मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (CPI-M) के राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास ने केंद्र सरकार से अयोध्या के राम मंदिर परिसर का प्रबंधन करने वाले श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को सूचना के अधिकार (RTI) कानून के दायरे में लाने पर पुनर्विचार करने की मांग की है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को 4 जुलाई को लिखे पत्र में ब्रिटास ने कहा कि ट्रस्ट को RTI के दायरे में लाने से पारदर्शिता और सार्वजनिक जवाबदेही सुनिश्चित होगी.
राम मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए गए दान में कथित गबन के विवाद के बीच यह मांग सामने आई है. जॉन ब्रिटास ने अपने पत्र में कहा कि नवंबर 2019 में अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद केंद्र सरकार ने ट्रस्ट के संचालन की योजना तैयार की, राजपत्र अधिसूचना के जरिए उसका गठन किया और अधिग्रहित जमीन ट्रस्ट को सौंपी. उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि ट्रस्ट के 15 सदस्यों में से शुरुआती 12 सदस्यों का नामांकन सरकार ने किया था.
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जॉन ब्रिटास ने 6 जून 2025 को केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के उस आदेश का भी हवाला दिया, जिसमें ट्रस्ट को RTI कानून के तहत सार्वजनिक प्राधिकरण नहीं माना गया था. उन्होंने कहा कि यह फैसला काफी हद तक गृह मंत्रालय के रुख पर आधारित था और मंत्रालय को अपने दृष्टिकोण की समीक्षा करनी चाहिए. राज्यसभा सांसद ने तर्क दिया कि केंद्र सरकार का यह कहना कि ट्रस्ट सरकारी अधिसूचना के जरिए स्थापित या गठित नहीं हुआ, सिर्फ इसलिए सही नहीं माना जा सकता क्योंकि अधिसूचना सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के पालन में जारी की गई थी.
उन्होंने कहा कि RTI कानून की धारा 2(h)(d) में इस बात का कोई अंतर नहीं किया गया है कि अधिसूचना सरकार ने स्वतंत्र रूप से जारी की हो या न्यायालय के निर्देश पर. जॉन ब्रिटास ने यह भी कहा कि ट्रस्ट की संचालन व्यवस्था में केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार का प्रतिनिधित्व करने वाले कार्यरत आईएएस अधिकारी शामिल हैं, जो इस बात का प्रमाण है कि इसमें सरकार की भागीदारी है. ब्रिटास ने कहा कि ट्रस्ट का सार्वजनिक चरित्र उसके कार्यों से भी स्पष्ट होता है, क्योंकि वह देश के सबसे श्रद्धेय धार्मिक स्थलों में से एक का प्रबंधन करता है.
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जॉन ब्रिटास ने कहा कि राम मंदिर ट्रस्ट संसद के कानून के तहत अधिग्रहित जमीन का संचालन करता है और देश-विदेश के लाखों श्रद्धालुओं से दान प्राप्त करता है. सीपीआईएम सांसद ने कहा कि जनता द्वारा ट्रस्ट पर जताया गया असाधारण विश्वास पारदर्शिता की मजबूत अपेक्षा भी पैदा करता है. उन्होंने श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड का उदाहरण देते हुए कहा कि संस्थागत स्वायत्तता और सार्वजनिक जवाबदेही एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं. उन्होंने कहा कि वैधानिक या सरकारी ढांचे के तहत स्थापित धार्मिक संस्थाएं धार्मिक मामलों में स्वायत्तता बनाए रखते हुए भी प्रशासनिक और वित्तीय पारदर्शिता के साथ काम करती हैं.