जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई को अन्यायपूर्ण बताते हुए उसकी हाई-लेवल जांच की मांग वाली चिट्ठी सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को लिखने वाले वकील ने अब इसी मुद्दे पर जनहित याचिका (PIL) दायर की है. इससे पहले, तीन दिन पहले भेजी गई चिट्ठी पर चीफ जस्टिस ने कोई संज्ञान नहीं लिया था.
याचिकाकर्ता प्रिया मिश्रा की ओर से अधिवक्ता नरेंद्र मिश्रा द्वारा दायर इस जनहित याचिका में मांग की गई है कि सुप्रीम कोर्ट प्रतिवादियों को निर्देश देते हुए रिट ऑफ मैंडेमस (Writ of Mandamus) जारी करे. इसके तहत संबंधित घटनाओं से जुड़े सभी इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल साक्ष्यों को तत्काल सुरक्षित रखने और संरक्षित करने का निर्देश दिया जाए. इनमें सीसीटीवी फुटेज, बॉडी-वॉर्न कैमरा फुटेज, ड्रोन फुटेज, मोबाइल फोन रिकॉर्डिंग, सोशल मीडिया पर उपलब्ध वीडियो और पोस्ट, पुलिस वायरलेस एवं संचार रिकॉर्ड, कॉल लॉग, कंट्रोल रूम रिकॉर्ड, तैनाती संबंधी आदेश, जीपीएस रिकॉर्ड तथा अन्य सभी प्रासंगिक इलेक्ट्रॉनिक और दस्तावेजी साक्ष्य शामिल हैं.
याचिका में कहा गया है कि इन साक्ष्यों को नष्ट होने, बदले जाने, उनके साथ छेड़छाड़ किए जाने, दबाए जाने या गुम होने से बचाया जाए. साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि सभी साक्ष्य उचित न्यायिक और जांच प्राधिकारी के समक्ष प्रस्तुत किए जाएं.
याचिका में यह भी मांग की गई है कि जहां उपलब्ध साक्ष्यों- जैसे आधिकारिक रिकॉर्ड, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य, मीडिया रिपोर्ट और अन्य विश्वसनीय सामग्री के आधार पर किसी व्यक्ति, लोक सेवक, पुलिस अधिकारी, सुरक्षा कर्मी या किसी अन्य प्राधिकारी द्वारा कोई संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) किया जाना लगता होता हो, वहां संविधान और लागू कानूनों के अनुसार तत्काल उपयुक्त प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज की जाए तथा निष्पक्ष, स्वतंत्र और समयबद्ध आपराधिक जांच शुरू की जाए.
इसके अलावा, केंद्र सरकार, सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिए जाएं कि वे शांतिपूर्ण सभाओं, प्रदर्शनों और छात्र आंदोलनों से निपटते समय संविधान के अनुच्छेद 14, 19, 21 और 22 के तहत प्रदत्त अधिकारों का कड़ाई से पालन करें. साथ ही यह सुनिश्चित करें कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ अत्यधिक, असमानुपातिक, मनमाना या क्रूर बल प्रयोग न किया जाए. पुलिस कार्रवाई, गिरफ्तारी, हिरासत, भीड़ नियंत्रण और मौलिक अधिकारों की सुरक्षा से जुड़े मामलों में इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित कानून का पालन किया जाए.