दिल्ली के दिग्गज नेता और कांग्रेस के पूर्व सांसद सज्जन कुमार का गुरुवार को निधन हो गया. सज्जन कुमार ने दिल्ली की राजनीति में एक समय तूती बोला करती थी. निगम पार्षद से लेकर तीन बार लोकसभा सांसद बनने तक का राजनीतिक सफर तय किया और अपने जीवन के आखिरी दिनों को तिहाड़ जेल में गुजारा.
1984 के सिख विरोधी दंगे में दोषी करार दिए जाने के चलते सज्जन कुमार तिहाड़ जेल में उम्रकैद की सजा काट रहे थे. जेल में ही तबीयत खराब होने के बाद दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में लाया गया था, जहां डाक्टरों ने उन्हे मृत घोषित कर दिया.
सिसासत में कदम रखने के पहले सज्जन कुमार दिल्ली में चाय की दुकान चलाया करते थे, लेकिन पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांध के करीबी आने के बाद उनकी किस्मत ही बदल गई. 1984 के दंगे से कांग्रेस और दिल्ली की राजनीति में हनक जमाई, लेकिन समय बदला तो सियासी पारी का अंत भी हो गया.
सज्जन कुमार का सियासी सफर कैसे हुआ शुरू
पूर्व सांसद सज्जन कुमार का जन्म 23 सितंबर 1945 को हुआ था. राजनीति में आने से पहले वो चाय की दुकान चला करते थे और बेकरी के व्यवसाय से जुड़े थे. सज्जन कुमार ने दिल्ली नगर निगम का चुनाव जीतकर सियासी दुनिया में कदम रखा. सज्जन कुमार को कांग्रेस का टिकट दिलाने में चौधरी हीरा सिंह ने अहम भूमिका निभाई.
दिल्ली में हीरा सिंह जाट समुदाय के उस समय बड़े नेता हुआ करते थे. हीरा सिंह ने कांग्रेस नेता एचकेएल भगत के जरिए सज्जन कुमार को टिकट दिलवाया. निगम चुनाव में सज्जन कुमार की जीत भी हुई और उसके बाद वह पीछे मुड़कर नहीं देखा. दिल्ली की राजनीति में वह लंबे वर्षों तक कांग्रेस पार्टी के भीतर किंगमेकर की भूमिका में रहे.
सज्जन कुमार ने दिल्ली के पहले सीएम को हराया
सज्जन कुमार की एक वक्त दिल्ली में पहचान दबंग नेता के रूप में भी होती थी. आपतकाल के बाद 1977 में जब देश में कांग्रेस विरोधी लहर चली उसका असर दिल्ली की सियासत में भी हुआ. दिल्ली में भी इसका व्यापक असर हुआय दिल्ली में कांग्रेस पार्टी काफी कमजोर हो गई. जनता पार्टी की सरकार के खिलाफ जेल भरो आंदोलन में सज्जन कुमार ने दिल्ली में अहम रोल अदा किया था. दिल्ली में सज्जन कुमार को अगले चुनाव में 1980 के लोकसभा का प्रत्याशी बनाया गया और वह बाहरी दिल्ली से जीत गए.
अस्सी में सज्जन कुमार की जीत काफी बड़ी थी. सज्जन कुमार ने दिल्ली के पहले मुख्यमंत्री और दिल्ली के शेर कहे जाने वाले चौधरी ब्रह्म प्रकाश को मात दी थी. इसके बाद सज्जन कुमार के संबंध गांधी परिवार से हुए. इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी के करीबी बन गए, जिसके बाद पलटकर नहीं देखा. 1991 के चुनाव में उन्हें फिर टिकट मिला और वह जीतकर लोकसभा पहुंचे। साल 2009 की बात है जब सज्जन कुमार पार्टी ने लोकसभा का टिकट दिया.
सिख दंगे से खत्म हो गई सज्जन कुमार की राजनीति
इंदिरा गांधी की 1984 में हत्या कर दी गई, जिसके बाद दिल्ली में दंगा भड़क गया था. इस दंगे को भड़काने में सज्जन कुमार का अहम रोल रहा था. हालांकि, 1984 में सिख विरोधी दंगों के बाद पार्टी ने अगले चुनाव में टिकट काट दिया गया, लेकिन सज्जन कुमार की राजनीतिक ताकत कमजोर नहीं हुआ.
1984 के सिख विरोधी दंगे में कुमार को सजा होने से उनके राजनीतिक कॅरियर पर पूरी तरह विराम लग गया, उन्होंने अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया. दिसंबर 2018 में, जब दिल्ली हाई कोर्ट ने उन्हें दंगों के एक मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई, तब उन्होंने कांग्रेस पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था. सज्जन कुमार दिल्ली की तिहाड़ जेल में उम्रकैद की सजा काट रहे थे, लेकिन गुरुवार को उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया.