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राम पीछे, रावण आगे! रामायण या 'रावणायण'? फिल्म में कहां बिगड़ा संतुलन?

नितेश तिवारी के डायरेक्शन में बनी फिल्म 'रामायण' (पार्ट-1) के रिलीज होने के बाद सोशल मीडिया और फिल्म समीक्षकों के बीच तीखी बहस छिड़ गई है. ऐसा कहा जा रहा है कि रावण के किरदार को काफी ग्लोरिफाई किया गया है.

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रावण के चित्रण पर सवाल (Photo: x/WorldOfRamayana)
रावण के चित्रण पर सवाल (Photo: x/WorldOfRamayana)

नितेश तिवारी की फिल्म भारत के प्राचीन महाकाव्य 'रामायण' पर आधारित है, लेकिन फिल्म रिलीज होने के बाद सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा चर्चा राम नहीं, बल्कि रावण के किरदार को लेकर हो रही है. इंटरनेट पर दर्शकों का एक वर्ग फिल्म के रावण के किरदार की लार्जर दैन लाइफ इमेज पर सवाल उठा रहा है. कुछ लोगों का कहना है कि फिल्म में रावण को इतनी प्रमुखता दी गई है कि ऐसा लगता है मानो भगवान राम अपनी ही रामायण में महज एक सहायक किरदार बनकर रह गए हों.

सोशल मीडिया पर फिल्म को लेकर आलोचना भी हो रही है. एक शख्स का कहना है कि  फिल्म में रावण का खूब महिमामंडन किया गया है और भगवान राम को कमजोर दिखाया गया है. एक अन्य यूजर का कहना है कि फिल्म में देवताओं को अत्याचारी और शूर्पणखा को पीड़ित के रूप में पेश किया गया है. वहीं, एक अन्य यूजर ने पारंपरिक रामायण और फिल्म की तुलना करते हुए कहा कि जहां रामायण भगवान राम की कथा है, वहीं नमित मल्होत्रा के इस संस्करण में रावण को कहानी का मुख्य केंद्र बना दिया गया है .

खलनायक को मिला खास सम्मान?

नितेश तिवारी की रामायण की शुरुआत राम से नहीं बल्कि रावण की एंट्री से शुरू होती है.  जहां उसके कुल को देवताओं द्वारा सताया जाता है, उन्हें धन के देवता कुबेर के अधीन गुलामी करने के लिए मजबूर किया जाता है, जिससे आजिज आकर वे विद्रोह करने पर उतारू हो जाते हैं. लेकिन रुकिए... यहां रावण और उनके परिवार को पीड़ित रूप में नहीं दिखाया गया है. पीड़ित तो उनके कुल की प्रजा हैं. जो दाने-दाने को तरस रही हैं. रावण तो वीणा बजाने में मशगूल है, विभिषण भी अपनी पोथी-पुराण से ज्ञान हासिल कर रहा है, और कुंभकरण तो भरपेट खाने में मशगूल है. 

खैर, इसके बाद रावण कठोर तपस्या करता है, दिव्य वरदान प्राप्त करता है और लंका पर कब्जा कर लेता है, जहां वह बाद में शासन करता है. जब तक वह सत्ता में आता है, तब तक फिल्म दर्शकों को यह साफ तौर पर दिखा चुकी होती है कि वह उस मुकाम तक कैसे पहुंचा.

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तो क्या फिल्म रावण का महिमामंडन करती है? अगर आप ध्यान से देखें, तो इस धारणा में कुछ सही बातें भी हैं. फिल्म की एक अच्छी बात यह है कि वह रावण को कोई 'गलत समझे गए नायक' (misunderstood hero) के रूप में पेश नहीं करती. उसका अहंकार बार-बार सामने आता है. सबसे बुरा तब लगता है जब वह अपनी बहन शूर्पणखा के पति विद्युतजिह्वा की हत्या कर देता है, वह भी सिर्फ इसलिए क्योंकि वह उससे आहत है. यहां हत्या की एक वजह ये भी है कि विद्युतजिह्वा एक औरत के साथ अभद्र व्यवहार करता है और उसे अपनी ओर खींच लेता है. यहां तथाकथित मर्यादित रावण ये सब देखा नहीं जाता. रावण कितना अच्छा है ना, फेमिनिस्ट रावण?

अब आते हैं एक अच्छे क्रिएशन पर. जहां  रावण के दस सिरों को अलग-अलग आवाजों और व्यक्तित्वों के रूप में दिखाया गया है. इससे यश को एक शासक, योद्धा, भक्त और कई कमियों वाले इंसान के रूप में एक्टिंग करने का मौका मिला है. लेकिन यहीं पर फिल्म का सबसे प्रमुख सवाल भी सामने आता है, आखिर रावण ने सीता का हरण क्यों किया?

बहन का बदला लेने निकला रावण? 

अब यहां पर नितेश तिवारी की रामायण में दिखाया गया कि शूपर्णखा का अपमान सीता के हरण के फैसले के पीछे की एक अहम वजह बनता है. वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण में सीता अपहरण के बारे में विस्तार से लिखा गया है. 

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रामायण में वाल्मीकि रावण की अधिक जटिल व्याख्या पेश करते हैं. महाकाव्य के 'अरण्यकांड' के 34वें सर्ग में शूपर्णखा, रावण को सीता की असाधारण सुंदरता के बारे में बताती है और उसे सीता को अपनी पत्नी बनाने के लिए उकसाती है. वह रावण से कहती है कि सीता को देखते ही वह कामदेव के बाणों से घायल हो जाएगा. इसके बाद वह सुझाव देती है कि वह राम और लक्ष्मण को मार डाले, ताकि वह सीता को हासिल कर सके.

ऐसे में जब रावण एक तपस्वी का भेष बदलकर पंचवटी में सीता के पास पहुंचता है, तो वाल्मीकि फिर से बताते हैं कि वह काम-वासना से पूरी तरह घिर चुका था. सीता के प्रति उसका आकर्षण और उस पर अपना अधिकार जताने की उसकी भावना इस प्रसंग के केंद्र में है. शूर्पणखा का अपमान रावण के फैसले में एक और पहलू जोड़ता है, लेकिन यह काम-वासना और 'हक जताने' की भावना की भूमिका को खत्म नहीं करता. यहीं पर फिल्म का जोर काफी मायने रखता है. नाक काटने और बदले की भावना को सबसे आगे रखा गया है, फिल्म रावण के इरादों को बदल देती है. 

रावण का शासन और राम की झलक

मेरी मुख्य शिकायत राम और रावण के  बीच संतुलन को लेकर  भी है. रावण को अपने कुल, महत्वाकांक्षाओं, रिश्तों और सत्ता में ऊपर उठने के सफर को दिखाने के लिए काफी जगह दी गई है, रावण को एक अच्छी स्पीच भी दी गई कि वो अपनी प्रजा के लिए क्या-क्या करेगा. कोई ऊंच-नीच नहीं, कोई भेदवाव नहीं. जो रावण खाएगा, वो ही उसकी प्रजा खाएगी. इतनी अच्छी तरीके से स्पीच दी गई, कि आम भी बोलेंगे... हमें राम राज्य नहीं, रावण राज्य चाहिए.

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जबकि राम के जीवन को कुछ महत्वपूर्ण पलों की एक झलक के रूप में पेश किया गया है. उनके विवाह, राज्याभिषेक की तैयारी और वनवास . इन सभी को शामिल तो किया गया है, लेकिन इनमें से कुछ घटनाओं को अगर थोड़ा और समय दिया जाता, तो दर्शक उनसे भावनात्मक रूप से बेहतर तरीके से जुड़ पाते. राम को अपनी प्रजा से बात करते हुए बहुत कम दिखाया गया है. हम जिस राम राज्य की बात करते हैं, वो कहां है? नितेश तिवारी जी बताएं तो अच्छा. 

सेंसर बोर्ड के सदस्य ने उठाया सवाल

चलिए सोशल मीडिया पर तो यूजर्स कुछ भी लिखते हैं, आप ये बोलकर टाल सकते हैं. लेकिन क्या हो, जब सेंसर बोर्ड के सदस्य ही फिल्म रामायण को 'रावणायण' कहने लगे? दरअसल  राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार विजेता प्रख्यात फिल्म समीक्षक विनोद अनुपम केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी/सेंसर बोर्ड) के सदस्य हैं. उन्होंने अपनी फेसबुक पोस्ट पर फिल्म को लेकर हैरान कर देने वाला रिएक्शन दिया. उन्होंने लिखा, 'कोई भ्रम में नहीं रहे, यह रावणायण है, रामायण नहीं. जैसा पोस्टर पर भी दिख रहा है.'

ये इस बात को और ज्यादा महत्व देता है कि जब बात सोशल मीडिया से उठकर केंद्र सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के तहत काम करने वाले केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) के सदस्य को भी लिखने पर मजबूर कर दें तो मेकर्स को इस और जरूर ध्यान देना चाहिए.

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क्या फिल्म सच में रावण पर केंद्रित है?

देखिए फिल्म न तो राम को बुरा दिखाती है, और न ही रावण के कामों को पूरी तरह से सही ठहराती है. यह रावण को एक ऐसे अहंकारी शासक के रूप में पेश करती है, जिसकी ताकत और अहंकार ही अंत में उसके पतन का कारण बनते हैं. लेकिन दिक्कत प्रेजेंटेशन से है. क्योंकि आपको रावण से नफरत नहीं होती.

हालांकि, ये पूरी बहस अब इस बात पर निर्भर करती है कि दर्शक फिल्म को किस तरह महसूस करते हैं. क्योंकि जो लोग भगवान राम से भावनात्मक रूप से जुड़े हैं, उन्हें फिल्मांकन अधूरा लगेगा. ये जायज भी है कि क्योंकि रावण पर जरूरत से ज्यादा ध्यान दिया गया है. वहीं, जिन्हें रावण के बारे में जानने में दिलचस्पी है, उन्हें शायद ऐसा कोई असंतुलन न दिखे.

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