केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह 'गुजरात विद्यापीठ' के 72वें दीक्षांत समारोह में शामिल हुए. इस दौरान उन्होंने अपने जीवन के संघर्षों, गांधीवादी विचारों और राष्ट्रीय कर्तव्यों पर चर्चा की. उन्होंने अपनी आपबीती सुनाते हुए कहा कि हर किसी की जिंदगी में मुश्किलें आती हैं, लेकिन अगर लक्ष्य बड़ा हो तो इंसान कभी निराश नहीं होता.
गृह मंत्री अमित शाह कहा कि लक्ष्य सिर्फ अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि देश, समाज और गरीबों के कल्याण के लिए तय करना चाहिए. उन्होंने कहा, 'जब आप बड़े और निस्वार्थ मकसद के साथ आगे बढ़ते हैं, तो जिंदगी में कितनी भी मुश्किलें और संघर्ष आए, निराशा कभी पास नहीं फटकती.'
अमित शाह ने सलाह दी कि जिंदगी में बहुत उतार-चढ़ाव आते हैं, विद्यापीठ छोड़ने से पहले अपनी जिंदगी लक्ष्य जरूर तय करें. काम होगा या नहीं ये नहीं सोचना चाहिए, काम करने जैसा है या नहीं ये सोचना चाहिए. ऐसा मुझे किसी बड़े आदमी ने कहा था.
'मैंने भी जीवन में बहुत मुश्किलें झेली...'
उन्होंने आगे कहा, 'मैंने भी जीवन में बहुत मुश्किलें झेली हैं, लेकिन कभी निराशा नहीं आई. क्योंकि मेरा लक्ष्य कभी अपने या अपने परिवार के लिए नहीं था. भगवान की कृपा से हर लड़ाई लड़कर बाहर निकला.'
अमित शाह ने अपनी मातृभाषा और स्वदेशी संस्कृति पर बात करते हुए कहा, 'मैं अपनी भाषा में बोलूंगा तो छोटा हो जाऊंगा- इस हीनभावना से बड़ा कोई पाप नहीं हो सकता. भाषा ही हमें देश के संस्कार, इतिहास और हमारी जड़ों से जोड़ती है.'
उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी जी का मानना था कि आजादी तब तक अधूरी है, जब तक हमारी भाषा, संस्कृति और श्रम राष्ट्रीय न हो. स्वभाषा के बिना सच्चे स्वराज की कल्पना नहीं की जा सकती. भारतीय जीवन-पद्धति और जीवन मूल्य ही गांधी जी के संदेश का मूल आधार हैं, इसलिए उनके विचार कभी प्रासंगिक होना बंद नहीं होंगे.
खादी और ग्राम स्वराज का नया दौर
अमित शाह ने अपनी जिंदगी के बारे में बात करते हुए कहा, 'मेरी मां ने मुझे जीवनभर खादी पहनने का संकल्प दिलाया था.' उन्होंने खादी की प्रगति के आंकड़े पेश करते हुए बताया कि 2013-14 में खादी ग्रामोद्योग का टर्नओवर 31 हजार करोड़ रुपये था, जो 2025-26 में बढ़कर 1 लाख 87 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गया है.
सच्ची शिक्षा और नवनिर्माण नहीं 'पुनर्निर्माण'
अमित शाह ने शिक्षा को लेकर कहा कि जो हाथ को कौशल, दिल को संवेदना और दिमाग को ज्ञान के साथ समझ भी दे, वही असल शिक्षा है. 18 अक्टूबर 1920 को स्थापित 'गुजरात विद्यापीठ' हमेशा से भारतीय शिक्षा व्यवस्था की प्रयोगशाला रहा है.
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उन्होंने कहा कि गांधी जी ने 'नवनिर्माण' की जगह 'पुनर्निर्माण' की बात कही थी. इसी सोच पर चलते हुए मोदी सरकार संस्कृति, समृद्धि, सुरक्षा, आत्मनिर्भरता और ग्राम स्वराज को आधार बनाकर देश को आगे बढ़ा रही है.