25 अगस्त 1944 का दिन पेरिस के इतिहास में बेहद खास है. इसी दिन करीब चार साल तक नाजी जर्मनी के कब्जे में रहा पेरिस आजाद हुआ था. फ्रांस की सेकंड आर्मर्ड डिविजन और अमेरिकी 4th इंफेंट्री डिविजन ने शहर में दाखिल होकर जर्मन सेना को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया. खास बात ये थी कि जर्मन सेना के कमांडर जनरल डिट्रिख फॉन शोल्टिट्ज ने हिटलर के उस आदेश को मानने से इनकार कर दिया था, जिसमें पेरिस को तबाह करने के लिए कहा गया था.
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान 14 जून 1940 को नाजी जर्मनी की सेना पेरिस में दाखिल हुई थी. इसके कुछ ही दिन बाद फ्रांस ने जर्मनी के साथ युद्धविराम समझौता कर लिया. इसके बाद फ्रांस का एक ऐसा शासन बना, जो जर्मनी के प्रभाव में था और इसकी राजधानी विची बनाई गई.
हालांकि, हर फ्रांसीसी ने जर्मनी के सामने हथियार नहीं डाले. जनरल चार्ल्स द गॉल ने फ्री फ्रेंच फोर्सेज के साथ लड़ाई जारी रखी. दूसरी तरफ फ्रांस के अंदर भी रेजिस्टेंस यानी प्रतिरोध आंदोलन शुरू हो गया. ये लोग नाजी जर्मनी और उसके समर्थक विची शासन के खिलाफ लड़ रहे थे.
पेरिस की आजादी के लिए खास सेना तैयार की गई
पेरिस को आजाद कराने के लिए फ्रांस की 2nd आर्मर्ड डिविजन को 1943 के आखिर में लंदन में तैयार किया गया था. इसका मकसद ही फ्रांस पर मित्र देशों के हमले के दौरान पेरिस की मुक्ति में अहम भूमिका निभाना था.
अगस्त 1944 में यह डिविजन नॉर्मंडी पहुंची. इसकी कमान जनरल जैक्स-फिलिप लेक्लर्क के हाथों में थी. यह अमेरिकी जनरल जॉर्ज एस. पैटन की 3rd US Army के साथ जुड़ी हुई थी.
18 अगस्त तक मित्र देशों की सेनाएं पेरिस के काफी करीब पहुंच चुकी थीं. शहर में भी माहौल बदलने लगा था. मजदूरों ने हड़ताल शुरू कर दी और रेजिस्टेंस के लड़ाके छिपने की जगहों से बाहर आने लगे. उन्होंने जर्मन सैनिकों और उनकी चौकियों पर हमले शुरू कर दिए.
पहले पेरिस को घेरने की थी योजना
मित्र देशों के सुप्रीम कमांडर जनरल ड्वाइट डी. आइजनहावर के सामने एक मुश्किल फैसला था. सैन्य योजनाकारों का मानना था कि पेरिस को तुरंत आजाद कराने के बजाय पहले उसे चारों तरफ से घेरना बेहतर होगा. इससे सैनिकों और जरूरी संसाधनों को दूसरी सैन्य कार्रवाइयों के लिए इस्तेमाल किया जा सकता था.
21 अगस्त को आइजनहावर ने जनरल द गॉल से मुलाकात की और उन्हें बताया कि पेरिस को फिलहाल बायपास करने की योजना है.लेकिन द गॉल इससे सहमत नहीं थे. उन्होंने कहा कि पेरिस को बिना ज्यादा मुश्किल के आजाद कराया जा सकता है. उन्हें यह भी डर था कि अगर रेजिस्टेंस का मजबूत कम्युनिस्ट धड़ा खुद पेरिस को आजाद करा देता है, तो बाद में लोकतांत्रिक सरकार स्थापित करना मुश्किल हो सकता है.
द गॉल ने यहां तक कह दिया कि अगर पेरिस की तरफ बढ़ने का आदेश नहीं दिया गया, तो वह खुद लेक्लर्क की 2nd आर्मर्ड डिविजन को शहर में भेज देंगे. आखिरकार 22 अगस्त को आइजनहावर ने पेरिस की मुक्ति के लिए आगे बढ़ने की मंजूरी दे दी.
23 अगस्त को 2nd आर्मर्ड डिविजन ने उत्तर की तरफ से पेरिस की ओर बढ़ना शुरू किया, जबकि अमेरिकी 4th इंफेंट्री डिविजन दक्षिण की तरफ से आगे बढ़ी. उधर पेरिस में जर्मन सेना की कमान जनरल डिट्रिख फॉन शोल्टिट्ज के पास थी. वह शहर की सुरक्षा मजबूत करने में जुटा था. लेकिन उसके सामने हिटलर का एक बेहद खतरनाक आदेश भी था.
पूरे शहर को उड़ाने की थी प्लानिंग
हिटलर चाहता था कि पेरिस किसी भी कीमत पर मित्र देशों के हाथ न लगे. अगर जर्मन सेना शहर को बचा नहीं सकती, तो उसे 'खंडहरों के मैदान' में बदल दिया जाए. शोल्टिट्ज ने पेरिस के कई पुलों और महत्वपूर्ण इमारतों के नीचे विस्फोटक लगवाने शुरू कर दिए. लेकिन उसने शहर को उड़ाने का अंतिम आदेश लागू नहीं किया. वह पेरिस जैसे ऐतिहासिक शहर को तबाह करने वाले व्यक्ति के रूप में इतिहास में अपना नाम नहीं छोड़ना चाहता था.
पेरिस की तरफ बढ़ रही 2nd आर्मर्ड डिविजन को रास्ते में जर्मन तोपों का कड़ा सामना करना पड़ा. उसे भारी नुकसान भी उठाना पड़ा. लेकिन 24 अगस्त को उसके सैनिक सीन नदी पार करके पेरिस के बाहरी इलाकों तक पहुंच गए. वहां लोगों ने उनका जोरदार स्वागत किया. लोग सैनिकों के लिए फूल लेकर आए, उन्हें चूमा और शराब से उनका स्वागत किया.
इसी बीच लेक्लर्क को पता चला कि अमेरिकी 4th इंफेंट्री डिविजन भी पेरिस के अंदर पहुंचने के करीब है. वह नहीं चाहते थे कि अमेरिकी सेना उनसे पहले शहर के केंद्र में पहुंचे. इसलिए थके हुए सैनिकों को उन्होंने पूरी ताकत के साथ आगे बढ़ने का आदेश दिया. 24 अगस्त की रात करीब आधी रात से ठीक पहले 2nd आर्मर्ड डिविजन पेरिस के बीचोंबीच स्थित होटल द विले पहुंच गई.
रात होते-होते जर्मन सेना का प्रतिरोध कमजोर पड़ गया. पेरिस में मौजूद करीब 20 हजार जर्मन सैनिकों में से ज्यादातर ने आत्मसमर्पण कर दिया या शहर से भाग गए. जो सैनिक लड़ते रहे, उन्हें भी जल्द काबू कर लिया गया.25 अगस्त की सुबह फ्रांसीसी सेना ने पेरिस के पश्चिमी हिस्से को अपने कब्जे में ले लिया, जबकि अमेरिकी सैनिकों ने पूर्वी हिस्से को साफ किया. इस तरह 25 अगस्त 1944 को पेरिस आजाद हो गया.
दोपहर के शुरुआती घंटों में फ्रांसीसी सैनिकों ने जनरल शोल्टिट्ज को उसके मुख्यालय से गिरफ्तार कर लिया. इसके कुछ ही समय बाद उसने पेरिस के आत्मसमर्पण के दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर दिए. इसके बाद जनरल चार्ल्स द गॉल भी पेरिस पहुंचे.