मिडिल-ईस्ट में चल रहे युद्ध और ईरान पर हो रहे हमलों के बीच भारत सरकार की चुप्पी को लेकर देश में राजनीतिक बहस तेज हो गई है. कांग्रेस सांसद शशि थरूर इस मामले में अपनी पार्टी कांग्रेस से अलग राय रखते नजर आ रहे हैं. अपने लेटेस्ट आर्टिकल के जरिए उन्होंने सरकार के रुख का बचाव किया है.
कांग्रेस ईरान-अमेरिका की जंग पर भारत सरकार की चुप्पी की आलोचना करती आ रही है. कांग्रेस के मुताबिक ये खामोशी भारत के पुराने सिद्धांतों और राष्ट्रीय हितों के साथ धोखा है. जबकि शशि थरूर के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय मामलों में चुप्पी साधना 'नैतिक हार' नहीं, बल्कि 'जिम्मेदार स्ट्रैटेजी' है.
इंडियन एकसप्रेस के लिए लिखे अपने हालिया आर्टिकल थरूर का मानना है कि जो लोग सरकार की चुप्पी को 'कायरता' कह रहे हैं, वो डिप्लोमेसी की मुश्किलों को नहीं समझ रहे हैं. थरूर का कहना है कि'मल्टी-अलाइनमेंट' के इस दौर में सभी शक्तियों के साथ संतुलन बनाना ही भारत के हित में है.
थरूर ने कहा, 'बिना किसी बड़े प्रभाव के चुप्पी साधना भी एक रणनीति हो सकती है.' शशि थरूर ने माना कि अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत इस युद्ध को सही नहीं ठहराया जा सकता. ये संप्रभुता और शांति से समाधान के उन सिद्धांतों के खिलाफ है जिनके लिए भारत हमेशा खड़ा रहा है.
'सरकार को दोषी नहीं ठहराऊंगा'
थरूर ने तर्क दिया कि विदेश नीति किसी 'अकादमिक सेमिनार' की तरह नहीं होती, जहां सिर्फ सिद्धांतों पर बात हो. यहां लिए गए फैसलों का सीधा असर करोड़ों लोगों की जिंदगी पर पड़ता है. उन्होंने कहा, 'मैं सरकार को टकराव के बजाय चुप्पी चुनने के लिए दोषी नहीं ठहराऊंगा.'
कांग्रेस नेता ने भारत फूंक-फूंक कर कदम रखने की अहम वजहों पर भी बात की. उन्होंने बताया कि खाड़ी देशों में लगभग 90 लाख भारतीय रहते हैं. उनकी सुरक्षा और उनका भेजा जाने वाला पैसा भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है. वही, भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए खाड़ी के तेल और गैस पर निर्भर है. इस क्षेत्र में अस्थिरता भारत के आर्थिक विकास को पटरी से उतार सकती है. क्योंकि इस क्षेत्र से हर साल लगभग 200 अरब डॉलर का व्यापार होता है.
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शशि थरूर ने याद दिलाया कि भारत ने पहले भी कई बार राष्ट्रीय हितों को सिद्धांतों के ऊपर रखा है. 1956 में हंगरी, 1968 में चेकोस्लोवाकिया और 1979 में अफगानिस्तान पर सोवियत संघ के हमलों के समय भी भारत ने खुलकर निंदा नहीं की थी. इसकी वजह ये थी कि उस समय सोवियत संघ भारत का सबसे बड़ा हथियार आपूर्ति करने वाला और रणनीतिक साझेदार था. थरूर ने कहा कि आज भी वही तर्क यूक्रेन युद्ध और ईरान पर हो रहे हमलों पर लागू होता है.
थरूर ने अमेरिका को लेकर कहा कि आज का अमेरिका अंतरराष्ट्रीय कानून को उस तरह तरजीह नहीं देता जैसा हम चाहते हैं. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने मकसद में रुकावट डालने वालों के खिलाफ सख्त रुख अपनाने के लिए जाने जाते हैं. ऐसे में रक्षा सहयोग और तकनीक के क्षेत्र में अमेरिका को नाराज करना भारत के लिए समझदारी नहीं होगी.
सोनिया गांधी ने उठाए सरकार पर सवाल
जहां शशि थरूर ने सरकार का पक्ष लिया है, तो वहीं इससे पहले सोनिया गांधी ने सरकार की आलोचना की थी. उन्होंने भारत सरकार की खामोशी पर हैरानी जाहिर की थी. सोनिया ने अपने एक लेख में कहा था, 'जब किसी विदेशी नेता की लक्षित हत्या पर हमारे देश की ओर से संप्रभुता या अंतरराष्ट्रीय कानून का कोई स्पष्ट बचाव नहीं होता और निष्पक्षता को छोड़ दिया जाता है, तो ये हमारी विदेश नीति की दिशा और विश्वसनीयता पर गंभीर संदेह पैदा करता है.'