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सड़कें रोक दी जाती हैं, ट्रैफिक थम जाता है... जब दिल्ली में निकलता है VIP का काफिला, RTI में खुलासा

दिल्ली में वीआईपी काफिलों के दौरान ट्रैफिक रोकने, शिकायतों का रिकॉर्ड रखने और लोगों को होने वाली देरी का हिसाब बताने पर दिल्ली पुलिस आरटीआई में साफ जवाब नहीं दे सकी. दूसरी तरफ वीआईपी सुरक्षा के लिए किराये की गाड़ियों पर चार साल में 43 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च हुए हैं.

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जब दिल्ली में निकलता है VIP काफिला. (Photo: PTI)
जब दिल्ली में निकलता है VIP काफिला. (Photo: PTI)

जब वीआईपी मूवमेंट होता है, दिल्ली की सड़कें थम जाती हैं. सिग्नल हरा हो जाता है, लेकिन गाड़ियां नहीं बढ़तीं. आगे कहीं काफिला गुजर रहा होता है. सायरन बजते हैं, पुलिसकर्मी इशारा करते हैं और दो मिनट का इंतजार कई बार 20 मिनट तक पहुंच जाता है. इस दौरान एंबुलेंस रुकी रहती हैं, स्कूल बसों में बच्चे बेचैन होते हैं. किसी की नौकरी का इंटरव्यू, किसी की फ्लाइट, किसी की अस्पताल पहुंचने की आखिरी कोशिश बीच रास्ते में अटक जाती है. फिर भी लोगों को न यह बताया जाता है कि रोक क्यों लगी, न यह कि कितनी देर लगेगी, और न ही यह कि यह सुविधा किसे मिली.

आजतक ने इस बारे में दिल्ली पुलिस से सीधे सवाल किए. इसके लिए दो अलग-अलग आरटीआई आवेदन लगाए गए. इन जवाबों में जितनी जानकारी मिली, उससे ज्यादा उनकी चुप्पी ने बहुत कुछ बता दिया.

पहले सेट में सवाल सीधे थे. दिल्ली की सड़कों पर वीआईपी ट्रीटमेंट किसे मिलता है. ट्रैफिक कब और किन नियमों के आधार पर रोका जाता है. 2020 से अब तक ऐसा कितनी बार हुआ. क्या कभी यह देखा गया कि इससे आम लोगों को कितनी दिक्कत हुई. इन सवालों पर दिल्ली पुलिस के दो अलग-अलग ट्रैफिक दफ्तरों ने कहा कि मामला उनके दायरे का नहीं है. फाइल एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर घूमती रही, जैसे कोई भी इसकी जिम्मेदारी लेना नहीं चाहता था. जिस एक बिंदु पर जवाब मिला, वहां दोनों दफ्तरों ने एक ही बात कही कि वीआईपी मूवमेंट से जुड़ी सार्वजनिक शिकायतों का कोई रिकॉर्ड मौजूद नहीं है.

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दिल्ली पुलिस के पास वीआईपी के लिए ट्रैफिक रोकने का कोई डेटा नहीं

यानी 2.25 करोड़ से ज्यादा आबादी वाले शहर में, जहां वीआईपी के लिए हर दिन और कई बार दिन में कई बार ट्रैफिक रोका जाता है, वहां दिल्ली पुलिस के पास यह जानकारी नहीं है, या वह जानना नहीं चाहती, कि इस पर कितनी शिकायतें आईं. किसे वीआईपी या वीवीआईपी माना जाता है, इसकी कोई सूची साझा नहीं की गई. ट्रैफिक रोकने का कोई लिखित नियम सार्वजनिक नहीं किया गया. लोगों को कितनी देर रोका जाता है, इसका कोई डेटा नहीं दिया गया. पांच साल के रिकॉर्ड मांगे जाने के बावजूद आम लोगों पर पड़ने वाली इसकी कीमत पर कोई अध्ययन नहीं मिला.

दूसरी आरटीआई में सवाल पैसों से जुड़ा था. पूछा गया कि वीआईपी सुरक्षा के लिए गाड़ियां किराये पर लेने में दिल्ली पुलिस कितना खर्च करती है. यह भी पूछा गया कि 2023 के जी20 शिखर सम्मेलन के लिए खास तौर पर खरीदी गई गाड़ियों का बाद में क्या हुआ.

यहां दिल्ली पुलिस की सुरक्षा शाखा ने बताया कि 2020 से पहले के उसके सारे वित्तीय रिकॉर्ड नष्ट कर दिए गए हैं. यानी 15 साल का खर्च रिकॉर्ड से बाहर हो गया, और यह क्यों हुआ, इसका कोई कारण नहीं दिया गया. जिन 4 साल का हिसाब उपलब्ध था, वह अपने आप में अलग तस्वीर दिखाता है. 2021-22 में किराये की वीआईपी गाड़ियों पर खर्च ₹1.43 करोड़ था.

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2022-23 में यह बढ़कर ₹23.13 करोड़ हो गया, जो एक साल में करीब 16 गुना उछाल था. इसके बाद यह ₹16.89 करोड़ पर आया, फिर ₹2.05 करोड़ पर गिरा और इस साल शून्य पर आ गया. इन उतार-चढ़ावों पर कोई वजह नहीं बताई गई. 4 साल में कुल खर्च ₹43 करोड़ से ज्यादा रहा, और यह सिर्फ किराये की गाड़ियों पर था, खरीदी गई गाड़ियों पर नहीं.

जी20 से पहले दिल्ली पुलिस को मिली थी 850 गाड़ियां

जी20 की गाड़ियों पर आरटीआई की राह वहीं ठंडी पड़ गई, जबकि इससे जुड़े तथ्य पहले से सार्वजनिक थे. 5 दिसंबर 2023 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, शिखर सम्मेलन से पहले दिल्ली पुलिस ने 850 नई गाड़ियां खरीदी थीं. सम्मेलन खत्म होने के बाद 400 गाड़ियां पुलिस कंट्रोल रूम को दी गईं, 150 सुरक्षा इकाई को दी गईं और 300 शहर के पुलिस जिलों में बांटी गईं.

लेकिन जब आरटीआई के तहत पूछा गया कि इन जी20 गाड़ियों में से सुरक्षा शाखा और जिला पुलिस को ठीक कितनी गाड़ियां मिलीं और इस पर कितना खर्च हुआ, तब हर दफ्तर ने सवाल आगे बढ़ा दिया. सुरक्षा शाखा ने कहा कि यह उसका विभाग नहीं है. नई दिल्ली जिले ने कहा कि उसने वीआईपी ड्यूटी के लिए एक भी गाड़ी किराये पर नहीं ली.

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गाड़ियों का आंकड़ा देने से दिल्ली पुलिस का इनकार

जो दफ्तर पुलिस की गाड़ियां खरीदता और सप्लाई करता है, उसने सुरक्षा आधार का हवाला देकर जानकारी देने से साफ इनकार कर दिया. यानी दिल्ली पुलिस ने 2023 में पीटीआई को 850 नई गाड़ियों के बंटवारे की जानकारी दी थी, लेकिन तीन साल बाद वही संख्या पुष्टि करने से इनकार कर दिया.

पूरी कहानी यही दिखाती है कि दिल्ली पुलिस वीआईपी काफिलों की आवाजाही का इंतजाम तो दर्ज करती है, लेकिन उससे आम लोगों को होने वाली दिक्कत का हिसाब नहीं रखती. दूसरी तरफ वीआईपी सुरक्षा के लिए किराये की गाड़ियों पर 4 साल में ₹43 करोड़ से ज्यादा खर्च हुए, 2020 से पहले के 15 साल के रिकॉर्ड नष्ट बताए गए और जी20 की 850 गाड़ियों पर भी साफ जवाब नहीं मिला. यानी जब वीआईपी जाते हैं, दिल्ली रुक जाती है, लेकिन उस रुकावट की कोई गिनती दर्ज नहीं होती.

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