मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर दिल्ली की सड़कें नारों और प्रदर्शनों से गूंज रही हैं. कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दल और दूसरी तरफ कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) और आम आदमी पार्टी मोर्चा खोले हुए हैं. सरकार और पुलिस प्रशासन इन प्रदर्शनों की हवा निकालने और कानून-व्यवस्था संभालने की जुगत में पूरी ताकत झोंक रहे हैं. लेकिन, इस सारे हंगामे के बीच सबसे दिलचस्प और रहस्यमयी रवैया चुनाव आयोग का नजर आ रहा है.
आयोग अंदर ही अंदर दो अलग-अलग मोर्चों पर बेहद तेजी से काम कर रहा है. एक तरफ तो नए मतदाताओं को जोड़ने का काम चल रहा है, जहां नए वोटर बनाने से जुड़े फॉर्म 6 को युद्ध स्तर पर निपटाया जा रहा है. कहा जा रहा है कि कोई योग्य मतदाता छूटने न पाए. दूसरी तरफ, अपने ऊपर लग रहे आरोपों पर लगातार सफाई दी जा रही है और नियम-कायदों में आनन-फानन में बदलाव लाए जा रहे हैं. जिस पर विपक्ष सवाल उठा रहा है कि क्या ये सुधार उसकी किसी मजबूरी को उजागर कर रहे हैं? क्या ये इसलिए तो नहीं, क्योंकि उसकी चोरी पकड़ी गई है?
सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे विवाद पर बेहद सख्त रवैया अपनाते हुए भारत सरकार, चुनाव आयोग और खुद मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को नोटिस जारी करके जवाब मांगा है. अदालत ने बेहद कड़े शब्दों में कहा है कि चुनाव आयोग और सरकार को मतदाता सूची में किए गए बदलावों को लेकर बिल्कुल साफ और पारदर्शी तरीके से जवाब देना होगा. याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकीलों ने अदालत में दलील दी कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में करोड़ों वोटरों के नाम चुपचाप लिस्ट से हटा दिए गए हैं. 'विशेष गहन पुनरीक्षण' यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के तहत देशभर में लगभग 13 करोड़ नामों को मतदाता सूची से बाहर कर दिया गया. आयोग का कहना था कि यह कार्रवाई केवल डुप्लीकेट, मृत या पलायन कर गए लोगों के नाम हटाने के लिए की गई थी. लेकिन विपक्ष का दावा है कि दिल्ली, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में आम नागरिकों, खासकर अल्पसंख्यक समुदायों के वैध वोट भी काट दिए गए. बिहार और बंगाल के चुनाव नतीजों पर इसका असर पड़ा है. हालांकि, आंकड़े इन आरोपों को आधार नहीं देते हैं.
बैकफुट पर आयोग
इस पूरे विवाद की चिंगारी तब भड़की जब 'द इंडियन एक्सप्रेस' ने अपनी एक जांच रिपोर्ट में खुलासा किया कि मतदाता सूची को साफ करने के नाम पर ज्ञानेश कुमार ने बाकी दो चुनाव आयुक्तों की आंतरिक स्तर पर दर्जनों आपत्तियों को दरकिनार किया था. इसके बाद तो जैसे सियासत में भूचाल ही आ गया. घिरे हुए चुनाव आयोग ने अपनी छवि बचाने के लिए आनन-फानन में कई बड़े सुधारों का ऐलान कर दिया. पहले तो सफाई दी गई कि फैसलों से पहले चुनाव आयोग के भीतर असहमति होना असामान्य नहीं है. लेकिन, आखिरकार सभी फैसले आम सहमति से लिए गए. लेकिन, कुछ ही दिन बाद चुनाव आयोग ने घोषणा कि अब से आयोग की बैठकों का एजेंडा पहले से जारी किया जाएगा. यानी, ये काम अब तक नहीं हो रहा था.
15 अक्टूबर को 17 राज्यों में शुरू हो रहे स्पेशल समरी रिवीजन (SSR) के तहत आयोग ने 7 बड़े बदलाव और किए:
अब आयोग के ये तमाम सुधार ही उसके खिलाफ सबसे बड़ा हथियार बन गए हैं. विपक्ष चुटकी लेते हुए सवाल पूछ रहा है कि अगर इतनी सारी कमियां थीं और इतने सुधारों की गुंजाइश पहले से मौजूद थी, तो फिर SIR प्रक्रिया को इतनी अफरा-तफरी और जल्दबाजी में क्यों लागू किया गया? वह भी बिहार और बंगाल के चुनाव से ठीक पहले? क्या पहले जानबूझकर गड़बड़ियों को रास्ता दिया गया था?
सुधारों का पुराना इतिहास और नए SIR का संदेह
देखा जाए तो चुनावी व्यवस्था में बदलाव करना आयोग के लिए कोई नई बात नहीं है. कभी यही देश कागजी बैलेट पेपर से चुनाव करवाता था, जहां वोटर की पहचान का कोई पुख्ता डिजिटल जरिया नहीं होता था. फिर समय बदला, वोटर पहचान पत्र बने, ईवीएम (EVM) आई और पारदर्शिता बढ़ाने के लिए वीवीपीएटी (VVPAT) मशीनें जोड़ी गईं. आज वोटर बनने से लेकर लिस्ट जारी होने तक का सारा काम डिजिटल हो चुका है.
लेकिन इस पूरी विकास यात्रा के बीच 23 साल बाद जब अचानक 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (SIR) का जिन्न बाहर निकाला गया, तो विपक्षी दलों के कान खड़े हो गए. खासकर बिहार और पश्चिम बंगाल चुनाव से ठीक पहले जिस तरह SIR लागू किया गया, उसने सियासत गरमा दी. इत्तेफाक से या चुनावी गणित से, इन दोनों ही जगहों पर बीजेपी को भारी जीत हासिल हुई. हालांकि, इससे पहले हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनाव नतीजों ने भी सबको हैरान किया था, जहां बिना किसी SIR के बीजेपी ने बाजी मार ली थी. लेकिन विपक्ष ने ताजा SIR को मुद्दा बनाकर यह नैरेटिव गढ़ दिया है कि देश में संस्थागत तरीके से चुनाव धांधली की जा रही है. और सरकार के पास इस नैरेटिव से निपटने के लिए केवल 'प्रोटेस्ट मैनेजमेंट' यानी प्रदर्शनों को दबाने का ही तरीका बचा है.
नैतिकता की सरकारी दुविधा: चंपत-प्रधान से अलग क्यों हैं ज्ञानेश कुमार?
जब भी विपक्ष वोट चोरी या चुनाव आयोग में गड़बड़ी का आरोप लगाता है, तो केंद्र सरकार के मंत्री और बीजेपी नेता तुरंत आयोग के बचाव में उतर आते हैं. यहीं से विपक्ष को दूसरा बड़ा हमला करने का मौका मिल जाता है. विपक्ष पूछता है कि अगर आरोप एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर लग रहे हैं, तो सत्ताधारी दल उनका प्रवक्ता बनकर ढाल क्यों बन रहा है?
बीजेपी की दुविधा यह है कि वह न तो विपक्ष के आरोपों को अनसुना करके छोड़ सकती है और ना ही चुनाव आयोग का खुलकर पक्ष ले सकती है, क्योंकि ऐसा करने पर उस पर आयोग को नियंत्रित करने के आरोप और गहरे हो जाते हैं.
मामले को ठंडा करने के लिए बीजेपी ज्ञानेश कुमार से यह भी नहीं कह सकती कि वे इस्तीफा दे दें, जैसा कि उसने अतीत में कुछ अन्य मामलों में किया था. उदाहरण के लिए, राम मंदिर ट्रस्ट से जुड़े विवादों में चंपत राय और शिक्षा मंत्रालय व परीक्षा मैनेजमेंट की गड़बड़ियों के बाद धर्मेंद्र प्रधान के मामले में हुआ था. वहां नैतिकता का हवाला देकर तुरंत ऐसे फैसले लिए गए कि विपक्ष को ज्यादा बोलने का मौका ही नहीं मिला. राम मंदिर और शिक्षा मंत्रालय दोनों ही जगह नए नियम, नई व्यवस्थाएं और व्यापक सुधार तुरंत लागू कर दिए गए थे.
लेकिन चुनाव आयोग का मामला किसी मंत्रालय या ट्रस्ट जैसा नहीं है.
मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) का पद एक संवैधानिक पद होता है. उनकी नियुक्ति तो प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली समिति की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा की जाती है. लेकिन संविधान की सबसे बड़ी मर्यादा यह है कि राष्ट्रपति एक बार नियुक्ति करने के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त को अपनी मर्जी से हटा नहीं सकतीं. उन्हें पद से हटाने का एक ही संवैधानिक रास्ता है- संसद में महाभियोग (Impeachment) चलाना.
अब पेंच यह है कि सरकार के पास ज्ञानेश कुमार पर महाभियोग चलाने की कोई वजह नहीं है, और विपक्ष के पास संसद में उतना संख्या बल नहीं है कि वह महाभियोग प्रस्ताव पास करा सके.
उन्हें हटाने का दूसरा रास्ता अदालत से होकर गुजरता है. अगर विपक्ष चाहे तो सुप्रीम कोर्ट में सबूत पेश करके ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कानूनी तौर पर गड़बड़ी सिद्ध कर सकता है. लेकिन यह रास्ता बेहद लंबा, जटिल और जोखिम भरा है. विपक्ष के पास चुनावों के इस दौर में इतना लंबा इंतजार करने का वक्त नहीं है. इसके अलावा, सबसे बड़ा रिस्क यह है कि अगर कोर्ट का फैसला आयोग के हक में आ गया, तो विपक्ष का पूरा नैरेटिव एक झटके में ध्वस्त हो जाएगा.
सत्ता का धर्मसंकट और विपक्ष का दांव
ऐसी उलझी हुई स्थिति में विपक्ष के लिए सबसे मुफीद और आसान रास्ता यही है कि ज्ञानेश कुमार और मोदी सरकार पर लगातार नैतिक दबाव बनाया जाए. जनता के बीच यह संदेश देने की कोशिश की जाए कि सत्ताधारी दल की चुनावी मशीनरी को असली ईंधन और ताकत चुनाव आयोग से ही मिल रही है.
सरकार की असली लाचारी यह है कि इन राजनीतिक आरोपों को एक झटके में खारिज करने के लिए उसके पास कोई सीधा हथियार नहीं है. संवैधानिक मर्यादाओं के कारण न तो वह आयोग का आधिकारिक पक्ष रख सकती है और न ही यह राजनीतिक दांव चल सकती है कि 'लीजिए, हम मुख्य चुनाव आयुक्त को हटा देते हैं, आप अपनी पसंद का अफसर बैठा लीजिए और फिर हम चुनाव जीतकर दिखाएंगे.'
सरकार के लिए यहां संविधान की मर्यादा रखना धर्मसंकट बन गया है. न तो वह चंपत राय और प्रधान के मामलों की तरह इसे निपटा सकती है, और न ही ज्ञानेश कुमार का खुलकर बचाव कर सकती है. विपक्ष इस मुद्दे पर जब तक चाहे, तब तक खेल सकता है. अब उसके लिए हर चुनाव नतीजा मोदी सरकार और चुनाव आयोग की मिलीभगत से एक बेइमानी है.