दिल्ली की एक अदालत ने पूर्व छात्रा से रेप और उसके आपत्तिजनक वीडियो वायरल करने की धमकी देने के आरोपी दिल्ली यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रोफेसर को अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया है. कोर्ट ने कहा कि दोनों के बीच हुई वॉट्सऐप चैट से सिर्फ पुराने सहमति वाले रिश्ते की बात साबित नहीं होती, बल्कि उनमें दबाव और डराने-धमकाने के संकेत भी मिलते हैं.
अदालत ने यह भी कहा कि आरोपी को अग्रिम जमानत मिलने पर पीड़िता को प्रभावित करने, इलेक्ट्रॉनिक सबूतों से छेड़छाड़ करने और दोबारा धमकी देने का खतरा हो सकता है.
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12 अक्टूबर के आदेश में एडिशनल सेशंस जज गोमती मनोचा ने जांच किसी नामित वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को सौंपने का निर्देश दिया. कोर्ट ने कहा कि इससे निष्पक्ष जांच और इलेक्ट्रॉनिक सबूतों को सुरक्षित रखने में मदद मिलेगी. पुलिस को यह भी जांचने को कहा गया है कि क्या आरोपी या उसके सहयोगी पीड़िता पर केस आगे न बढ़ाने का दबाव बना रहे हैं.
शादी का झांसा देने और वीडियो बनाने का आरोप
महिला ने आरोप लगाया कि आरोपी ने शादी का झांसा देकर कई बार उसका यौन शोषण किया. उसने यह भी आरोप लगाया कि आरोपी ने उसकी मर्जी के बिना आपत्तिजनक वीडियो बनाए और मांगें नहीं मानने पर उन्हें वायरल करने की धमकी दी. शिकायतकर्ता के मुताबिक, आरोपी ने उसे नशीला पदार्थ देकर भी यौन संबंध बनाए.
वहीं, आरोपी ने इन आरोपों से इनकार किया है. उसका दावा है कि दोनों तीन साल से ज्यादा समय तक सहमति से रिश्ते में थे. आरोपी के वकील ने यह भी दलील दी कि जुलाई में उसके साथ कथित मारपीट के बाद दर्ज हुए एक अलग मामले के जवाब में यह FIR दर्ज कराई गई.
मूल मोबाइल फोन और चैट सुरक्षित रखने का निर्देश
कोर्ट ने कहा कि प्यार भरे या यौन संबंधों से जुड़े संदेश अपने आप यह साबित नहीं करते कि हर कथित यौन संबंध के लिए स्वतंत्र और स्पष्ट सहमति थी. अदालत ने यह भी कहा कि आरोपी का शिकायतकर्ता का शिक्षक होना महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे दोनों के बीच ताकत का असंतुलन और दबाव की आशंका को समझने में मदद मिलती है.
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जांच अधिकारी को मूल मोबाइल फोन, पूरी वॉट्सऐप चैट, मेटाडेटा, क्लाउड बैकअप और फॉरेंसिक कॉपी सुरक्षित रखने का निर्देश दिया गया है. कोर्ट ने कहा कि वीडियो को कहां रखा गया और कैसे भेजा गया, इसकी जांच के लिए आरोपी से हिरासत में पूछताछ की जरूरत भी पड़ सकती है.
दिल्ली पुलिस कमिश्नर को 15 दिनों के भीतर संबंधित मजिस्ट्रेट को रिपोर्ट देने को कहा गया है कि जांच किसी नामित वरिष्ठ अधिकारी को सौंपने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं.