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हेग कोर्ट की सच्चाई क्या है, जिसके सिंधु पर फैसले को भारत ने अवैध करार दिया? चीन भी लगा चुका क्लास

सिंधु जल समझौते को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद फिर बढ़ गया है. हेग स्थित परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने 1960 के समझौते को लागू बताते हुए जम्मू-कश्मीर में भारत के हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट्स को लेकर टिप्पणी की है. भारत ने इस फैसले को खारिज करते हुए कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन को ही अवैध तरीके से गठित बताया है.

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  सिंधू जल समझौते को लेकर हेग कोर्ट ने फैसला सुनाला जिसे भारत ने मानने से इंकार कर दिया है. (फाइल फोटो)
सिंधू जल समझौते को लेकर हेग कोर्ट ने फैसला सुनाला जिसे भारत ने मानने से इंकार कर दिया है. (फाइल फोटो)

भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल समझौते को लेकर एक बार फिर विवाद खड़ा हो गया है. हेग स्थित परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन यानी पीसीए ने कहा कि 1960 का सिंधु जल समझौता अभी भी लागू है और जम्मू-कश्मीर में भारत के हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट्स से जुड़े प्रावधानों का पालन होना चाहिए. भारत ने इस फैसले को सीधे खारिज कर दिया है. भारत का कहना है कि जिस कोर्ट ने यह फैसला दिया है, उसे भारत ने कभी मान्यता नहीं दी और उसकी कार्यवाही समझौते में तय व्यवस्था के मुताबिक नहीं हुई.

सिंधु जल समझौते के मामले में जिस 'हेग कोर्ट' की चर्चा हो रही है, वह परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन यानी पीसीए है. इसकी स्थापना 1899 में हेग में हुई थी. यह देशों के बीच अंतरराष्ट्रीय विवादों को मध्यस्थता और आर्बिट्रेशन के जरिए सुलझाने के लिए बनाया गया अंतरराष्ट्रीय मंच है.

यह भी पढ़ें: सिंधु जल समझौते पर भारत ने रिजेक्ट किया हेग कोर्ट का फैसला, कहा- ये अदालत के अधिकार क्षेत्र में नहीं

हालांकि, इसे सीधे किसी देश की अदालत की तरह समझना सही नहीं है. अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय समझौतों में विवाद निपटाने के लिए अलग प्रक्रियाएं और संस्थाएं तय हो सकती हैं.

भारत ने क्यों खारिज किया फैसला?

भारत का कहना है कि सिंधु जल समझौते में विवाद सुलझाने के लिए एक खास व्यवस्था मौजूद है. नई दिल्ली के मुताबिक, पाकिस्तान ने उस तय प्रक्रिया को दरकिनार करते हुए कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन का रास्ता अपनाया और वर्ल्ड बैंक ने भी इस प्रक्रिया को आगे बढ़ने दिया.

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इसी वजह से भारत इस कोर्ट की कार्यवाही में शामिल नहीं हुआ. भारत का कहना है कि उसने इस कोर्ट को कानूनी तौर पर स्वीकार नहीं किया है और इसलिए इसके फैसले भारत पर बाध्यकारी नहीं हैं.

भारत ने खास तौर पर इस बात पर आपत्ति जताई है कि यह संस्था उसके संप्रभु फैसलों और जम्मू-कश्मीर में इंफ्रास्ट्रक्चर और हाइड्रो प्रोजेक्ट्स पर निर्देश देने का अधिकार नहीं रखती.

क्या है सिंधु जल समझौता?

सिंधु जल समझौता 19 सितंबर 1960 को भारत और पाकिस्तान के बीच हुआ था, जिसमें विश्व बैंक ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी. समझौते के तहत रावी, ब्यास और सतलुज को पूर्वी नदियों के तौर पर भारत के लिए और सिंधु, झेलम और चिनाब को पश्चिमी नदियों के अधिकतर पानी को पाकिस्तान के लिए निर्धारित किया गया था. भारत ने अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद इस समझौते को 'अबेयंस' में डाल दिया था. नई दिल्ली का कहना है कि उसका यह फैसला अभी भी कायम है.

चीन ने भी PCA का फैसला ठुकराया था

हेग स्थित पीसीए के फैसले को खारिज करने वाला भारत पहला देश नहीं है. 2016 में दक्षिण चीन सागर विवाद में पीसीए ने चीन के समुद्री दावों को लेकर फैसला सुनाया था. चीन ने उस फैसले को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था.

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हालांकि, चीन का मामला सिंधु जल समझौते से अलग था और दोनों मामलों की कानूनी पृष्ठभूमि भी अलग है. मौजूदा विवाद का मूल सवाल यही है कि सिंधु जल समझौते के तहत किस अंतरराष्ट्रीय मंच को विवाद पर फैसला देने का अधिकार है और उस फैसले की भारत पर कानूनी बाध्यता कितनी है. (दीक्षा मिश्रा की रिपोर्ट)

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