हरिद्वार में हर की पौड़ी पर आमतौर पर आपने क्या देखा होगा? गंगा में डुबकी लगाते श्रद्धालु. हाथों में पूजा की थाली. आरती की घंटियां. हर-हर गंगे के जयकारे. लेकिन 23 अगस्त को यहां नजारा थोड़ा अलग था. लोगों के हाथ में बाल्टियां थीं. मगर इनमें पानी नहीं, दूध था. किसी के हाथ में पिचकारी थी और सामने थीं मां गंगा. फिर शुरू हुई दूध की होली.
देश के अलग-अलग हिस्सों से आए मुल्तानी समाज के लोगों ने हर की पौड़ी पर पहुंचकर मां गंगा के साथ दूध की होली खेली. गंगा में दूध अर्पित किया. एक-दूसरे को गुलाल लगाया. मां गंगा के जयकारे लगाए और देश-दुनिया में सुख-शांति की कामना की. इस परंपरा की कहानी कहां से शुरू हुई? इसका जवाब करीब 116 साल पीछे ले जाता है. कहानी शुरू होती है मुल्तान से. साल था 1911... उस वक्त मुल्तान में लाला रूपचंद नाम के एक व्यापारी रहते थे.
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बताया जाता है कि उनकी दस संतानें थीं, लेकिन उनकी कोई संतान जीवित नहीं बची थी. फिर एक दिन उनकी एक बेटी गंभीर रूप से घायल हो गई. लाला रूपचंद को डर लगा कि कहीं इस बेटी को भी न खो दें.
इसी दौरान उन्हें किसी ने सलाह दी कि अगर वह मुल्तान से पैदल हरिद्वार जाएं और मां गंगा में ज्योत प्रवाहित करें, तो उनकी मनोकामना पूरी हो सकती है. लाला रूपचंद ने यह बात मान ली. मुल्तान से पैदल हरिद्वार के लिए निकल पड़े. मन में आस्था थी और मंजिल थी हरिद्वार. सामने थीं मां गंगा. लाला रूपचंद हरिद्वार पहुंचे और मां गंगा में ज्योत प्रवाहित की. मुल्तानी समाज की मान्यता है कि उनकी मनोकामना पूरी हुई.
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इसके बाद लाला रूपचंद की यह यात्रा सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं रही. धीरे-धीरे यह परंपरा बन गई. फिर पीढ़ियां आती गईं. कहानी आगे बढ़ती गई. मुल्तानी समाज हरिद्वार आकर मां गंगा के सामने अपनी आस्था जताता रहा. आज इसी परंपरा को मुल्तान जोत महोत्सव के नाम से मनाया जाता है. इस साल इसका 116वां आयोजन हुआ.

23 अगस्त को हर की पौड़ी पर देश के अलग-अलग हिस्सों से मुल्तानी समाज के लोग पहुंचे. किसी के हाथ में दूध की बाल्टी थी तो कोई पिचकारी लेकर आया था. गंगा किनारे पहुंचते ही जयकारे लगने लगे. लोगों ने मां गंगा में दूध अर्पित किया. फिर पिचकारियों से दूध की होली शुरू हुई. एक-दूसरे को गुलाल लगाया गया. पूरा माहौल किसी त्योहार जैसा हो गया. इस होली का रंग थोड़ा अलग था. यहां रंगों के साथ आस्था थी. गुलाल के साथ परंपरा थी. और दूध के साथ मां गंगा के प्रति श्रद्धा.
आयोजन में शामिल लोगों ने मां गंगा से देश और समाज की खुशहाली की प्रार्थना की. लोगों ने कामना की कि देश में सुख-शांति रहे, आपसी भाईचारा बढ़े और लोग मिल-जुलकर रहें. साथ ही गंगा को स्वच्छ और निर्मल रखने का संदेश भी दिया गया. दूध की इस होली में सिर्फ धार्मिक आस्था नहीं थी, बल्कि गंगा की स्वच्छता और संरक्षण की बात भी कही गई.
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जिसकी शुरुआत 1911 में एक व्यक्ति की आस्था से हुई थी, वह आज एक बड़े आयोजन का रूप ले चुकी है. लाला रूपचंद शायद उस वक्त नहीं जानते होंगे कि उनकी पैदल यात्रा आने वाली पीढ़ियों के लिए एक परंपरा बन जाएगी. आज भी मुल्तानी समाज के लोग हरिद्वार आते हैं. मां गंगा के सामने ज्योत जलाते हैं. दूध अर्पित करते हैं. दूध की होली खेलते हैं. और उस कहानी को आगे बढ़ाते हैं, जो एक सदी से भी ज्यादा पुरानी है.

हर की पौड़ी पर क्यों जुटी लोगों की नजर?
हर की पौड़ी पर वैसे तो रोज श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है. लेकिन दूध की बाल्टियां और पिचकारियां लेकर पहुंचे लोगों ने सबका ध्यान खींच लिया. लोग रुककर इस अनोखे आयोजन को देखते रहे. गंगा के किनारे दूध की होली खेलते लोगों के दृश्य कैमरों में कैद हुए. हर-हर गंगे के जयकारों के बीच यह आयोजन चलता रहा. और फिर वही मैसेज दोहराया गया- मां गंगा स्वच्छ रहें, देश खुशहाल रहे और समाज में आपसी मेल-जोल बढ़े.