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अभिजीत दिपके नहीं, मोहम्मद इरफान हैं CJP प्रोटेस्ट का हासिल, हाशिए पर खड़े लोगों की बने आवाज

दिल्ली की पुनर्वास कॉलोनी में रहने वाले 35 वर्षीय फेरीवाले मोहम्मद इरफान इन दिनों सोशल मीडिया पर चर्चा का केंद्र बने हुए हैं. कभी स्कूल नहीं जाने वाले इरफान ने गूगल और यूट्यूब के जरिए संविधान, लोकतंत्र और मजदूरों के अधिकारों की समझ विकसित की. जंतर-मंतर पर उनके भाषण ने लाखों लोगों को प्रभावित किया. वायरल होने के बाद राहुल गांधी भी उनसे मिलने उनके घर पहुंचे और संसद आने का निमंत्रण दिया.

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जंतर-मंतर पर 'द लल्लनटॉप' के रजत पांडे के साथ मोहम्मद इरफान (दाएं) का इंटरव्यू इंटरनेट पर वायरल हो गया. (Photo: ITG)
जंतर-मंतर पर 'द लल्लनटॉप' के रजत पांडे के साथ मोहम्मद इरफान (दाएं) का इंटरव्यू इंटरनेट पर वायरल हो गया. (Photo: ITG)

जब मोहम्मद इरफान बोलना बंद हुए, तब 'द लल्लनटॉप' के पत्रकार रजत पांडे के रोंगटे खड़े हो चुके थे. रजत पांडे नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन को कवर करने पहुंचे थे. उन्हें उम्मीद थी कि यह भी नारों, भाषणों और राजनीतिक बयानबाजी वाला एक सामान्य विरोध प्रदर्शन होगा. लेकिन 20 जुलाई को सुरक्षा बलों की कार्रवाई के बाद जब भीड़ में मौजूद नीली टी-शर्ट पहने एक युवक उनके पास आया, तो पूरी कहानी ही बदल गई.

रजत पांडे ने आजतक से बातचीत में कहा, 'जब वह बोल रहा था तो सचमुच मेरे रोंगटे खड़े हो गए थे. लोग अक्सर वैचारिक बातें करते हैं, लेकिन इरफान की बातों में कोई दिखावा नहीं था. उसने जो कहा, उसे उसने खुद जिया था. यही वजह है कि बोलते समय वह कहीं भी नहीं अटका. यह मेरे करियर का सबसे बेहतरीन इंटरव्यू था.' सिर्फ रजत पांडे ही नहीं, सोशल मीडिया पर इंटरव्यू देखने वाले लाखों लोग भी भावुक हो गए. हर किसी को सबसे ज्यादा हैरानी इस बात पर हुई कि मोहम्मद इरफान कभी स्कूल ही नहीं गए.

बिना स्कूल गए संविधान और लोकतंत्र की बात

दिल्ली की एक पुनर्वास कॉलोनी में रहने वाले 35 वर्षीय फेरीवाले मोहम्मद इरफान पढ़े-लिखे नहीं हैं. उन्होंने अपनी अधिकांश जानकारी गूगल के वॉयस सर्च, यूट्यूब और इंटरनेट से हासिल की. लोकतंत्र, संविधान, मजदूरों के अधिकार और सामाजिक न्याय जैसे विषयों पर उनकी समझ ने सभी को चौंका दिया. उन्होंने इंटरव्यू के दौरान भगत सिंह की कविताओं की पंक्तियां भी सुनाईं. कुछ ही घंटों में लोकतंत्र, गरिमा, मजदूरों के अधिकार और भारत की शिक्षा व्यवस्था पर उनके विचारों वाले वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गए. जिसने कभी स्कूल की कक्षा नहीं देखी, वही संविधान की ऐसी व्याख्या कर रहा था कि पत्रकार, नेता और लाखों लोग हैरान रह गए.

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कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन का चेहरा भले ही उसके संस्थापक अभिजीत दिपके बने हों, लेकिन इस आंदोलन की सबसे बड़ी खोज मोहम्मद इरफान साबित हुए. दिल्ली की सावदा जेजे कॉलोनी में रहने वाला यह दिहाड़ी मजदूर अनजाने में उस आंदोलन की अंतरात्मा बन गया, जो मूल रूप से उसके बारे में था ही नहीं. मोहम्मद इरफान की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सोमवार शाम लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी उनसे मिलने उनके घर पहुंचे. इरफान ने 'द लल्लनटॉप' को बताया कि राहुल गांधी ने उनकी फोन पर अपनी बहन और कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी से भी बात कराई और उन्हें परिवार सहित संसद आने का निमंत्रण दिया.

जंतर-मंतर के बाहर कैसी है इरफान की जिंदगी?

सोशल मीडिया पर इंटरव्यू वायरल होने के बाद 'द लल्लनटॉप' की टीम सावदा जेजे कॉलोनी पहुंची. रजत पांडे का मानना था कि इरफान की कहानी जंतर-मंतर पर खत्म नहीं होती. टीम जब उनके घर पहुंची तो वहां अधूरा मकान मिला. घर की छत पूरी तरह तैयार नहीं थी और कई हिस्सों का निर्माण अधूरा था. पत्रकारों के आने से पहले इरफान ने घर में परफ्यूम छिड़का क्योंकि उन्हें संकोच था कि पास में बंधे जानवरों की गंध मेहमानों को परेशान कर सकती है. इरफान का घर देखकर सबसे पहले गरीबी नहीं, बल्कि गरीबी का सामान्य हो जाना दिखाई देता है. 

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यही वह घर है जहां देश के नए चर्चित राजनीतिक विचारक हर शाम करीब 500 रुपये रोज कमाकर लौटते हैं. वह बर्फ बेचकर अपना गुजारा करते हैं. इरफान ने कहा, 'मैं 500 रुपये रोज कमाता हूं. अगर घर में कोई मेडिकल इमरजेंसी आ जाए तो जिम्मेदार कौन होगा? कोई पढ़ाई कैसे करेगा? कोई साफ कपड़े कैसे पहनेगा?' यह उनके लिए केवल सवाल नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी का अनुभव है. उन्होंने वही बातें कहीं जिन्हें वह वर्षों से जी रहे हैं.

मजदूरों की आवाज बनना चाहते हैं इरफान

इरफान ने कहा कि वह जंतर-मंतर पर प्रसिद्ध होने नहीं गए थे. उनके मुताबिक, देश में मजदूरों और असंगठित क्षेत्र के कामगारों की बात कोई नहीं करता. उन्होंने कहा, 'मजदूर सड़क पर इसलिए नहीं उतरते क्योंकि अगर एक दिन काम नहीं करेंगे तो उनके घर में रोटी नहीं बनेगी.' उन्होंने श्रम कानूनों और मजदूरों के शोषण पर भी विस्तार से बात की. उनका कहना था कि आठ घंटे काम करने वाले मजदूर को कम से कम 18,000 रुपये वेतन मिलना चाहिए.

इरफान ने कहा, 'अब श्रम कानून पहले जितने सख्त नहीं रहे. लोगों से 12-14 घंटे काम कराया जाता है और बदले में सिर्फ 12 या 13 हजार रुपये मिलते हैं. इतनी महंगाई में मजदूरों को उनकी मेहनत के हिसाब से वेतन नहीं मिलता.' इरफान ने कहा कि मजदूर विरोध भी नहीं कर पाते क्योंकि उनकी जगह लेने के लिए उसी वेतन पर हमेशा कोई दूसरा व्यक्ति तैयार मिल जाता है. इरफान ने बताया कि वह कई आंदोलनों में हिस्सा ले चुके हैं. उन्होंने कहा कि 2024 में राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के दौरान वह दिल्ली से कश्मीर तक पदयात्रा में शामिल हुए थे. हालांकि, राहुल गांधी के नेतृत्व वाले किसी अन्य आंदोलन में शामिल होने से उन्होंने इनकार किया.

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गूगल, यूट्यूब, इंटरनेट से जुटाई जानकारी

इरफान की कहानी का सबसे अनोखा पहलू यह है कि उन्होंने जो सीखा, वह कैसे सीखा. उन्होंने स्वीकार किया कि उन्होंने प्राथमिक शिक्षा भी पूरी नहीं की. वह स्मार्टफोन पर टाइप तक नहीं कर सकते. उन्होंने कहा, 'मैं सिर्फ अपनी बस्ती के आंगनवाड़ी केंद्र गया था. वहीं थोड़ी-बहुत पढ़ाई हुई. मैं पढ़-लिख नहीं सकता.' इरफान ने बताया कि वह गूगल के वॉयस कमांड फीचर का इस्तेमाल करके जानकारी जुटाते हैं. मजाकिया अंदाज में वह कहते हैं कि उनका विश्वविद्यालय गूगल, यूट्यूब और इंटरनेट है. इन्हीं माध्यमों से उन्होंने संविधान, लोकतंत्र और सार्वजनिक नीतियों को समझा.

जंतर-मंतर पर दिए अपने चर्चित इंटरव्यू में इरफान ने कहा था, 'लोकतंत्र में अहंकार नहीं होना चाहिए. सरकार और प्रदर्शनकारियों दोनों की ओर से बातचीत के दरवाजे खुले रहने चाहिए.' उन्होंने सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के अनशन का जिक्र करते हुए कहा, 'अगर सरकार सिर्फ नारियल पानी लेकर चली जाती... यूपीए सरकार ने अन्ना हजारे को नारियल पानी दिया था. इंदिरा गांधी ने सोनम वांगचुके के पिता को पानी पिलाकर उनका अनशन तुड़वाया था. अंग्रेजों ने महात्मा गांधी को दिया था. यह सरकार भी संवाद का रास्ता चुन सकती थी.' इफरान ने कहा, 'संविधान हर व्यक्ति की गरिमा की रक्षा और देश की एकता व अखंडता सुनिश्चित करने की बात करता है. किसी भी इंसान की गरिमा को कभी कम नहीं होने देना चाहिए.'

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बिना किसी लिखित नोट या तैयारी के कहे गए उनके ये शब्द करोड़ों लोगों तक पहुंचे. 'द लल्लनटॉप' के इंटरव्यू में इरफान ने कहा, 'सिर्फ पेट भर लेना ही जिंदगी नहीं है.' उन्होंने कहा कि लोगों के पास इतनी आय होनी चाहिए कि वे बेहतर जीवन जी सकें. उन्होंने कहा, 'अगर कोई 500 रुपये भी कमाता है तो भी उससे जीएसटी लिया जाता है. प्रत्यक्ष कर और अप्रत्यक्ष कर दोनों हैं.' उनका कहना था कि गरीबी केवल कम आय का नाम नहीं है, बल्कि यह भी है कि क्या कोई अपने बच्चों को पढ़ा सकता है, सम्मान के साथ रह सकता है और किसी आपात स्थिति का सामना कर सकता है.

राहुल गांधी से मुलाकात में क्या हुई बात?

वायरल वीडियो के बाद राहुल गांधी मोहम्मद इरफान के घर पहुंचे और उन्हें परिवार सहित संसद आने का निमंत्रण दिया. इस दौरान एक दिलचस्प घटना भी हुई. राहुल गांधी की सुरक्षा टीम ने 'द लल्लनटॉप' के पत्रकार रजत पांडे को घर के अंदर जाने से रोक दिया. इस पर इरफान ने तुरंत कहा, 'रजत भाई को अंदर आने दीजिए. मैं उनके बिना कुछ भी नहीं हूं.' बाद में इरफान ने बताया कि राहुल गांधी ने उनकी प्रियंका गांधी से फोन पर बात कराई. उन्होंने कहा, 'मैंने प्रियंका गांधी को मजदूरों की समस्याओं के बारे में बताया. मैंने राहुल गांधी से कहा कि मुझे अपने लिए कुछ नहीं चाहिए. बस इस देश के गरीबों और मजदूरों के लिए लड़िए.'

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आंदोलन की सबसे बड़ी खोज बने इरफान

राजनीतिक आंदोलनों से अक्सर नए नेता निकलते हैं, लेकिन बहुत कम आंदोलनों से ऐसी प्रामाणिक आवाजें सामने आती हैं. कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की वजह से याद किया जाएगा. अभिजीत दिपके इसके आयोजक के रूप में, सोनम वांगचुक इसके नैतिक चेहरे के रूप में और जेन-जी इसकी ऊर्जा के रूप में याद किए जाएंगे. लेकिन नारों, पोस्टरों और राजनीतिक प्रतीकों के बीच एक ऐसा व्यक्ति सामने आया जो इनमें से किसी श्रेणी में फिट नहीं बैठता.

मोहम्मद इरफान न तो छात्र नेता हैं, न राजनेता और न ही पेशेवर सामाजिक कार्यकर्ता. वह एक दिहाड़ी मजदूर हैं, जो कभी स्कूल नहीं गए, मोबाइल पर टाइप नहीं कर सकते और रोज बर्फ बेचकर करीब 500 रुपये कमाते हैं. फिर भी शिक्षित छात्रों और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स से भरे इस आंदोलन में सबसे ज्यादा असर उनके शब्दों ने छोड़ा. शायद इसलिए कि इरफान किसी विचारधारा की नहीं, बल्कि अपने जीवन, संघर्ष और सम्मान की बात कर रहे थे. ऐसा करते-करते वह उस पीढ़ी की आवाज बन गए जो सबसे ज्यादा मेहनत करती है, सबसे कम कमाती है और जिसकी आवाज अक्सर सुनाई नहीं देती.

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