उसे लगा था 550 से 600 नंबर आएंगे... रिजल्ट में 141 अंक मिले. फिर उसने ऐसा कदम उठाया, जिसने पूरे परिवार की दुनिया बदल दी. डॉक्टर बनना उसका सपना था. स्कूल में पढ़ाई अच्छी थी. परिवार को भरोसा था कि बेटी एक दिन सफेद कोट पहनकर लोगों का इलाज करेगी. खुद उसे भी यकीन था कि NEET में अच्छे अंक आएंगे. उसने अपने मन में 550 से 600 नंबर तक की उम्मीद बांध रखी थी. लेकिन जब रिजल्ट आया, तो स्क्रीन पर सिर्फ 141 अंक दिखाई दिए.
परिवार के मुताबिक, यहीं से वह अंदर ही अंदर टूटने लगी. मामला महाराष्ट्र के सातारा जिले के कराड तालुका के शेरे स्टेशन गांव का है. यहां रहने वाली 18 साल की समीक्षा दीपक पवार की इलाज के दौरान मौत हो गई. परिजनों का कहना है कि NEET परीक्षा में उम्मीद से कम अंक आने के बाद वह मानसिक तनाव में थी.
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समीक्षा बचपन से पढ़ाई में अच्छी थी. उसने आर्मी पब्लिक स्कूल से पढ़ाई की और बाद में कराड में 12वीं पूरी कर मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET की तैयारी कर रही थी. परिवार के अनुसार, उसे भरोसा था कि परीक्षा में अच्छे नंबर आएंगे और डॉक्टर बनने का सपना पूरा होगा.
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लेकिन रिजल्ट आने के बाद उसने अपना स्कोर फैमिली से छिपा लिया. कुछ दिनों बाद उसकी तबीयत बिगड़ने लगी. परिवार उसे अस्पताल लेकर पहुंचा. डॉक्टरों और परिजनों ने कई बार पूछा कि आखिर परेशानी क्या है, लेकिन उसने कुछ नहीं बताया.
आखिरकार परिवार ने उसकी करीबी दोस्त को अस्पताल बुलाया. परिवार के अनुसार, दोस्त से बातचीत के दौरान समीक्षा ने बताया कि कम अंक आने से वह इतनी परेशान हो गई थी कि उसने चूहों को मारने के लिए इस्तेमाल होने वाला जहर खा लिया था. इसके बाद उसकी हालत बिगड़ती गई और इलाज के दौरान 27 जुलाई को अस्पताल में उसकी मौत हो गई.

समीक्षा के पिता दीपक पवार भारतीय सेना में 20 साल तक सेवा के बाद रिटायर हो चुके हैं. उन्होंने भावुक होकर कहा कि मेरी बेटी बचपन से पढ़ाई में बहुत होशियार थी. डॉक्टर बनना ही उसका सपना था. जो हमारे साथ हुआ, वह किसी भी परिवार के साथ नहीं होना चाहिए. छात्रों पर इतना मानसिक दबाव क्यों है, इस पर प्रशासन को गंभीरता से विचार करना चाहिए.
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समीक्षा की मां शीतल पवार ने कहा कि मेरी बेटी बहुत आत्मविश्वासी थी. उसे खुद पर पूरा भरोसा था. उसने कभी असफलता स्वीकार करने के बारे में नहीं सोचा था. परिणाम आने के बाद वह अंदर से पूरी तरह टूट गई थी. उसने हमें कुछ भी नहीं बताया.
भाई महेश पवार ने कहा कि हम दोनों बचपन से साथ पढ़े. वह हमेशा टॉपर रही. डॉक्टर बनने का उसका सपना था. परिणाम आने के बाद वह बिल्कुल शांत हो गई थी. हमें अंदाजा भी नहीं था कि वह इतना बड़ा कदम उठा लेगी.

पवार परिवार ने प्रतियोगी परीक्षाओं में अनिश्चितता, पेपर लीक की घटनाओं, छात्रों पर बढ़ते मानसिक दबाव और शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए हैं. परिवार का कहना है कि हमारी बेटी के साथ जो हुआ, वैसा किसी भी छात्र के साथ दोबारा नहीं होना चाहिए. उनका कहना है कि ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए छात्रों को बेहतर मानसिक सपोर्ट और परामर्श की जरूरत है. इस मामले में कराड के उपविभागीय पुलिस अधिकारी ने कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। पुलिस मामले की जांच कर रही है.
हर साल लाखों छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं के दौरान गुजरते हैं. परीक्षा का परिणाम महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन किसी छात्र की जिंदगी उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है. अगर कोई छात्र या परिवार ऐसे तनाव से जूझ रहा हो, तो समय रहते अपनों, शिक्षकों या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों से मदद लेना बेहद जरूरी है.