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छोड़ आए हम वो गलियां...

अपने शहर से दूर किसी दूसरे शहर में जाना, पढ़ाई करना कोई आसान काम नहीं होता है. इस दौरान आपको नए शहर के साथ पुराने शहर की यादों के बीच बैलेंस बनाना होता है. जानें ऐसे ही अनुभवों के बारे में.

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12 वीं के रिजल्ट आ गए हैं. हर कॉलेज में एडमिशन भी शुरू हो गए हैं. लाखों बच्चों ने किसा ना किसी कॉलेज या यूनिवर्सिटी में दाखिले का सपना देखा होगा.

कोई कोलकाता से दिल्ली आना चाहता होगा तो कोई दिल्ली से मुंबई. सबकी इच्छाएं हिलोरे मार रही होंगी. नए जगह जाने की एक्साइटमेंट ही कुछ अलग होती है. मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था. मैं कोलकाता से हूं. चूंकि 12वीं में मैंने आर्ट्स लिया था और नम्बर भी अच्छे आए थे तो पापा ने कहा इंगलिश ऑनर्स करो. मेरे पापा इंग्लिश के टीचर हैं इसलिए मेरे पापा की शुरू से ही चाहत थी कि मैं भी लेक्चरर बनूं. मेरे पापा के साथ-साथ मेरे रिश्तेदार भी यही सोचते थे कि आर्ट्स पढ़कर क्या करेगी- टीचर ही तो बनेगी.

लेकिन मेरी चाहत कुछ और थी. मैं क्या करना चाहती हूं, ये कोई नहीं जानता था. किसी ने मुझसे कभी पूछा ही नहीं. मैं बचपन से ही अंतर्मुखी रही हूं. इसलिए बातें दिल में ही रह जाती हैं. पापा मेरा एडमिशन कोलकाता के कॉलेज में करवा रहे थे. बहुत हिम्मत कर के मैंने कह दिया मुझे इंगलिश ऑनर्स नहीं, जर्नलिज्म करना है. पापा ने कहा एंकर बनना है तुम्हें? आज हंसी आती है सोच के कि पापा की भी यही सोच थी कि जर्नलिज्म का मतलब सिर्फ एंकर बनना होता है. पापा ने कहा- नहीं, इन सब पचड़ों में मत पड़ों. सीधी-सीधी पढ़ाई करो और टीचिंग लाईन में जाओ.

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मैं भी कम जिद्दी नहीं थी. कहा- करूंगी तो सिर्फ जर्नलिज्म वो भी यहां से नहीं दिल्ली से. सब मुझे ऐसे देखने लगे जैसे बिजली गिर गई हो. सबने कहा- पागल हो गई है, दिल्ली जाने की बात कर रही है. मैंने सोचा आज के समय में दिल्ली जाना कौन सी बड़ी बात है. बहुत जिद्द करने के बाद पापा से जवाब मिला- मैं एडमिशन करवाने दिल्ली नहीं जाऊंगा, जो करना है अकेले करो. मुझमें भी जोश की कोई कमी नहीं थी. जो करने की ठान ली वो तो कर के ही दम लेती हूं. मैंने भी कह दिया-हां पैसे दे दो कल ही निकल जाऊंगी. सब मेरा जोश देखकर हैरान थे. सबने सोचा इस चुपचाप सी रहने वाली लड़की में अचानक ऐसे तेवर कैसे आ गए. खैर काफी कोशिशों के बाद पापा मान गए और मुझे एडमिशन टेस्ट के लिए दिल्ली लेकर आए.

पता नहीं कब मेरे मन में पत्रकार बनने की इच्छा जागी, लेकिन बचपन से ही लीक से हटकर कुछ करने का जुनून था. अगर किसी ने कह दिया कि तुम्हें ये ही काम करना है तो मैं वो काम करना बिल्कुल भी पसंद नहीं करती थी. दिल्ली की चकाचौंध से भी मैं बहुत प्रभावित थी. कहते है ना दूर का ढोल सुहावना होता है. सबसे बड़ी बात थी कि मुझे आजादी चाहिए थी. होता है ना एक 'कूल फैक्टर'. वही मेरे लाइफ से मिसिंग था.

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एक महीने बाद मुझे दिल्ली के लिए रवाना होना था. लेकिन एडमिशन होने के बाद ही मेरी सारी खुशी रफूचक्कर हो गई. कारण थी मेरी मां. मां का रोना शुरू हो गया था. उनकी बिटिया एक महीने बाद उनसे दूर जो होने वाली थी. उन्हें देखकर मेरी भी कूल बनने की इच्छा धरी रह गई और मैं अब चाहती थी कि किसी तरह मेरा एडमिशन कैंसिल हो जाए. मैं भी अब अपने मां से दूर नहीं जाना चाहती थी. लेकिन अब मैंने वो शहर, वो घर छोड़ दिया है. हां, अब एक साल हो गए हैं मुझे दिल्ली आए, लेकिन अब भी मां को याद कर के मेरी आंखें भर आती हैं.

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