जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के खिलाफ सुरक्षा बलों को बड़ी कामयाबी मिली है. इंटेलिजेंस आधारित एक संयुक्त ऑपरेशन में सुरक्षा बलों ने लश्कर-ए-तैयबा के वरिष्ठ कमांडर मूसा उर्फ आसिफ फौजी को मार गिराया है. ये ऑपरेशन जम्मू-कश्मीर के बडगाम जिले के गुरवतकलां, खानसाहिब थाना क्षेत्र में चलाया गया.
केंद्रीय गृह मंत्रालय के मुताबिक, सुरक्षा एजेंसियां लंबे समय से मूसा की तलाश में थीं. हाल के दिनों में तकनीकी और ह्यूमन इंटेलिजेंस से उसके मूवमेंट और मौजूदगी से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी मिलने के बाद उसे निष्प्रभावी करने के लिए सभी संबंधित एजेंसियों के बीच एक विशेष रणनीति तैयार की गई थी. मूसा का मारा जाना जम्मू-कश्मीर में लश्कर-ए-तैयबा के उस नेटवर्क के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है जो साल 2022 से घाटी में सक्रिय था और कई बड़े आतंकी हमलों से जुड़ा रहा है.
लश्कर मॉड्यूल का सफाया
गृह मंत्रालय के अनुसार, जम्मू-कश्मीर में साल 2022 से लश्कर-ए-तैयबा के चार वरिष्ठ कमांडरों का एक विशेष समूह लगातार सक्रिय था. ये आतंकी मॉड्यूल राज्य में हुए कई सनसनीखेज हमलों के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार रहा है. अब सुरक्षा बलों ने अलग-अलग अभियानों में इस समूह के सभी चारों सदस्यों को मार गिराया है. इस मॉड्यूल में जुनैद भट, सुलेमान , यासिर और मूसा उर्फ आसिफ फौजी शामिल थे.
सुरक्षा बलों ने इस खतरनाक आतंकी समूह के सफाए के लिए सिलसिलेवार अभियान चलाए. सबसे पहले जुनैद भट 3 दिसंबर 2024 को डाचीगाम में हुई एक मुठभेड़ में मारा गया. इसके बाद 28 जुलाई 2025 को सुरक्षा बलों ने 'ऑपरेशन महादेव' के दौरान दूसरे कमांडर सुलेमान को मार गिराया. इसी क्रम में 4 सितंबर 2026 को 'ऑपरेशन असधर' के तहत यासिर को ढेर किया गया. अंततः 30 सितंबर 2026 को बडगाम के गुरवतकलां में मूसा उर्फ आसिफ फौजी को निष्प्रभावी कर दिया गया.
गृह मंत्रालय ने जानकारी दी है कि लश्कर का ये समूह जम्मू-कश्मीर में हुए कई बड़े और घातक हमलों में शामिल था. इनमें अगस्त 2023 का हलान हमला, दिसंबर 2023 का डेरा की गली यानी DKG हमला और मई 2023 का कांडी हमला शामिल हैं. इसके अतिरिक्त ये मॉड्यूल मई 2024 के शाहसितार हमले और जून 2024 के शिव खोरी हमले से भी जुड़ा रहा.
कई बड़े आतंकी हमलों से जुड़ा था नेटवर्क
इस आतंकी समूह ने अक्टूबर 2024 में गगनगीर और अक्टूबर 2024 में ही बूटापथरी में बड़े आतंकी हमलों को अंजाम दिया था. इसके बाद अप्रैल 2025 में हुए बैसरन हमले में भी इस गिरोह की सीधी संलिप्तता पाई गई थी. इन लगातार हमलों ने राज्य में सुरक्षा एजेंसियों के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी थी. इसके बाद एजेंसियों ने आतंकियों की पहचान, उनके लॉजिस्टिक नेटवर्क, उनके मूवमेंट पैटर्न और नेटवर्क को ध्वस्त करने की योजना बनाई. मूसा के खिलाफ ऑपरेशन भी इसी लंबे समय से चल रही खुफिया और ऑपरेशनल कार्रवाई का हिस्सा था.
मई से जारी था ऑपरेशन शेरुवाली
गृह मंत्रालय के अनुसार, मूसा को ढेर करने का अभियान अचानक शुरू की गई कोई त्वरित कार्रवाई नहीं थी. ये मई 2026 में शुरू किए गए एक सुनियोजित और लंबे अभियान 'ऑपरेशन शेरुवाली' का हिस्सा था. इस पूरे ऑपरेशन के दौरान सुरक्षा एजेंसियां आतंकियों के मूवमेंट, उनकी संदिग्ध गतिविधियों और उनके गुप्त ठिकानों पर लगातार पैनी नजर बनाए हुए थीं. विभिन्न स्रोतों से मिलने वाली खुफिया जानकारियों का लगातार विश्लेषण किया जाता रहा.
मूसा के मूवमेंट से जुड़ी पक्की तकनीकी और जमीनी स्तर की ह्यूमन इंटेलिजेंस मिलने के बाद सभी सुरक्षा एजेंसियों ने मिलकर एक संयुक्त रणनीति तैयार की. जैसे ही बडगाम के गुरवतकलां इलाके में उसके छिपे होने की सटीक पुष्टि हुई, सुरक्षा बलों ने संयुक्त घेराबंदी की. इसके बाद बडगाम के गुरवतकलां इलाके में संयुक्त अभियान चलाया गया और मुठभेड़ के दौरान सुरक्षा बलों ने सटीक जवाबी कार्रवाई करते हुए मूसा को मौके पर ही ढेर कर दिया.
इंटेलिजेंस आधारित ऑपरेशन पर जोर
इस ऑपरेशन की खास बात ये रही कि सुरक्षा बलों ने केवल इलाके में सर्च ऑपरेशन चलाने के बजाय पहले इंटेलिजेंस इनपुट को मजबूत किया और उसके आधार पर लक्ष्य निर्धारित किया. मूसा की लंबे समय से तलाश की जा रही थी. सुरक्षा एजेंसियों के पास उसके मूवमेंट से संबंधित तकनीकी जानकारी के साथ-साथ जमीनी स्तर से मिलने वाली मानवीय खुफिया सूचनाएं भी थीं. इन्हीं सूचनाओं को जोड़कर उसके संभावित ठिकाने और गतिविधियों का पता लगाया गया.
इसके बाद सभी संबंधित एजेंसियों के बीच समन्वय कर ऑपरेशन को अंजाम दिया गया. आतंकवाद विरोधी अभियानों में ये मॉडल पिछले कुछ सालों में जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा बलों की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बना है. स्थानीय पुलिस की जमीनी खुफिया क्षमता, सेना की ऑपरेशनल क्षमता और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों की तैनाती एवं सहयोग को एक साथ इस्तेमाल किया जा रहा है.
सेना-पुलिस और CAPF का संयुक्त अभियान
गृह मंत्रालय ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों से जम्मू-कश्मीर पुलिस, भारतीय सेना और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल यानी CAPF समेत सभी सुरक्षा एजेंसियां आपसी समन्वय के साथ आतंकवाद विरोधी अभियान चला रही हैं. इन अभियानों में इंटेलिजेंस शेयरिंग, संयुक्त ऑपरेशन, तकनीकी निगरानी और जमीनी स्तर पर पुलिस एवं सुरक्षा बलों के बीच समन्वय पर विशेष जोर दिया गया है.
मूसा के खिलाफ कार्रवाई भी इसी संयुक्त रणनीति का हिस्सा रही. सुरक्षा एजेंसियों के बीच लगातार सूचनाओं के आदान-प्रदान से आतंकी कमांडरों की पहचान और उनके मूवमेंट पर नजर रखना संभव हुआ है. इसके बाद अलग-अलग ऑपरेशनों में लश्कर के वरिष्ठ कमांडरों को निशाना बनाया गया.
लश्कर के ऑपरेशनल नेटवर्क पर असर
चारों वरिष्ठ कमांडरों के अलग-अलग समय पर मारे जाने से लश्कर के इस खास नेतृत्व समूह की कमान संरचना पूरी तरह ध्वस्त हो गई है. मूसा की मौत लश्कर के ऑपरेशनल नेटवर्क के लिए बहुत बड़ा झटका साबित हुई है. 2022 से लगातार आतंक फैलाने वाले इस कोर ग्रुप के खात्मे से संगठन का घाटी में तालमेल पूरी तरह छिन्न-भिन्न हो गया है.
गृह मंत्रालय का मानना है कि इस नेतृत्व समूह के खात्मे का ये अर्थ बिल्कुल नहीं है कि आतंकवाद की चुनौती पूरी तरह खत्म हो गई है. सुरक्षा एजेंसियों के सामने अब भी स्थानीय मॉड्यूल, सीमा पार से घुसपैठ, अवैध हथियारों की आमद, फंडिंग नेटवर्क और नई आतंकी भर्तियों जैसी गंभीर चुनौतियां बनी हुई हैं. यही कारण है कि सुरक्षा बल किसी एक आतंकी के बजाय आतंकवाद के पूरे इकोसिस्टम को निशाना बना रहे हैं.
2026 में भी जारी है काउंटर-टेरर ऑपरेशन
इस साल जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा बलों की रणनीति में आतंकियों के शीर्ष कमांडरों के खिलाफ लक्षित अभियान के साथ-साथ उनके सहयोगियों और नेटवर्क को ट्रैक करने पर भी जोर रहा है.
मूसा के खिलाफ कार्रवाई से पहले भी सितंबर में ऑपरेशन असधर के दौरान लश्कर के कमांडर यासिर को मार गिराया गया था. उससे पहले जुलाई 2025 में ऑपरेशन महादेव के दौरान सुलेमान और दिसंबर 2024 में डाचीगाम में जुनैद भट को सुरक्षा बलों ने मार गिराया था. इन अभियानों को एक लंबे वक्त से चल रहे काउंटर-टेरर ग्रिड के हिस्से के तौर पर देखा जा सकता है, जिसमें किसी एक आतंकी को निशाना बनाने के बजाय उसके पूरे नेटवर्क और सपोर्ट सिस्टम की पहचान करने पर काम किया जाता है.
सुरक्षा एजेंसियों के लिए अहम उपलब्धि
गृह मंत्रालय के मुताबिक, मूसा का न्यूट्रलाइजेशन जम्मू-कश्मीर में लश्कर-ए-तैयबा के इकोसिस्टम के लिए गंभीर झटका है. खासतौर पर इसलिए क्योंकि वर्ष 2022 से सक्रिय चार वरिष्ठ कमांडरों का पूरा समूह अब सुरक्षा बलों की अलग-अलग कार्रवाई में समाप्त हो चुका है. मूसा तक पहुंचने में लंबे वक्त तक चली खुफिया निगरानी, तकनीकी इनपुट, ह्यूमन इंटेलिजेंस और एजेंसियों के बीच समन्वय की भूमिका रही.
ऑपरेशन शेरुवाली के तहत हुई यह कार्रवाई ये भी बताती है कि जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद विरोधी अभियान अब केवल मुठभेड़ तक सीमित नहीं हैं, बल्कि लंबे समय तक चलने वाली इंटेलिजेंस बिल्डिंग, टारगेट ट्रैकिंग और मल्टी-एजेंसी ऑपरेशन पर आधारित हैं.
मूसा के मारे जाने के साथ लश्कर के उस चार सदस्यीय वरिष्ठ कमांड ग्रुप का अंत हो गया है जो 2022 से जम्मू-कश्मीर में सक्रिय था और कई बड़े आतंकी हमलों से जुड़ा रहा. सुरक्षा एजेंसियों के लिए अब अगली चुनौती ऐसे नेटवर्क में नए नेतृत्व, स्थानीय मॉड्यूल और लॉजिस्टिक सपोर्ट को पहचानकर उन्हें भी निष्प्रभावी करना होगी.