तहलका पत्रिका के फाउंडर तरुण तेजपाल को 2013 के कथित यौन उत्पीड़न मामले में बरी किए जाने के खिलाफ गोवा सरकार की अपील पर बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा पीठ में गुरुवार से अंतिम सुनवाई शुरू हो गई. सुनवाई के पहले दिन तेजपाल की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आबाद पोंडा ने अदालत में दलील दी. उन्होंने कहा कि शिकायतकर्ता (पीड़िता) के बयानों में कई अहम विरोधाभास हैं और अभियोजन पक्ष की कहानी तकनीकी साक्ष्यों, सीसीटीवी फुटेज और गवाहों के बयानों से मेल नहीं खाती.
होटल के लिफ्ट की सीसीटीवी दिखाई
मामले की सुनवाई जस्टिस डॉ. नीला गोखले और जस्टिस अमित एस. जमदार की खंडपीठ कर रही है. यह अंतिम बहस तीन दिनों तक चलेगी, जिसके बाद अदालत फैसला सुरक्षित रख सकती है. सुनवाई के दौरान उस होटल की लिफ्ट के सीसीटीवी वीडियो भी अदालत में चलाए गए, जहां कथित घटना हुई थी. इन वीडियो को केवल अदालत कक्ष में मौजूद लोगों को ही दिखाया गया.
लिफ्ट में क्या हुआ था? बचाव पक्ष ने दी दलील
बचाव पक्ष की ओर से आबाद पोंडा ने कहा कि उपलब्ध वीडियो फुटेज और तकनीकी साक्ष्य शिकायतकर्ता के आरोपों की पुष्टि नहीं करते. उन्होंने दावा किया कि जांच अधिकारी के सामने दिए गए बयान और ट्रायल के दौरान अदालत में दिए गए बयान में कई महत्वपूर्ण अंतर हैं. पोंडा ने विशेष रूप से शिकायतकर्ता के शुरुआती आरोपों का जिक्र करते हुए कहा कि उसने दावा किया था कि तरुण तेजपाल ने लिफ्ट के बटन इस तरह दबाए कि लिफ्ट लगातार चलती रही और किसी भी मंजिल पर नहीं रुकी. आरोप यह भी था कि लिफ्ट के दरवाजे बंद रखकर उसे अंदर फंसा लिया गया था.
बचाव पक्ष ने कहा कि ट्रायल के दौरान पेश किए गए लिफ्ट विशेषज्ञ, होटल सुरक्षा कर्मियों और पुलिस अधिकारियों की गवाही इस दावे का समर्थन नहीं करती. पोंडा ने अदालत को बताया कि विशेषज्ञ ने स्पष्ट कहा था कि अगर लिफ्ट का इमरजेंसी स्टॉप बटन दबाया जाए तो लिफ्ट निकटतम मंजिल पर जाकर स्वतः रुकती है और उसके दरवाजे अपने आप खुल जाते हैं.
उन्होंने यह भी कहा कि अगर कोई व्यक्ति लगातार 'क्लोज डोर' बटन दबाए रखे, तब भी लिफ्ट किसी मंजिल पर पहुंचने पर उसके दरवाजे पूरी तरह खुल जाते हैं. ऐसे में शिकायतकर्ता की ओर से बताई गई घटना तकनीकी रूप से संभव नहीं थी. पोंडा ने यह भी दलील दी कि जिरह के दौरान शिकायतकर्ता का बयान बदल गया. पहले उसने कहा था कि कई बटन दबाए गए थे, जबकि बाद में उसने कहा कि केवल एक बटन दबाया गया और आरोपी का हाथ कंट्रोल पैनल पर था. बचाव पक्ष ने इसे कथित घटनाक्रम से मेल न खाने वाला और "पूरी तरह असंभव" बताया.
नहीं मिली पहली मंजिल की सीसीटीवी रिकॉर्डिंग
बचाव पक्ष ने अदालत को यह भी बताया कि कथित दो मिनट की घटना के दौरान लिफ्ट कम से कम दो बार अलग-अलग मंजिलों पर खुली थी. इसके अलावा जांच अधिकारी ने भी स्वीकार किया था कि पहली मंजिल की सीसीटीवी रिकॉर्डिंग डीवीआर में उपलब्ध नहीं थी. पोंडा ने इसे महत्वपूर्ण साक्ष्य की कमी बताया.
उन्होंने यह भी कहा कि उपलब्ध सीसीटीवी फुटेज से यह साबित नहीं होता कि शिकायतकर्ता को दोबारा लिफ्ट के अंदर खींचा गया था या लिफ्ट से बाहर निकलने के बाद तरुण तेजपाल उसका पीछा कर रहे थे. बचाव पक्ष के अनुसार, फुटेज में तेजपाल शिकायतकर्ता से आगे चलते हुए दिखाई देते हैं.
वहीं, गोवा सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने लगातार यह रुख अपनाया है कि शिकायतकर्ता एक विश्वसनीय गवाह हैं और लंबी जिरह के बावजूद उनके आरोप कमजोर नहीं पड़े. उनका कहना है कि निचली अदालत ने साक्ष्यों और गवाहों का सही तरीके से मूल्यांकन नहीं किया और इसी वजह से तेजपाल को बरी किया गया.
यह मामला नवंबर 2013 का है, जब तेजपाल की एक पूर्व महिला सहयोगी ने आरोप लगाया था कि गोवा के एक पांच सितारा होटल की लिफ्ट में आयोजित 'तेहलका' कार्यक्रम के दौरान तरुण तेजपाल ने उसके साथ यौन उत्पीड़न किया. तेजपाल ने शुरू से ही इन आरोपों से इनकार किया है.
गौरतलब है कि मापुसा की सत्र अदालत ने वर्ष 2021 में तरुण तेजपाल को सभी आरोपों से बरी कर दिया था. इसके बाद गोवा सरकार ने इस फैसले को बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा पीठ में चुनौती दी. अब हाईकोर्ट को यह तय करना है कि निचली अदालत का फैसला बरकरार रखा जाए या उसे रद्द कर मामले में नया निर्णय दिया जाए.