दिल्ली की जहरीली हवा से राहत पाने के लिए एक बार फिर आसमान से उम्मीद लगाई जा रही है. राष्ट्रीय राजधानी स्मॉग की मोटी चादर के नीचे दम घुटने जैसी स्थिति में है और हवा की गुणवत्ता 'बहुत खराब' श्रेणी में चली गई है. सूत्रों के मुताबिक, अगर प्रदूषण का स्तर और खराब होता है, तो बीजेपी के नेतृत्व वाली दिल्ली सरकार दिवाली और छठ पूजा के बाद और क्लाउड-सीडिंग ट्रायल कर सकती है.
हालांकि आर्टिफिशियल रेन केवल एक दिन के लिए कुछ पॉल्यूटेंट्स को धो सकती है, लेकिन यह सालों की पॉलिसी नाकामियों को नहीं मिटा सकती. असली परीक्षा इस बात की होगी कि सरकार मौसमी उपायों से आगे बढ़कर पूरे साल साफ हवा पाने में मदद कर पाती है या नहीं.
सेंट्रल गवर्नमेंट और दिल्ली सरकार के नेताओं ने आजतक को बताया कि फेस्टिवल सीजन के बाद और ट्रायल होने की संभावना है, लेकिन दिवाली से पहले इसकी कोई ऑफिशियल अनाउंसमेंट नहीं होगी.
बता दें, 5 नवंबर को दिल्ली का एवरेज एक्यूआई 367 दर्ज किया गया, जो 'बहुत खराब' कैटेगरी में आता है. जहांगीरपुरी में एक्यूआई 459 तक पहुंच गया, जबकि आईआईटी दिल्ली और पंजाबी बाग में 445 का आंकड़ा दर्ज हुआ. खराब विजिबिलिटी और सांस लेने में तकलीफ के बीच पीएम 2.5 मुख्य फैक्टर बना हुआ है. लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है.
क्लाउड-सीडिंग क्या है?
क्लाउड-सीडिंग के तहत उपयुक्त बादलों में सिल्वर आयोडाइड और सोडियम क्लोराइड जैसे केमिकल्स को फैलाया जाता है, ताकि पानी की बूंदें बनें और बारिश ट्रिगर हो सके.
दिल्ली का यह एक्सपेरिमेंट नया नहीं है. सरकार ने IIT कानपुर के साथ साझेदारी की और 25 सितंबर, 2025 को एक MoU के माध्यम से सहयोग को औपचारिक रूप दिया.
पिछले साल अक्टूबर में दो दौर के ट्रायल किए गए थे, जिनमें सिल्वर आयोडाइड और सोडियम क्लोराइड के आठ केमिकल फ्लेयर्स रिलीज किए गए थे. हालांकि ये एक्सपेरिमेंट बारिश कराने में नाकाम रहे.
इस बीच, एनवायरमेंटल एक्सपर्ट्स ने चेताया है कि क्लाउड-सीडिंग को जादुई समाधान न माना जाए. असली चुनौती गाड़ियों के एमिशन, कंस्ट्रक्शन डस्ट, इंडस्ट्रियल पॉल्यूशन, वेस्ट बर्निंग और पराली के धुएं पर लगाम लगाने की है.
हर साल सर्दियों में गिरता तापमान, हवा की धीमी रफ्तार और एटमॉस्फेरिक इन्वर्जन पॉल्यूटेंट्स को जमीन के पास रोक लेते हैं. जिससे राजधानी एक गैस चैंबर में बदल जाती है.