सावन का महीना आते ही देशभर में कांवड़ यात्रा की रौनक शुरू हो जाती है. हर साल लाखों शिव भक्त गंगाजल लेकर भगवान शिव का जलाभिषेक करने निकलते हैं. इस दौरान बाजारों में भी कांवड़ की खूब बिक्री होती है. इस बार बाजार में 150 रुपये की साधारण कांवड़ से लेकर 5 लाख रुपये तक की लग्जरी कांवड़ उपलब्ध हैं. कुछ दुकानदारों का दावा है कि खास ऑर्डर पर 10 लाख रुपये तक की कांवड़ भी तैयार की जाती है. कांवड़ लेकर जाने वाले इन श्रद्धालुओं को भी 'भोले' ही कहा जाता है.
गढ़ गंगा और मेरठ के कावड़ बाजारों में दुकानदारों का कहना है कि इस बार सबसे ज्यादा मांग 500 रुपये से 5,000 रुपये तक की कांवड़ों की है. ये कांवड़ वजन में हल्की होती हैं, देखने में आकर्षक होती हैं और लंबी यात्रा के दौरान इन्हें उठाना भी आसान रहता है. हालांकि कुछ श्रद्धालु अपनी श्रद्धा और पसंद के मुताबिक 20 हजार रुपये से लेकर 5 लाख रुपये तक की प्रीमियम कांवड़ भी खरीदते हैं. ऐसी कांवड़ आमतौर पर बड़े कांवड़ दलों या विशेष ऑर्डर पर तैयार की जाती हैं.
लाखों रुपये की कांवड़ में क्या होता है खास?
महंगी कांवड़ सिर्फ सजावट की वजह से महंगी नहीं होती, बल्कि इसमें कई आधुनिक फीचर और महीनों की मेहनत शामिल होती है. इन कांवड़ों में भगवान शिव का दरबार, कैलाश पर्वत, बहता हुआ झरना, 12 ज्योतिर्लिंग, समुद्र मंथन, शिव परिवार, राम मंदिर, केदारनाथ, काशी विश्वनाथ, महाकाल और अमरनाथ गुफा जैसी शानदार झांकियां बनाई जाती हैं. कई कांवड़ों में देशभक्ति की थीम भी देखने को मिलती है, जिसमें तिरंगा, भारत माता और सैनिकों की झलक दिखाई जाती है.
आधुनिक तकनीक से होती है सजावट
आज की प्रीमियम कांवड़ सिर्फ पारंपरिक नहीं बल्कि तकनीक से भी लैस होती हैं. इनमें हजारों एलईडी लाइटें, प्रोग्रामेबल लाइट शो, हाई-पावर साउंड सिस्टम, भजन और डीजे सेटअप लगाए जाते हैं. कुछ कांवड़ों में धुएं का इफेक्ट, चलते हुए झरने, घूमता हुआ डमरू और हिलती हुई मूर्तियां भी लगाई जाती हैं. बिजली की व्यवस्था के लिए बैटरी या छोटे जनरेटर का इस्तेमाल किया जाता है. एक लाख या उससे अधिक कीमत वाली कांवड़ तैयार करने में महंगा फाइबर, स्टेनलेस स्टील, एल्यूमिनियम, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और विशेष सजावटी सामग्री का इस्तेमाल होता है.
इसके अलावा डिजाइन तैयार करने, मूर्तियां बनाने, लाइट और साउंड सिस्टम लगाने और पूरी कांवड़ को बैलेंस करने में कई दिनों या हफ्तों की मेहनत लगती है. यही वजह है कि इसकी कीमत लाखों रुपये तक पहुंच जाती है. हालांकि बाजार में सबसे ज्यादा बिक्री 500 रुपये से 10 हजार रुपये के बीच वाली कांवड़ों की ही होती है.
हर साल बदलते हैं डिजाइन
मेरठ के दुकानदार महेश साहनी बताते हैं कि हर साल कांवड़ के डिजाइन बदलते रहते हैं. युवाओं में एलईडी और मॉडर्न थीम वाली कांवड़ का क्रेज तेजी से बढ़ रहा है. वहीं कई श्रद्धालु आज भी पारंपरिक बांस की साधारण कांवड़ को ही पसंद करते हैं. उनका कहना है कि यात्रा बढ़ने के साथ कांवड़ की बिक्री भी तेज हो जाती है.
कांवड़ कौन बनाता है?
कांवड़ यात्रा हिंदू आस्था का प्रतीक है, लेकिन इसे बनाने का काम अलग-अलग समुदायों के कारीगर मिलकर करते हैं. दुकानदार बताते हैं कि कई मुस्लिम कारीगर वर्षों से कांवड़ बनाने का काम कर रहे हैं, जबकि हिंदू कारीगर और दुकानदार भी इसे तैयार करते और बेचते हैं. उनके मुताबिक इस काम में धर्म से ज्यादा हुनर, मेहनत और रोजगार की अहमियत होती है. हरिद्वार, मेरठ, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर और दिल्ली जैसे शहरों में सावन के दौरान हजारों कारीगर दिन-रात कांवड़ तैयार करने में जुटे रहते हैं.
कांवड़ कैसे बनती है?
कांवड़ बनाने की शुरुआत उसके डिजाइन से होती है. सबसे पहले तय किया जाता है कि कांवड़ साधारण होगी, एलईडी वाली होगी या किसी खास थीम पर तैयार की जाएगी. कई बड़े कांवड़ दल पहले से अपना डिजाइन भी दे देते हैं. इसके बाद बांस, लकड़ी, फाइबर, पीवीसी या स्टील से मजबूत फ्रेम बनाया जाता है. फिर उस पर थर्मोकोल, फाइबर शीट या प्लास्टिक की मदद से मंदिर, शिवलिंग, कैलाश पर्वत या दूसरी झांकियों का आकार दिया जाता है. ढांचा तैयार होने के बाद रंगाई की जाती है. फिर कपड़े, फूल, झालर, मोती और अन्य सजावटी सामान लगाए जाते हैं. भगवान शिव, नंदी, त्रिशूल, डमरू और 'ॐ' जैसे धार्मिक प्रतीक भी सजाए जाते हैं.
आखिर में एलईडी लाइट, बैटरी, वायरिंग और जरूरत पड़ने पर साउंड सिस्टम व मोटर फिट की जाती है. पूरी कांवड़ की जांच करने के बाद ही उसे बाजार या ग्राहक तक भेजा जाता है.
एक कांवड़ बनाने में कितना समय लगता है?
साधारण कांवड़ कुछ ही घंटों में तैयार हो जाती है. सजावटी कांवड़ बनाने में एक-दो दिन लगते हैं. एलईडी वाली कांवड़ तैयार होने में दो से पांच दिन का समय लगता है. वहीं, थीम आधारित कांवड़ बनाने में पांच से पंद्रह दिन तक लग सकते हैं. बड़ी प्रीमियम कांवड़ तैयार करने में 15 से 30 दिन या उससे भी अधिक समय लग सकता है.
कितने लोग मिलकर बनाते हैं?
एक बड़ी कांवड़ किसी एक व्यक्ति का काम नहीं होती. इसमें बढ़ई, फाइबर कारीगर, मूर्तिकार, पेंटर, इलेक्ट्रिशियन और सजावट करने वाले कई एक्सपर्ट मिलकर काम करते हैं. महंगी और विशाल कांवड़ तैयार करने में 10 से 20 लोगों की टीम कई दिनों तक मेहनत करती है.
बाजार में मिलती हैं 10 तरह की कांवड़
सावन के दौरान बाजार में हर जरूरत और बजट के हिसाब से अलग-अलग तरह की कांवड़ मिलती हैं.
1. साधारण कांवड़ सबसे सस्ती होती है और बांस या लकड़ी से बनाई जाती है.
2. डेकोरेटिव कांवड़ रंग-बिरंगे कागज, कपड़े और फूलों से सजाई जाती है.
3. एलईडी कांवड़ रात में चमकने वाली रंगीन लाइटों के कारण काफी पसंद की जाती है.
4. झूला कांवड़ में दोनों ओर मंदिर जैसी आकर्षक सजावट होती है.
5. थीम बेस्ड कांवड़ में कैलाश पर्वत, केदारनाथ, काशी विश्वनाथ, महाकाल, राम मंदिर, 12 ज्योतिर्लिंग, शिव परिवार और समुद्र मंथन जैसी झांकियां बनाई जाती हैं.
6. फाइबर कांवड़-मजबूत और लंबे समय तक चलने वाली होती है.
7. प्रीमियम या लग्जरी कांवड़** में एलईडी, साउंड सिस्टम, झरने, फॉग इफेक्ट और चलने वाले मॉडल लगाए जाते हैं.
8. डाक कांवड़ में कांवड़िए बिना रुके दौड़ते हुए गंगाजल लेकर जाते हैं.
9. खड़ी कांवड़ ऐसी होती है जिसे जमीन पर नहीं रखा जाता, बल्कि विशेष स्टैंड पर टिकाया जाता है.
10. विशाल या ग्रुप कांवड़ को कई लोग मिलकर उठाते हैं और इसमें बड़ी-बड़ी झांकियां औक आधुनिक सजावट होती है.
आस्था के साथ हुनर की भी पहचान
सावन में कांवड़ सिर्फ एक धार्मिक प्रतीक नहीं होती, बल्कि यह कारीगरों की मेहनत और कला का भी शानदार उदाहरण है. कोई श्रद्धालु 150 या 200 रुपये की साधारण कांवड़ लेकर यात्रा करता है, तो कोई लाखों रुपये की भव्य कांवड़ के साथ अपनी श्रद्धा व्यक्त करता है. बाजार में हर बजट के लिए विकल्प मौजूद हैं, लेकिन हर कांवड़ के पीछे कई कारीगरों की मेहनत, हुनर और आस्था जुड़ी होती है.