दुनिया भले ही लगातार अलग-अलग खेमों में बंटती दिख रही हो, लेकिन ग्लोबल साउथ के बढ़ते प्रभाव से दुनिया में नए शक्ति केंद्र बन रहे हैं. BRICS इस बदलाव का एक प्रमुख मंच बनकर उभर रहा है. भारत में दक्षिण अफ्रीका के हाई कमिश्नर अनिल सूकलाल का मानना है कि BRICS की बढ़ती अहमियत को सिर्फ बैठकों की संख्या से नहीं, बल्कि उसके सदस्य देश मिलकर क्या हासिल कर पाते हैं, इससे समझना चाहिए.
12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में BRICS Summit होने वाला है. इससे पहले इंडिया टुडे के BRICS Roundtable के ‘Africa Rising: BRICS’ Next Frontier’ सत्र में सूकलाल ने भारत में आयोजित G20 Summit का उदाहरण दिया. उन्होंने कहा कि भू-राजनीतिक मतभेदों के बावजूद ग्लोबल साउथ के देश एक साथ आकर बड़े स्तर पर काम कर सकते हैं और दुनिया के सामने अपनी क्षमता दिखा सकते हैं.
सूकलाल ने कहा, नेताओं का एक साथ आना यह संदेश देता है कि ग्लोबल साउथ दुनिया में अपनी ताकत के साथ काम करने में सक्षम है. उन्होंने कहा कि तेजी से बदलती दुनिया में BRICS की भूमिका को भी इसी नजरिए से देखना चाहिए. उन्होंने कहा कि BRICS की शुरुआत के बाद से इसमें काफी बदलाव आया है और वैश्विक व्यवस्था बदलने के साथ यह समूह आगे भी बदलता रहेगा. सूकलाल ने मौजूदा अंतरराष्ट्रीय माहौल को “वैश्विक अव्यवस्था” बताया. उन्होंने संयुक्त राष्ट्र, विश्व व्यापार संगठन (WTO), विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और यूनेस्को (UNESCO) जैसी संस्थाओं के सामने बढ़ती चुनौतियों का भी जिक्र किया.
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‘देश अपनी विशेष स्थिति छोड़ना नहीं चाहते’
सूकलाल ने कहा कि वैश्विक व्यवस्था में सुधार, खासकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में सुधार, BRICS के लिए एक बड़ा मुद्दा है, उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर करीब दो दशक से चर्चा हो रही है, लेकिन अब तक ज्यादा प्रगति नहीं हुई है. इसकी वजह यह है कि जिन देशों के पास विशेष अधिकार और ताकत है, वे उसे छोड़ना नहीं चाहते.
बीजिंग और मॉस्को के रुख के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने 2023 में चीन और रूस के बीच UNSC सुधार को लेकर हुई घोषणा का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि वैश्विक व्यवस्था में बदलाव की मांग करने वाले समूहों में BRICS भी शामिल है.
बदल रही है वैश्विक वित्तीय व्यवस्था
सूकलाल ने BRICS की आर्थिक क्षमता पर भी बात की. उन्होंने कहा कि समूह के देश भुगतान के वैकल्पिक तरीकों को विकसित करने पर काम कर रहे हैं. इसके लिए सदस्य देशों के वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंकों के गवर्नरों को वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था तलाशने की जिम्मेदारी दी गई है.
उन्होंने सवाल उठाया कि उभरती अर्थव्यवस्थाओं ने पहले अपनी वित्तीय व्यवस्था क्यों नहीं बनाई, उनके मुताबिक, दुनिया की वित्तीय व्यवस्था पहले ही तेजी से बदल रही है. सूकलाल ने यह भी कहा कि डॉलर पर निर्भरता कम होना केवल BRICS की वजह से नहीं है. यह अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था में हो रहे बड़े बदलाव का हिस्सा है. हालांकि, उन्होंने माना कि BRICS अपने ढांचे को सदस्य देशों के बीच ज्यादा व्यापार में बदलने में अब तक धीमा रहा है. उन्होंने कहा कि इसमें सरकारों के साथ निजी क्षेत्र की भूमिका भी बढ़नी चाहिए.
‘BRICS में द्विपक्षीय विवाद न लाएं’
सदस्य देशों के बीच मतभेदों के बावजूद सूकलाल का मानना है कि BRICS साझा मुद्दों पर आगे बढ़ सकता है, अगर देशों के आपसी विवादों को समूह के व्यापक एजेंडे से अलग रखा जाए. उन्होंने यूरोपीय संघ और अमेरिका-कनाडा के बीच मतभेदों का उदाहरण देते हुए कहा कि अलग-अलग हित रखने वाले देश भी बड़े समूहों के भीतर साथ काम कर सकते हैं.
भारत और चीन के बीच तनाव और गलवान की घटना का जिक्र करते हुए सूकलाल ने कहा कि दोनों देशों के द्विपक्षीय विवाद BRICS का मुद्दा नहीं बने हैं. उन्होंने कहा, “अपने द्विपक्षीय मुद्दों को यहां लाकर दूसरों के लिए बोझ न बनाएं. उनका कहना था कि देशों को ऐसे मतभेदों को अलग रखते हुए उन मुद्दों पर काम करना चाहिए, जिन पर सभी के बीच सहमति बन सकती है.
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