पिछले हफ़्ते इज़राइल जा रही फ़्लाईदुबई फ़्लाइट को बचाने के रोमांचक ऑपरेशन में सबसे अहम मोड़ सचमुच दरवाज़े के हैंडल को घुमाना था. को-पायलट के कुल्हाड़ी से किए गए हमले में बुरी तरह घायल और खून से लथपथ कैप्टन स्मित मछार घिसटते हुए कॉकपिट पैनल तक पहुंचे, नॉब को पकड़ा और उसे घुमाकर दरवाज़ा खोल दिया. मछार ने 3 अक्टूबर को इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से कहा, "मुझमें बस एक आखिरी लड़ाई लड़ने की हिम्मत बची थी. अगर मैं ऐसा नहीं करता, तो मेरे लिए मर जाने जैसा होता, इसलिए मैं दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा और उसे खोल दिया."
तीन यात्री तेजी से कॉकपिट में घुसे और कट्टरपंथी सोच वाले ओमान के पायलट पर काबू पा लिया. इसके बाद एक यात्री ने प्लेन को सीधा किया और फिर प्लेन में मौजूद एक बैकअप पायलट ने कमान संभाली और एक घंटे बाद सऊदी अरब के तबुक एयरपोर्ट पर प्लेन को सुरक्षित लैंड कराया.
कैप्टन मछार का यह बहादुरी भरा कदम बहुत अहम था क्योंकि हमलावर को-पायलट हमम अल-हमामी केबिन क्रू को अंदर आने से रोक रहा था. केबिन क्रू कॉकपिट के बाहर लगे कीपैड का इस्तेमाल करके अंदर आने की रिक्वेस्ट कर सकते हैं, लेकिन अंदर कौन आ सकता है, इसका फ़ैसला पायलट करते हैं. वे सेंटर पेडस्टल पर लगे तीन-पोजीशन वाले नॉब को घुमाकर यह तय करते हैं. इस नॉब को 'अनलॉक', 'नॉर्मल' या 'डिनाई' (मना करना) पर सेट किया जा सकता है.
इजरायली समाचार रिपोर्टों से अब पता चलता है कि अल-हमामी का इरादा विमान को तेल अवीव के बेन गुरियन हवाई अड्डे पर क्रैश करने का था. इससे 30 सितंबर की फ्लाईदुबई घटना 11 सितंबर, 2001 जैसे हमले के सबसे करीब पहुंच जाती, जिसमें अल-कायदा के पायलट-अपहर्ताओं ने चार अमेरिकी एयरलाइन कॉकपिट में घुसकर जेट विमानों को तीन प्रमुख इमारतों वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के ट्विन टावर्स और पेंटागन से टकरा दिया था, इसमें लगभग 3,000 लोग मारे गए थे.
9/11 के बाद के प्रोटोकॉल
अल-हमामी का कथित टारगेट पश्चिम एशिया के सबसे व्यस्त एयरपोर्ट्स में से एक था, जहां रोज़ाना 600 फ़्लाइट्स और लगभग 1,00,000 यात्री आते-जाते हैं. हो सकता है कि वह हमलावर पायलट जेट को यात्रियों और खड़े विमानों से भरे किसी व्यस्त टर्मिनल की ओर ले जाता जो एविएशन के इतिहास में अपनी तरह का पहला हमला होता.
कॉकपिट के दरवाज़े बुलेट और धमाके से सुरक्षित और ज़बरदस्ती घुसने से रोकने के लिए मज़बूत बनाए गए थे. ये सभी फ़ीचर्स 9/11 के बाद लागू किए गए थे. इसलिए यात्रियों और फ़्लाइट क्रू के लिए उसे काबू करने के लिए अंदर घुसने का कोई रास्ता नहीं था.
कट्टरपंथी विचारधारा से लबरेज उस पायलट के लिए बेन गुरियन तक उड़ान भरना मुश्किल होता. ऐसा इसलिए था क्योंकि जैसे ही विमान ने हाईजैकिंग का संकेत देने वाला 7500 कोड भेजा, 9/11 के बाद के एहतियाती उपाय शुरू हो गए. इजरायल एयर फ़ोर्स के जेट्स को तुरंत रवाना किया गया. कम से कम तीन देशों के एयर ट्रैफ़िक रडार और शायद इजरायल एयरफोर्स के रडार भी उस एयरलाइनर को ट्रैक कर रहे थे, क्योंकि वह 33,000 फ़ीट से 17,000 फ़ीट की ऊंचाई पर आ गया था. ये विमान सऊदी-जॉर्डन बॉर्डर पर था और अपनी मंज़िल से एक घंटे की दूरी पर था, जिसका मतलब था कि जैसे ही वह इज़रायली एयरस्पेस में दाखिल होता, IAF के जेट्स की नज़र उस पर पड़ जाती.
इसके बाद वही होता जिसका अभ्यास अमेरिका, इज़राइल और भारत जैसे देशों ने 9/11 के बाद के सालों में किया है: यानी हाइजैक किए गए विमानों को गाइडेड मिसाइल बनने से कैसे रोका जाए. 2001 में, जब 9/11 के हमले हो रहे थे, तो अमेरिकी पायलटों को खुद यह तय करने के लिए अभूतपूर्व आदेश दिए गए थे कि क्या वे किसी शहर के लिए खतरा बने विमान को मार गिराएं. दो अमेरिकी पायलटों ने तो हाइजैक किए गए विमान से अपने जेट टकराने तक के बारे में सोचा था क्योंकि उनके पास गोला-बारूद नहीं था.
अपने ही विमानों को उड़ा देने की ट्रेनिंग
'फाल्कन वर्गो' (Falcon Virgo) एक्सरसाइज़ के तहत, अमेरिका अब महीने में कई बार अगवा किए गए यात्री विमानों को मार गिराने का अभ्यास करता है. इन अभ्यासों में ‘हाईजैकर्स’ द्वारा उड़ाए जाने वाले किराए के कमर्शियल जेट्स शामिल होते हैं, ताकि संभावित आपात स्थितियों का अभ्यास किया जा सके.
भारतीय वायु सेना ने भी ऐसी ही स्थितियों का अभ्यास किया है. सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति ने 5 अगस्त, 2005 को एक नीति को मंज़ूरी दी थी, जिसके तहत दुश्मन के विमान को मार गिराने की इजाज़त है, अगर इस बात के पक्के सबूत हों कि उसका इस्तेमाल रणनीतिक ठिकानों या घनी आबादी वाले इलाकों के खिलाफ मिसाइल की तरह किया जाएगा. हालांकि, भारत में यह फ़ैसला कभी भी पायलट का नहीं होता है.
ग्रुप कैप्टन हेमोंटो पांगिंग पाओ (रिटायर्ड) कहते हैं, "प्रोटोकॉल यह है कि हमारे फाइटर जेट्स अगवा किए गए यात्री विमान के करीब उड़ते हैं ताकि यह देखा जा सके कि कॉकपिट में क्या हो रहा है. अगर हमें पता चलता है कि कॉकपिट के अंदर कोई गड़बड़ हो रही है, तो हम प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) को रिपोर्ट करते हैं. कार्रवाई करने के लिए हमें सीधे PMO से मंज़ूरी मिलती है." Su-30MKI के पूर्व कमांडर के स्क्वाड्रन ने 2008-09 में ऐसी ही स्थितियों का अभ्यास किया था, जब खुफिया जानकारी मिली थी कि बेंगलुरु को निशाना बनाने के लिए अगवा किए गए यात्री विमान का इस्तेमाल किया जा सकता है.
इज़रायल में भी ऐसे ही नियम हैं. 60 मिनट की देरी से इज़रायली कैबिनेट को घटना पर प्रतिक्रिया देने और अपने पायलटों को सही कार्रवाई करने की मंज़ूरी देने के लिए काफ़ी समय मिल जाता. अगर हाइजैक किया गया विमान चेतावनियों को नज़रअंदाज़ करके इज़रायल के हवाई क्षेत्र में उड़ता रहता तो उस पर कार्रवाई करने का आदेश दिया जाता. ये आदेश PM की अध्यक्षता में कैबिनेट की बैठक के बाद दिया जाता है. ऐसी स्थिति में लड़ाकू विमान लगभग निश्चित रूप से तोपों या मिसाइलों का इस्तेमाल करके बोइंग 737 मैक्स 8 को मार गिराते, जिससे सभी 174 यात्रियों और छह क्रू सदस्यों की मौत हो जाती.
इज़रायल और दुनिया के लिए अच्छी बात यह रही कि ऐसा कुछ नहीं हुआ. कैप्टन मछार ने दरवाज़े के नॉब तक पहुंचने के लिए बस इतनी हिम्मत जुटाई कि इस कहानी में एक वीरतापूर्ण मोड़ आ गया और एविएशन के इतिहास में एक शानदार अध्याय जुड़ गया.