आंखों में सीधे न देखना कई अलग-अलग वजहों से हो सकता है और हर व्यक्ति के मामले में इसका मतलब अलग हो सकता है.
साइकोलॉजिस्ट बिंदा सिंहा बताती हैं कि कई बार इंसान किसी मुश्किल सवाल का जवाब सोचते समय सामने वाले की आंखों से नजर हटा लेता है. रिसर्च में पाया गया है कि जब लोगों से कठिन सवाल पूछे जाते हैं, तो वे सोचते समय ज्यादा बार नजरें दूसरी तरफ कर लेते हैं. इससे उन्हें ध्यान लगाने और जवाब याद करने में मदद मिल सकती है. यानी अगर कोई आपसे बात करते हुए अचानक नीचे या दूसरी तरफ देखने लगे, तो जरूरी नहीं कि वह आपकी बात से बच रहा हो. हो सकता है कि वह अपने दिमाग में जवाब तैयार कर रहा हो.
घबराहट भी हो सकती है वजह
कुछ लोग किसी से बात करने में थोड़ा जल्दी घबरा जाते हैं. ऐसे लोगों के लिए लगातार आंखों में आंखें डालकर बात करना असहज हो सकता है. ऐसे व्यक्ति के मन में यह डर हो सकता है कि सामने वाला उसे जज कर रहा है या उसकी बात को गलत समझ सकता है. इसलिए वह नजरें हटाकर खुद को थोड़ा सहज महसूस करने की कोशिश कर सकता है. यह समझना भी जरूरी है कि कम आई कॉन्टैक्ट का मतलब हमेशा शर्मीलापन या आत्मविश्वास की कमी नहीं होता. 2022 की एक रिसर्च में पाया गया कि जिन लोगों ने खुद को आई कॉन्टेक्ट को लेकर ज्यादा मुश्किल बताई, उनके वास्तविक आमने-सामने के व्यवहार में जरूरी नहीं कि ज्यादा नजरें चुराना दिखाई दे.
साइंटिस्ट स्टडी से यह भी पता चला है कि किसी मुश्किल काम या सोचने वाले काम के दौरान नजरें हटाने से बाहरी चीजों से ध्यान थोड़ा हटाकर दिमाग को जरूरी जानकारी पर ध्यान लगाने में मदद मिल सकती है. यही कारण है कि कोई व्यक्ति बात करते समय आपकी आंखों में लगातार देखने के बजाय कभी-कभी दूसरी तरफ देख सकता है और फिर दोबारा आपकी ओर देखने लग सकता है.
लेकिन सामने वाले को गलत संदेश मिल सकता है
दिलचस्प बात यह है कि नजरें न मिलाने का असर सिर्फ नजरें हटाने वाले व्यक्ति पर ही नहीं पड़ता. सामने वाला भी इसे अलग तरीके से समझ सकता है. इसलिए बातचीत में थोड़ा-बहुत आंखों का संपर्क रिश्ते और बातचीत को सहज बनाने में मदद कर सकता है. हालांकि लगातार घूरकर देखना भी जरूरी नहीं है. अगर कोई व्यक्ति आपसे बात करते समय आंखों में नहीं देखता है, तो तुरंत यह निष्कर्ष न निकालें कि वह झूठ बोल रहा है या आपको पसंद नहीं करता.
वह सोच रहा हो सकता है, घबरा रहा हो सकता है, ध्यान लगा रहा हो सकता है या सिर्फ उसकी बातचीत की आदत ऐसी हो सकती है. सबसे सही तरीका है कि उसके पूरे व्यवहार, बातचीत के तरीके और परिस्थिति को देखकर समझने की कोशिश करें. सिर्फ आंखों के संपर्क के आधार पर किसी के बारे में फैसला करना मनोविज्ञान के हिसाब से भरोसेमंद तरीका नहीं है.