दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट का नाम सुनते ही बर्फ से ढका विशाल पहाड़ और उसे फतह करने वाले पर्वतारोहियों की तस्वीर आंखों के सामने आ जाती है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस चोटी का नाम हमेशा से एवरेस्ट नहीं था?
ब्रिटिश सर्वे टीम ने जब 19वीं सदी में इसकी ऊंचाई और स्थिति का पता लगाया, तो इसे पहले 'पीक XV' कहा गया. वहीं तिब्बत और आसपास के इलाके में इसे 'चोमोलुंगमा' कहा जाता था. बाद में इसका नाम ब्रिटिश सर्वेयर जनरल सर जॉर्ज एवरेस्ट के नाम पर रख दिया गया.
दिलचस्प बात यह है कि जॉर्ज एवरेस्ट खुद इस चोटी को अपने नाम से पुकारे जाने के पक्ष में नहीं थे. वह चाहते थे कि पहाड़ों और दूसरी भौगोलिक जगहों के नाम स्थानीय भाषा और परंपरा के मुताबिक ही रखे जाएं. इसके बावजूद 1865 में दुनिया की सबसे ऊंची चोटी को माउंट एवरेस्ट नाम दे दिया गया.
कैसे पता चला कि यही दुनिया की सबसे ऊंची चोटी है?
1800 के शुरुआती वर्षों में ब्रिटिश सरकार की मदद से ग्रेट ट्रिगोनोमेट्रिकल सर्वे ऑफ इंडिया शुरू किया गया. इस सर्वे का मकसद भारतीय उपमहाद्वीप की जमीन, पहाड़ों और दूसरी भौगोलिक जगहों की सटीक मैपिंग करना था.
इस परियोजना के तहत सर्वेयरों ने लंबे समय तक अलग-अलग इलाकों में माप और गणना की. इसी काम के दौरान 1852 में टीम ने हिमालय में नेपाल और तिब्बत की सीमा के पास मौजूद एक विशाल चोटी की पहचान की. उस समय इसकी ऊंचाई करीब 29,035 फीट मापी गई थी.
शुरुआत में इस चोटी को कोई खास नाम देने के बजाय 'पीक XV' कहा गया. बाद में सर्वेयर जनरल ऑफ इंडिया एंड्रयू वॉ ने सुझाव दिया कि इसे अपने पूर्ववर्ती सर जॉर्ज एवरेस्ट के नाम पर रखा जाए.
कौन थे सर जॉर्ज एवरेस्ट?
सर जॉर्ज एवरेस्ट का जन्म 4 जुलाई 1790 को वेल्स में हुआ था. उन्होंने इंग्लैंड के सैन्य स्कूलों में पढ़ाई की और अपने जीवन का बड़ा हिस्सा भारत में बिताया. उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए काम किया और 1818 में ग्रेट ट्रिगोनोमेट्रिकल सर्वे से जुड़ गए. इस परियोजना में उन्होंने करीब 25 साल तक काम किया. 1823 में उन्हें सर्वे का अधीक्षक बनाया गया और 1830 में वह भारत के सर्वेयर जनरल बने.
1843 में सेवानिवृत्त होने के बाद वह ब्रिटेन लौट गए. उनके काम के लिए 1861 में उन्हें नाइट की उपाधि दी गई. हालांकि, जिस पहाड़ के नाम से आज उन्हें दुनिया भर में जाना जाता है, उसके नामकरण को लेकर उनकी अपनी राय अलग थी.
जॉर्ज एवरेस्ट सर्वे के दौरान स्थानीय नामों को महत्व देते थे. उनका मानना था कि किसी जगह का नाम वही होना चाहिए, जिसे वहां के लोग लंबे समय से इस्तेमाल करते आए हैं.
इसलिए जब एंड्रयू वॉ ने दुनिया की सबसे ऊंची चोटी का नाम ‘माउंट एवरेस्ट’ रखने का प्रस्ताव दिया, तो जॉर्ज एवरेस्ट ने इसका विरोध किया. उनका तर्क था कि स्थानीय नामों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि उनके नाम का उच्चारण स्थानीय लोगों के लिए मुश्किल हो सकता है.
लेकिन इस चोटी के स्थानीय नामों को लेकर ब्रिटिश सर्वे टीम के पास पूरी जानकारी नहीं थी. तिब्बत में इसे 'चोमोलुंगमा' कहा जाता था, जिसका अर्थ है 'विश्व की देवी मां' या 'दुनिया की माता देवी'. नेपाल की ओर इस्तेमाल होने वाले नामों की जानकारी भी सर्वे टीम को नहीं मिल पाई थी, क्योंकि उस समय नेपाल ने ब्रिटिश सर्वे टीम को अपनी सीमा में प्रवेश की अनुमति नहीं दी थी.
फिर कैसे पड़ा माउंट एवरेस्ट नाम?
एंड्रयू वॉ ने 1856 में रॉयल जियोग्राफिकल सोसाइटी को लिखे पत्र में बताया कि वह अपने पूर्ववर्ती जॉर्ज एवरेस्ट से सीख चुके थे कि भौगोलिक जगहों को उनके असली स्थानीय नाम से पुकारना चाहिए. लेकिन इस चोटी का स्थानीय नाम पता करना मुश्किल था और नेपाल में प्रवेश की अनुमति मिलने तक इसका पता लगने की संभावना कम थी.
इसके बावजूद नाम को लेकर चर्चा जारी रही. आखिरकार 1865 में रॉयल जियोग्राफिकल सोसाइटी ने दुनिया की सबसे ऊंची चोटी का नाम ‘माउंट एवरेस्ट’ रखने का फैसला किया.
विडंबना यह रही कि जॉर्ज एवरेस्ट इस फैसले के पक्ष में नहीं थे. वह 1 दिसंबर 1866 को 76 साल की उम्र में चल बसे. यह भी साफ नहीं है कि उन्होंने कभी उस पहाड़ को अपनी आंखों से देखा था या नहीं, जिसके नाम से आज उनकी पहचान दुनिया भर में है.
इस तरह 'पीक XV' के नाम से दर्ज की गई हिमालय की चोटी माउंट एवरेस्ट बन गई. हालांकि, इसके स्थानीय नामों का इतिहास आज भी याद दिलाता है कि किसी जगह की पहचान सिर्फ नक्शे पर लिखे नाम से नहीं, बल्कि वहां के लोगों और उनकी परंपराओं से भी जुड़ी होती है.