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"रोजगार, शिक्षा और विज्ञान छोड़ 'तू-तू मैं-मैं' में उलझा देश", कांग्रेस नेता सैम पित्रोदा ने युवाओं से की असली मुद्दों पर बात करने की अपील

सैम पित्रोदा ने शिकागो में दिए इंटरव्यू में पीएम मोदी के खिलाफ गालियों को नजरअंदाज करने लायक बताया और सीएए विरोधी युवाओं की तारीफ की. उन्होंने मंदिर की जगह स्कूल बनाने की अपनी बात दोहराई और कहा कि देश की संस्थाएं जैसे न्यायपालिका, चुनाव आयोग और ईडी अब स्वतंत्र नहीं रहीं.

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सैम पित्रोदा बोले- मंदिरों की बहस छोड़ शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य पर हो चर्चा (Photo: ITG)
सैम पित्रोदा बोले- मंदिरों की बहस छोड़ शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य पर हो चर्चा (Photo: ITG)

कांग्रेस नेता सैम पित्रोदा ने एक बार फिर अपने बयान से चर्चा छेड़ दी है. उन्होंने कहा है कि देश में धर्म और मंदिरों को लेकर जो लगातार बहस चल रही है, वह भारत के भविष्य के लिए सही रास्ता नहीं है. पित्रोदा के मुताबिक कुछ लोग नफरत और धार्मिक मतभेदों को बढ़ावा दे रहे हैं और इसी वजह से शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और विज्ञान जैसे असली मुद्दे पीछे छूट जाते हैं. उन्होंने "राम भगवान" और "हनुमान" का जिक्र करते हुए कहा कि ऐसी बातों पर अटकी बहस युवाओं को सही दिशा नहीं दे सकती.

पित्रोदा ने अपने बयान में कहा कि भारत का भविष्य तर्क और वैज्ञानिक सोच में है. उनके अनुसार, देश को आगे बढ़ने के लिए तार्किक और विवेकपूर्ण सोच की जरूरत है, न कि धर्म और मंदिरों को लेकर होने वाली रोजाना की बहस की. उन्होंने यह भी कहा कि भारत का भविष्य दूसरे लोगों के प्रति सम्मान और इंसानी गरिमा में छिपा है. साथ ही उन्होंने बातचीत में शालीनता और महिलाओं के सम्मान पर भी जोर दिया.

पित्रोदा ने कहा कि देश में बच्चों की चिंता, अच्छी और सस्ती शिक्षा, अच्छी और सस्ती स्वास्थ्य सेवाएं, साफ पानी, बेहतर पर्यावरण और पर्याप्त ऊर्जा जैसे मुद्दों पर बात होनी चाहिए. उनका कहना है कि यही वे असली समस्याएं हैं जिन पर राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए. लेकिन दुख की बात यह है कि इन मुद्दों पर बातचीत बहुत कम होती है.

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यह भी पढ़ें: EXCLUSIVE: 'राहुल गांधी पर विदेश में नजर रखी जाती है', सैम पित्रोदा का केंद्र सरकार पर बड़ा आरोप

अपने बयान में पित्रोदा ने यह भी कहा कि देश की बहस अक्सर "तू-तू मैं-मैं" यानी एक-दूसरे पर आरोप लगाने में ही उलझी रहती है. उन्होंने कहा कि बहस इस बात पर आकर रुक जाती है कि किसने क्या कहा, राम भगवान ने क्या कहा या हनुमान ने क्या कहा. उनके मुताबिक यह तरीका देश की युवा पीढ़ी को सही दिशा दिखाने के लिए ठीक नहीं है.

सैम पित्रोदा ने इंटरव्यू में पीएम मोदी के खिलाफ इस्तेमाल हो रही गालियों का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि उन्हें यह पसंद नहीं है, लेकिन चूंकि ये युवा हमारे ही बच्चे हैं इसलिए इसे नजरअंदाज किया जा सकता है. इसके साथ ही उन्होंने कहा कि सीएए के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले युवाओं में अब बोलने का साहस आ गया है. उनके मुताबिक यह पीढ़ी बिना किसी डर के अपनी बात रख रही है और इंस्टाग्राम के जरिए नए तरीके से अपनी बात लोगों तक पहुंचा रही है.

पित्रोदा ने आगे कहा कि 2014 में बीजेपी के सत्ता में आने के बाद से देश में लोकतंत्र लगातार खतरे में है. उनके मुताबिक प्रधानमंत्री कार्यालय में सत्ता का जरूरत से ज्यादा केंद्रीकरण होने से संस्थाएं कमजोर हुई हैं.

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पित्रोदा ने पीएम मोदी की "दिमागी नक्सल" वाली टिप्पणी पर भी जवाब दिया. उनका कहना था कि गरीबों, दलितों और अल्पसंख्यकों के लिए बोलना नक्सलवाद नहीं है, बल्कि यह इंसानियत है. जीडीपी में 7.8 प्रतिशत की वृद्धि पर उन्होंने सवाल उठाया कि क्या यह विकास सिर्फ कुछ लोगों तक सीमित है या आम जनता तक भी पहुंच रहा है. आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के बयान पर उन्होंने कहा कि अल्पसंख्यक समुदायों से पूछा जाए कि उन्हें आज देश में कैसा महसूस होता है.

संसद के मानसून सत्र पर उन्होंने कहा कि वहां सिर्फ चीख पुकार होती है, लेकिन राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे ने अच्छा बोला. अंत में उन्होंने कहा कि पिछले 70 सालों में जो संस्थाएं बनीं, उनके मुकाबले पिछले 14 सालों में कोई नई संस्था नहीं बनी.

पित्रोदा ने युवाओं से अपील की कि वे आगे आएं और देश के असली भविष्य के बारे में सोचें. उनका मानना है कि जब तक असली मुद्दों पर बात नहीं होगी, तब तक देश का सही विकास मुश्किल है. यह बयान एक बार फिर राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया है, क्योंकि इसमें धार्मिक शख्सियतों का सीधा उल्लेख किया गया है.

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