चुनाव आयोग में अगर मुख्य चुनाव आयुक्त और बाकी चुनाव आयुक्तों की राय अलग-अलग हो जाए तो अंतिम फैसला किसका चलेगा? क्या CEC होने के नाते उनके पास अपने साथी चुनाव आयुक्तों की राय को खारिज करने का अधिकार है? या फिर तीन सदस्यीय आयोग में CEC भी बहुमत के फैसले से बंधे होते हैं? इस सवाल का जवाब भारत के संविधान और उससे जुड़े कानून में काफी स्पष्ट है.
संविधान में क्या व्यवस्था है?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग की नींव है. इसमें कहा गया है कि चुनावों का सुपरविजन, निर्देशन और नियंत्रण निर्वाचन आयोग में निहित होगा.
अनुच्छेद 324(1) चुनावों का सुपरविजन, निर्देशन और नियंत्रण, निर्वाचन आयोग में निहित करता है.
अनुच्छेद 324(2) कहता है कि आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और उतने अन्य चुनाव आयुक्त होंगे, जितने राष्ट्रपति समय-समय पर तय करें.
अभी भारत में एक मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्त होते हैं.
अनुच्छेद 324(3) के अनुसार, जब अन्य चुनाव आयुक्त नियुक्त होते हैं, तो मुख्य चुनाव आयुक्त आयोग के अध्यक्ष (Chairman) के रूप में कार्य करेंगे. लेकिन संविधान में यह नहीं लिखा है कि हर मामले में CEC की राय अंतिम होगी.
यहीं एक महत्वपूर्ण फर्क समझना जरूरी है. संविधान CEC को आयोग का अध्यक्ष तो बनाता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हर मुद्दे पर उनका फैसला अंतिम होगा. सुप्रीम कोर्ट ने 1995 के ऐतिहासिक टीएन शेषन बनाम भारत संघ मामले में इस सवाल की विस्तार से व्याख्या की थी.
अदालत ने साफ कहा था कि जब चुनाव आयोग बहुसदस्यीय होता है तो चुनाव आयुक्त भी आयोग का अभिन्न हिस्सा होते हैं और उन्हें निर्णय प्रक्रिया में अपनी राय रखने का अधिकार है. अगर CEC की बात ही हमेशा अंतिम मान ली जाए तो दूसरे चुनाव आयुक्त प्रभावी तौर पर केवल 'सलाहकार' बनकर रह जाएंगे. सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया.
तो फिर मतभेद होने पर फैसला कैसे होगा?
सवाल है कि अगर किसी मुद्दे पर मुख्य चुनाव आयुक्त और दूसरे आयुक्तों के बीच की राय अलग अलग हो तो क्या होगा? जैसा कि इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी एक रिपोर्ट में दावा किया है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया से जुड़े फैसलों और आदेशों पर औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई.
इनकी आपत्तियां आपत्तियां मुख्य रूप से फॉर्म-6 में बदलाव, वोटर नाम हटाने-जोड़ने, अपीलों और वोटर डेटाबेस के नियंत्रण से संबंधित थीं.
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इस प्रश्न का जवाब मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल से जुड़े कानून में है. इस कानून का नाम Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners Act, 2023 है.
इस कानून के मुताबिक आयोग का काम जहां तक संभव हो सर्वसम्मति से किया जाना चाहिए. लेकिन अगर CEC और अन्य चुनाव आयुक्तों के बीच किसी मुद्दे पर मतभेद हो जाए तो मामला बहुमत की राय के आधार पर तय होगा.
यानी तीन सदस्यीय आयोग में अगर दो चुनाव आयुक्त एक राय पर हैं और CEC उनसे अलग राय रखते हैं, तो केवल CEC होने के कारण उनकी राय को अंतिम नहीं माना जा सकता. उसी तरह अगर CEC और एक चुनाव आयुक्त एक राय पर हैं और तीसरा आयुक्त अलग राय रखता है, तो दो सदस्यों की राय के मुताबिक फैसला होगा.
इसे इस तरह भी कहा जा सकता है कि CEC आयोग के चेयरमैन हैं, लेकिन 'वन मैन अथॉरिटी' नहीं.
कानूनी संदर्भ में इसे ‘First Among Equals’ यानी कि 'बराबरों में पहला' कहा जाता है.
इसका अर्थ यह है कि CEC आयोग के अध्यक्ष तो होंगे लेकिन आयोग के एकमात्र निर्णायक नहीं.
यही वजह है कि चुनाव आयोग में किसी चुनाव आयुक्त का dissent यानी असहमति जताना अपने आप में नियमों के खिलाफ नहीं है. असहमति के बावजूद अंतिम फैसला बहुमत से हो सकता है.
1995 में सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?
टीएन शेषन के मामले में यही सवाल मूल विवाद का हिस्सा था. जब 1993 में चुनाव आयोग को बहुसदस्यीय बनाया गया और एमएस गिल और जीवीजी कृष्णमूर्ति को चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया, तब शेषन ने इस व्यवस्था को चुनौती दी थी.
सुप्रीम कोर्ट ने 1995 में बहुसदस्यीय आयोग की संवैधानिक वैधता बरकरार रखी. अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि चुनाव आयुक्तों को सिर्फ CEC को सलाह देने वाले अधिकारी के रूप में नहीं देखा जा सकता. वे खुद आयोग का हिस्सा हैं और निर्णय लेने में उनकी भूमिका है.
अदालत की व्याख्या का एक अहम हिस्सा यह था कि अगर CEC को हर मामले में अंतिम फैसला करने का अधिकार दे दिया जाए तो बाकी चुनाव आयुक्तों की भूमिका महज औपचारिक हो जाएगी. लेकिन संविधान में ऐसा कहीं नहीं लिखा गया है.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, "If the CEC is considered to be superior in the sense that his word is final, he would render the ECs non-functional or ornamental. Such an intention is difficult to cull out from Article 324, nor can we attribute it to the Constitution makers."
यानी कि "अगर CEC की बातों को सुपीरियर मानकर उसे अंतिम समझ लिया जाए तो इससे वे चुनाव आयुक्तों की भूमिका सजावटी मात्र हो जाएगी. आर्टिकल 324 से ऐसी मंशा निकालना मुश्किल है, और न ही हम इसे संविधान बनाने वालों की भावना मान सकते हैं.”
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि पदाधिकारियों की यह ज़िम्मेदारी है कि वे यह पक्का करें कि उनके बीच कोई अहंकार का टकराव न हो. कोर्ट ने कहा था, "हम इस बात को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते कि जब संविधान बनाने वालों ने एक से ज़्यादा सदस्यों वाले चुनाव आयोग का प्रावधान किया था, तो उन्हें इस बात का अंदाज़ा था कि सभी मुद्दों पर सहमति नहीं बन सकती है; लेकिन उन्हें उम्मीद रही होगी कि इतने ऊंचे ओहदे पर बैठे अधिकारी अपने मतभेदों को गरिमापूर्ण तरीके से सुलझा लेंगे."
CEC की स्थिति फिर अलग क्यों है?
इसका मतलब यह नहीं कि CEC और बाकी चुनाव आयुक्तों के पद हर मायने में बिल्कुल समान हैं. संविधान CEC को आयोग का चेयरमैन बनाता है और उसके पद की सुरक्षा भी अलग तरीके से तय करता है. अनुच्छेद 324(5) के मुताबिक CEC को सुप्रीम कोर्ट के जज की तरह ही प्रक्रिया और आधार पर हटाया जा सकता है, जबकि किसी अन्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए CEC की सिफारिश जरूरी है.
यही अंतर देखकर कभी-कभी यह धारणा बनती है कि CEC आयोग में सर्वोच्च प्राधिकारी हैं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने शेषन मामले में स्पष्ट किया कि CEC की विशेष संवैधानिक सुरक्षा का मतलब यह नहीं है कि दूसरे चुनाव आयुक्त निर्णय प्रक्रिया में उनके अधीनस्थ हैं। वे भी आयोग के सदस्य हैं।
क्या CEC साथी की राय को 'खारिज' कर सकते हैं?
यहां यह समझना जरूरी है कि CEC किसी चुनाव आयुक्त की अलग राय को अपनी राय से बदल नहीं सकते. लेकिन अगर किसी मामले में बहुमत CEC के पक्ष में है तो आयोग का फैसला उनकी राय के मुताबिक हो सकता है. दूसरी तरफ, CEC अल्पमत में हों और बाकी दो आयुक्त एक राय पर हों तो बहुमत का फैसला लागू होगा.
यही वजह है कि चुनाव आयोग में dissent यानी असहमति अपने आप में संवैधानिक संकट नहीं है. तीन सदस्यीय आयोग में अलग राय होना व्यवस्था का हिस्सा है. असली सवाल यह होता है कि उस असहमति को किस तरह दर्ज किया गया, निर्णय किस प्रक्रिया से हुआ और क्या बहुमत का फैसला कानून के मुताबिक लिया गया.
सभी निर्णय पिछले एक वर्ष में पूर्ण आयोग के सर्वसम्मत निर्णयों का परिणाम: EC
इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित रिपोर्ट पर चुनाव आयोग ने बुधवार को जारी अपनी सफाई में भी कहा है, "किसी भी संस्था में विचार-विमर्श के दौरान अलग-अलग राय और टिप्पणियां होना एक सामान्य बात है. अंतिम निर्णय लेने से पहले निर्णय लेने की प्रक्रिया में ये शामिल होते हैं. न केवल तीनों आयुक्त, बल्कि आयोग का हर अधिकारी चुनावी व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए आयोग को अपने सुझाव देने के लिए पूरी तरह से अधिकृत है."
चुनाव आयोग ने आगे कहा कि, " 10 महीनों की अवधि में कुछ खास आंतरिक नोट/टिप्पणियों को उजागर करना, जबकि बड़ी संख्या में मंजूरियों, निर्णयों, निर्देशों और पहलों को नजरअंदाज करना, स्थिति का केवल एक ही पहलू दिखाता है. हाल के महीनों में आयोग ने कई निर्णय लिए हैं, निर्देश जारी किए हैं, लगभग 40 नई पहलें शुरू की हैं और देश भर में मतदाता सूची संशोधन (SIR सहित) के संचालन सहित कई चुनावी सुधार किए हैं. ये सभी निर्णय पिछले एक वर्ष में पूर्ण आयोग के सर्वसम्मत निर्णयों का परिणाम हैं."
संविधान CEC को विशेष सुरक्षा देता है लेकिन फैसला लेने में उसे कोई विशेष वीटो पावर नहीं देता. तीन सदस्यीय आयोग की व्यवस्था का मकसद ही सामूहिक निर्णय और संतुलन बनाए रखना है.