अगर आप सोचते हैं कि शरीर का वजन सामान्य होने पर आप दिल की बीमारियों से पूरी तरह सुरक्षित हैं, तो यह खबर आपकी आंखें खोलने वाली है. न्यूरोलॉजी जर्नल में प्रकाशित एक इंटरनेशनल रिसर्च के अनुसार, जिन लोगों को सोते समय सांस रुकने की समस्या यानी स्लीप एप्निया है और जो पहले से दिल या दिमाग की बीमारी से पीड़ित हैं, उनके लिए शरीर का कुल वजन या बॉडी मास इंडेक्स नहीं, बल्कि पेट के पास जमा चर्बी सबसे बड़ा खतरा साबित हो रही है.
क्या कहती है रिसर्च?
यह स्टडी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किए गए सेव (SAVE) ट्रायल के डेटा पर आधारित है, जिसमें 2,662 मरीजों की हेल्थ डेटा का करीब पौने चार साल तक गहन विश्लेषण किया गया. स्टडी में शामिल सभी मरीज मध्यम से गंभीर श्रेणी के स्लीप एप्निया से ग्रस्त थे और उन्हें पहले से दिल की बीमारी या स्ट्रोक की समस्या थी. शोध के नतीजे बेहद चौंकाने वाले रहे. जब मरीजों का मूल्यांकन पारंपरिक बॉडी मास इंडेक्स के आधार पर किया गया, तो केवल 31.8 प्रतिशत मरीज ही मोटापे की श्रेणी में आए. लेकिन जब कमर की चौड़ाई और लंबाई के अनुपात का आंकलन किया गया, तो लगभग 95.6 प्रतिशत मरीजों में सेंट्रलाइज्ड मोटापा यानी पेट की चर्बी पाई गई.
'SAVE' इंटरनेशनल स्टडी में शामिल एम्स (AIIMS), नई दिल्ली के न्यूरोलॉजी विभाग की हेड डॉ. मंजरी त्रिपाठी ने बताया कि यह रिसर्च भारतीय और एशियाई मरीजों के संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण है. उन्होंने कहा, "हम अक्सर देखते हैं कि कई मरीज बीएमआई (BMI) के मानकों पर सामान्य नजर आते हैं, लेकिन उनके पेट पर चर्बी जमा होती है. इसे सेंट्रलाइज्ड मोटापा कहा जाता है.
डॉ. त्रिपाठी के अनुसार, स्लीप एप्निया से पीड़ित जिन मरीजों को पहले स्ट्रोक या दिल का दौरा पड़ चुका है, उनमें पेट की चर्बी दोबारा दिल की बीमारियों का खतरा काफी बढ़ा देती है. उन्होंने सलाह दी कि डॉक्टरों को केवल वजन मापने के बजाय मरीजों की कमर की चौड़ाई और लंबाई का अनुपात भी नियमित रूप से जांचना चाहिए. वो कहती हैं कि सीपीएपी (CPAP) मशीन सोते समय सांस तो सामान्य रखती है, लेकिन यदि पेट की चर्बी कम न की जाए, तो दिल के दौरे का जोखिम बना रहता है. इसलिए जीवनशैली में बदलाव और पेट का फैट घटाना बेहद जरूरी है.
पेट की चर्बी और दिल के दौरे का सीधा संबंध
स्टडी में पाया गया कि बॉडी मास इंडेक्स की श्रेणियों का भविष्य में होने वाली दिल की बीमारियों या स्ट्रोक के खतरे से कोई सीधा और स्पष्ट संबंध नहीं दिखा. इसके विपरीत, जिन मरीजों में कमर और लंबाई का अनुपात सबसे अधिक था, उनमें दोबारा दिल का दौरा पड़ने, स्ट्रोक होने या हार्ट फेलियर जैसी गंभीर समस्याओं का खतरा सबसे कम अनुपात वाले मरीजों की तुलना में 1.52 गुना ज्यादा देखा गया. विशेष रूप से, इस वर्ग के मरीजों में मायोकार्डियल इन्फार्क्शन यानी दिल के दौरे का जोखिम 2.3 गुना तक अधिक पाया गया.
मशीनी इलाज भी नहीं कर पा रहा पूरी भरपाई
स्लीप एप्निया के इलाज के लिए अक्सर सोते समय सांस को सुचारू रखने वाली सीपीएपी मशीन का इस्तेमाल किया जाता है. हालांकि, इस शोध में यह बात भी साफ हुई कि केवल इस मशीन के उपयोग से दिल के दौरे के दोबारा होने के जोखिम को पूरी तरह से नहीं टाला जा सकता, जब तक कि शरीर के मध्य भाग यानी पेट की चर्बी को कम न किया जाए.
डॉक्टरों और आम लोगों के लिए क्या है सबक?
विशेषज्ञों के मुताबिक, यह रिसर्च बताती है कि केवल बॉडी मास इंडेक्स को देखकर दिल की बीमारियों के खतरे का सही अंदाजा नहीं लगाया जा सकता. कई लोग जिनका वजन पैमानों पर सामान्य दिखता है, उनके पेट पर जमा वसा उन्हें दिल के दौरे के भारी जोखिम में डाल देती है. इसलिए अब समय आ गया है कि वजन नापने के साथ-साथ कमर की चौड़ाई और लंबाई के अनुपात पर भी विशेष ध्यान दिया जाए और पेट की चर्बी घटाने को प्राथमिकता दी जाए.