सोशल मीडिया खोलते ही किसी की विदेश यात्रा की तस्वीर दिखती है, कोई नया घर खरीदने की खुशी शेयर करता है, तो कोई महंगी कार के साथ फोटो डालता है. किसी की शादी बेहद शानदार नजर आती है, तो किसी की जिंदगी हर दिन खुशियों से भरी हुई दिखती है. इन्हें देखकर कई बार हमारे मन में एक सवाल आने लगता है- आखिर मेरी जिंदगी ऐसी क्यों नहीं है? अगर आपके साथ भी ऐसा होता है, तो इसके पीछे सिर्फ जलन या कम आत्मविश्वास ही जिम्मेदार नहीं है. इसके पीछे हमारे दिमाग का एक खास तरीका काम करता है, जिसे साइकोलॉजी में सोशल कंपेरिजन यानी सामाजिक तुलना कहा जाता है.
साइकोलॉजिस्ट संगीता बंसल कहती हैं कि सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि सोशल मीडिया पर लोग अपनी पूरी जिंदगी नहीं दिखाते. आमतौर पर वही तस्वीर या वीडियो शेयर किया जाता है, जिसमें जिंदगी अच्छी, खूबसूरत या खुशहाल नजर आए. कोई व्यक्ति अपने नए घर की तस्वीर शेयर कर सकता है, लेकिन यह जरूरी नहीं कि वह अपने घर का लोन, तनाव या रोज की परेशानियां भी दिखाए. इसी तरह छुट्टी की खूबसूरत फोटो दिख सकती है, लेकिन उस व्यक्ति की बाकी जिंदगी कैसी चल रही है, इसका पता सिर्फ उस एक तस्वीर से नहीं चलता. यानी हम अक्सर अपनी पूरी जिंदगी की तुलना किसी दूसरे की चुनी हुई कुछ अच्छी तस्वीरों से करने लगते हैं.
दिमाग दूसरों से तुलना क्यों करता है?
इंसान का दिमाग खुद को समझने के लिए दूसरे लोगों से तुलना करता है. हम यह जानने की कोशिश करते हैं कि हम कहां खड़े हैं, दूसरे लोग क्या कर रहे हैं और हमें क्या हासिल करना चाहिए. यही तुलना कई बार हमें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित भी कर सकती है. लेकिन जब हम लगातार खुद की तुलना ऐसे लोगों से करने लगते हैं, जिनकी जिंदगी हमें हर मामले में बेहतर नजर आती है, तो मन में असंतोष पैदा हो सकता है. उदाहरण के लिए अगर आप सोशल मीडिया पर रोज किसी को घूमते, शॉपिंग करते या महंगी चीजें खरीदते देखते हैं, तो कुछ समय बाद आपको अपनी सामान्य जिंदगी फीकी लग सकती है.
अपनी कमियों पर ज्यादा ध्यान जाने लगता है
संगीता बंसल कहती हैं कि दूसरों की उपलब्धियां लगातार देखने से हमारा ध्यान अपनी उन चीजों पर जाने लगता है, जो हमारे पास नहीं हैं. किसी के पास बड़ा घर है तो हमें अपना घर छोटा लग सकता है. किसी की अच्छी नौकरी देखकर अपनी नौकरी कम अच्छी लग सकती है. किसी की फिटनेस देखकर हमें अपने शरीर को लेकर असंतोष हो सकता है. यानी समस्या हमेशा यह नहीं होती कि हमारी जिंदगी अचानक खराब हो गई. कई बार दूसरों की जिंदगी को बार-बार देखने से हमारी अपनी जिंदगी के बारे में सोचने का नजरिया बदल जाता है.
सोशल मीडिया इस तुलना को और बढ़ा सकता है
पहले हम अपने आसपास के कुछ लोगों से ही तुलना करते थे. अब सोशल मीडिया की वजह से हमारे सामने हर दिन सैकड़ों और हजारों लोगों की तस्वीरें और वीडियो आते हैं. किसी की नौकरी अच्छी है, कोई विदेश में रहता है, कोई बिजनेस कर रहा है, कोई रोज घूम रहा है और कोई अपनी सफलता की कहानी बता रहा है. लगातार ऐसी चीजें देखने से ऐसा लग सकता है कि बाकी सभी लोग जिंदगी में आगे बढ़ रहे हैं और हम पीछे रह गए हैं. लेकिन यहां एक बात याद रखना जरूरी है-सोशल मीडिया किसी की जिंदगी की पूरी तस्वीर नहीं दिखाता.
हर तुलना गलत नहीं होती
दूसरों से तुलना हमेशा नुकसानदायक नहीं होती. अगर किसी की सफलता देखकर आपको प्रेरणा मिलती है और आप अपने लिए कोई लक्ष्य तय करते हैं, तो यह तुलना सकारात्मक हो सकती है. समस्या तब शुरू होती है जब तुलना के बाद आपको लगातार लगता रहे कि आप दूसरों से कम हैं या आपकी जिंदगी बेकार है. इसलिए अगली बार सोशल मीडिया पर किसी की शानदार जिंदगी देखकर अपनी जिंदगी को कमतर समझने से पहले यह याद रखें कि आपने उसकी जिंदगी का सिर्फ एक छोटा सा हिस्सा देखा है.