अगर आप अक्सर ट्रेन से सफर करते हैं, तो आपने ट्रेन के गेट के पास लगी एक छोटी सी सीट जरूर देखी होगी. सफर के दौरान कई लोग इस सीट को देखकर सोचते हैं कि आखिर इसे किसके लिए बनाया गया है. क्या यहां कोई यात्री बैठ सकता है या फिर यह टीटीई और रेलवे स्टाफ के लिए होती है? खास बात यह है कि ट्रेन में मौजूद हर सीट यात्रियों के बैठने के लिए नहीं होती. तो गेट के पास लगी इस छोटी सी सीट का असली काम क्या है और कौन इसका इस्तेमाल कर सकता है, आइए आसान भाषा में समझते हैं.
गेट के पास क्यों होती है ऐसी सीट?
ट्रेन के दरवाजे के आसपास रेलवे कर्मचारियों के काम से जुड़ी कुछ जगहें होती हैं. कई कोच में गेट के पास ऐसी सीट या फोल्डिंग सीट भी होती है, जिसका इस्तेमाल ड्यूटी पर मौजूद कर्मचारी कर सकते हैं. इस वजह से इसे देखकर कई यात्री इसे टीटीई की सीट समझ लेते हैं. लेकिन यह कहना सही नहीं होगा कि ट्रेन के हर गेट के पास लगी सीट सिर्फ टीटीई के लिए ही होती है.
क्या आम यात्री वहां बैठ सकता है?
अगर वह सीट कोच की निर्धारित यात्री सीट नहीं है और रेलवे स्टाफ के इस्तेमाल के लिए दी गई है, तो उस पर यात्रियों को कब्जा नहीं करना चाहिए. ट्रेन में हर सीट और जगह का एक तय इस्तेमाल होता है. वहीं, अगर गेट के पास मौजूद सीट बाकायदा यात्री सीट के तौर पर दी गई है और उसका नंबर भी सीटिंग व्यवस्था में शामिल है, तो उस पर वही यात्री बैठ सकता है जिसके टिकट पर वह सीट आवंटित है. यानी सिर्फ गेट के पास सीट देखकर यह मान लेना कि वह टीटीई की है, जरूरी नहीं है. सीट की असली पहचान इस बात से होती है कि वह कोच के किस हिस्से में दी गई है और रेलवे की सीटिंग व्यवस्था में उसका क्या इस्तेमाल निर्धारित है.
टीटीई हमेशा गेट के पास ही बैठता है?
टीटीई की ड्यूटी केवल एक जगह बैठने तक सीमित नहीं होती. वह पूरे कोच में टिकट और यात्रियों की जांच करता है. जरूरत के मुताबिक वह यात्रियों से बातचीत करता है और उनकी समस्याओं को भी देखता है. इसलिए अगर आपको ट्रेन के गेट के पास कोई छोटी सीट दिखाई दे, तो उसे देखकर तुरंत यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं है कि वह केवल टीटीऊ के बैठने के लिए बनाई गई है. अगली बार ट्रेन में गेट के पास ऐसी सीट दिखे, तो उस पर बैठने से पहले यह जरूर देख लें कि वह यात्री सीट है या रेलवे स्टाफ के इस्तेमाल की जगह.