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पेपर लीक, टूटते सपने और भरोसा... Gen-Z ने दिखाया विरोध का नया लोकतांत्रिक मॉडल

नीट परीक्षा में कथित पेपर लीक और छात्र आक्रोश के बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे ने देश की संस्थागत व्यवस्था को झकझोर कर रख दिया है. इस आंदोलन ने युवाओं की इमोशनल इंटेलिजेंस और लोकतांत्रिक भागीदारी का नया सिरे से लोगों के सामने रखा है.

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दिल्ली में प्रदर्शन करते लोग. (File photo: PTI)
दिल्ली में प्रदर्शन करते लोग. (File photo: PTI)

नेशनल एलिजिबिलिटी कॉम्यूलेटिव एंट्रेंस टेस्ट (NEET) के खिलाफ ऐतिहासिक विरोध प्रदर्शनों के बाद पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ है. नीट परीक्षार्थियों द्वारा गठित 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) नामक एक व्यंग्यात्मक समूह ने सोशल मीडिया पर मजाक से शुरू हुए अभियान को हफ्तों लंबे धरनों और भूख हड़ताल में बदलकर प्रशासनिक और संस्थागत अधिकरियों की नींव हिला दी. केंद्र सरकार द्वारा पेपर लीक विरोधी नियम कड़े करने और दंड का प्रावधान करने के बावजूद ये आक्रोश शांत नहीं हुआ. इस विद्रोह ने साफ कर दिया कि देश का युवा वर्ग अब अपनी बात मनवाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है.

शिक्षा सलाहकार अमलापुरपु दुर्गा प्रसाद के अनुसार, आंदोलनकारियों ने अपने प्रति इस्तेमाल किए जाने वाले ताने या उपहास को ही अपना सबसे बड़ा हथियार बना लिया. उन्होंने 'कॉकरोच' शब्द को खारिज करने के बजाय इसे अपनी सहनशक्ति और लचीलेपन के प्रतीक के तौर पर पेश किया. स्थापित राजनीतिक व्यवस्था और ढांचों को दरकिनार करते हुए छात्रों ने समर्थन जुटाने के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का तदर्थ इस्तेमाल किया, जिसने 21वीं सदी में लोकतांत्रिक भागीदारी और विरोध प्रदर्शन का एक नया तरीका पेश किया है.

अधिकारियों का डैमेज कंट्रोल नाकाफी

हालांकि, केंद्रीय गृह मंत्रालय ने पेपर सेटिंग नियमों को सख्त करने, प्रश्न पत्रों को लीक करने पर रोक लगाने और दंडात्मक उपाय लागू करने के कदम उठा रहा है. लेकिन ये डैमेज कंट्रोल युवाओं के गुस्से को शांत करने में कम पड़ रहा है. लाखों युवाओं के भविष्य का फैसला केवल एक ही उच्च-जोखिम वाली परीक्षा के जरिए करने की प्रणाली असंतोष को जन्म देती है, खासकर तब जब सफल होने की संभावनाएं व्यक्ति के लिए बेहद कम नजर आती हैं.

सना की मां ने उठाया सवाल

नीट पेपर लीक के इस पूरे विवाद के बीच पीड़ित परिवारों का दर्द भी सामने आया. नीट अभ्यर्थी सना शेख की मां ने एक ऐसा सवाल उठाया, जिसका जवाब किसी भी प्रशासनिक अधिकारी के पास नहीं था. उन्होंने कहा कि एक साधारण मां के रूप में उनका काम अपने बच्चों को खुश, स्वस्थ और सुरक्षित रखना था, लेकिन अब उनकी बेटी की नींद हमेशा के लिए छीन चुकी है. उन्होंने सवाल किया कि इस नुकसान की भरपाई कौन कर सकता है. शिक्षा मंत्री का इस्तीफा इस बात का अप्रत्यक्ष स्वीकार था कि संस्थाएं अपनी जिम्मेदारी निभाने में विफल रही हैं.

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उथल-पुथल को समझने की जरूरत

टीडीपी सांसद लावु श्रीकृष्ण देवरयालु ने युवाओं के इस आक्रोश पर कहा कि ये प्रदर्शन केवल नीट के बारे में नहीं है, बल्कि ये युवाओं के मन में व्याप्त गहरी उथल-पुथल को दर्शाता है. उन्होंने कहा कि इसे केवल एक घटना मानकर खारिज करने के बजाय इस आक्रोश को समझना जरूरी है. सांसद ने माता-पिता को भी सलाह दी कि वो बच्चों पर कम दबाव डालें, क्योंकि किसी बड़े विश्वविद्यालय में प्रवेश पाना ही जीवन का सब कुछ नहीं है.

ये घटना की पोस्टमार्टम रिपोर्ट

एंटी-पेपर लीक कानून पर टिप्पणी करते हुए टीडीपी सांसद लावु श्री कृष्ण देवरयालु ने कहा कि पेपर लीक विरोधी बिल घटना के बाद का उपाय है, यानी कुछ गलत पहले ही हो चुका है. असल में ध्यान इस बात पर होना चाहिए कि ऐसी घटनाएं हों ही नहीं.

उन्होंने सवाल उठाया कि अगर कोई राज्य 25 साल तक बिना किसी पेपर लीक के परीक्षा आयोजित कर सकता है तो केंद्र सरकार ऐसा क्यों नहीं कर सकती?.

NEET एक छंटनी वाली परीक्षा

उन्होंने परीक्षा प्रक्रिया को बेहतर बनाने और राज्य बोर्ड के छात्रों के हितों की रक्षा करने की वकालत की. सांसद ने कहा कि NEET एक छंटनी वाली परीक्षा है जिसमें केवल 1 या 2 प्रतिशत लोगों को सीटें मिलती हैं... परीक्षा जरूरी है, लेकिन पूरी प्रक्रिया को बेहतर बनाया जा सकता है. हमें सवाल इकट्ठा करने और अलग-अलग कठिनाई स्तरों वाले ऑटो-जेनरेटेड बैंक तैयार करने की जरूरत है. साथ ही ये भी सुनिश्चित करना होगा कि इसका स्टेट बोर्ड के छात्रों को नुकसान न हो.

उन्होंने कहा कि किसी छात्र का मूल्यांकन केवल एक तरह की बुद्धिमत्ता के आधार पर नहीं किया जा सकता, क्योंकि आज के वक्त में इमोशनल इंटेलिजेंस (भावनात्मक समझ) की बहुत जरूरत है, लेकिन अभी इसकी जांच नहीं की जाती है. परीक्षाओं में एक समग्र दृष्टिकोण अपनाने से न केवल मूल्यांकन सिस्टम सुधरेगा, बल्कि ये समाज के समग्र विकास में भी योगदान देगा.

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लोकतांत्रिक भरोसे पर संकट

भारत का लोकतांत्रिक ढांचा इस वक्त एक नाजुक मोड़ पर खड़ा है. फौरी तौर पर की गई पुलिस कार्रवाई या इमरजेंसी उपायों के जरिए इस संकट को दूर करना आसान नहीं है, क्योंकि युवाओं के अंदर का असंतोष बाहर आ चुका है. लोकतांत्रिक शासन का मूल कर्तव्य जनता की संप्रभुता और अधिकारों की रक्षा करना है. यदि सरकार नागरिकों का विश्वास कायम रखने में विफल रहती है तो ये उसके संवैधानिक दायित्वों की विफलता है. सीजेपी का ये आंदोलन भले ही एक अस्थायी लहर लगे, लेकिन जब तक युवाओं के अधिकार प्रभावित होंगे, तब तक ऐसे विरोध प्रदर्शन होते रहेंगे.

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