
कभी-कभी प्रेम कहानी में साथ होना जरूरी नहीं होता. कभी किसी रिश्ते की गहराई उसके करीब आने में नहीं, बल्कि सामने वाले की भावनाओं को समझने और सम्मान देने में छिपी होती है. ‘हनुमान अंश’ में नीम करोली बाबा के जीवन से जुड़ा ऐसा ही एक छोटा-सा प्रसंग आता है, जो पर्दे पर कुछ मिनटों का है, लेकिन दिल में देर तक ठहर जाता है. ये कहानी है उनकी पत्नी रामबेटी की, जो पति से दूर रहकर भी उनके लिए प्रेम और सम्मान अपने मन में संजोए रखती हैं.
फिल्म में नीम करोली बाबा के शादीशुदा जीवन पर भी रोशनी डाली गई है. 12 साल की उम्र से सीता-राम के ध्यान में रम चुके लक्ष्मी नारायण को दाम्पत्य जीवन कभी रास नहीं आया. वह मोह-माया से दूर गुफा-कुटिया में अपना जीवन बिताने लगे और इसी राह पर आगे चलकर नीम करोली बाबा के रूप में पहचाने गए.
लेकिन कहानी में एक मोड़ तब आता है, जब सालों बाद उनके पिता उन्हें बहला-फुसलाकर घर वापस ले आते हैं. बचपन में ही रामबेटी से उनका विवाह हो चुका था और वह इतने सालों से मायके में रह रही थीं. ये बात लक्ष्मी नारायण लगभग भूल ही चुके थे. पिता उनके गौने का फैसला करते हैं. यहीं से फिल्म में एक बेहद मीठा और भावुक सीक्वेंस शुरू होता है. बैकग्राउंड में गाना बजता है- ‘जब जिद पर आईं पार्वती, समझाने पहुंचे सप्तऋषि...’ और कहानी जैसे अचानक एक अलग ही रंग में उतर जाती है.
दूल्हा बने बाबा, घर का राशन भी लाए... लेकिन प्रेम से रहे दूर
गौना कराने से पहले लक्ष्मी नारायण दाढ़ी-बाल बनवाते हैं और दूल्हे की तरह तैयार होते हैं. रामबेटी को घर भी ले आते हैं, घर का राशन तक लेकर आते हैं. देखने में लगता है कि अब शायद उनकी गृहस्थी बस जाएगी. लेकिन यहां फिल्म एक अलग ही भाव सामने रखती है.
नीम करोली बाबा गृहस्थी की जिम्मेदारी तो निभाते हैं, मगर रामबेटी को उस दाम्पत्य प्रेम और सुख से दूर रखते हैं जिसकी एक पत्नी स्वाभाविक तौर पर उम्मीद करती है. दिन गुजरते रहते हैं और रामबेटी भी चुप रहती हैं.

लेकिन आखिर एक दिन उनके सब्र का बांध टूट जाता है.
जब बाबा कहते हैं कि वह नीम करोली गांव जाकर अपने भक्तों से मिलने जाएंगे, तो रामबेटी अपने मन में दबा सवाल आखिर पूछ ही लेती हैं. वह पूछती हैं- क्या मैं सुंदर नहीं हूं? क्या मुझमें कोई कमी है?
बाबा मुस्कुराते हुए सिर्फ ‘नहीं’ कहते हैं. लेकिन रामबेटी की शिकायतें रुकती नहीं हैं. तभी बाबा सरसों के कुछ दाने उठाते हैं, उन्हें अपनी जीभ पर रखते हैं और मुंह खोलकर पत्नी को दिखाते हैं. इसके बाद जो होता है, वह रामबेटी को भीतर तक हिला देता है. सरसों का दाना जैसे अंकुरित होकर फूल में बदल जाता है. रामबेटी समझ जाती हैं कि उनके पति कोई साधारण इंसान नहीं, बल्कि एक दिव्य पुरुष हैं.
और फिर वह उन्हें रोकती नहीं. अंगोछा, लोटा और कंबल बांधकर उनके सफर की तैयारी कर देती हैं.

इस पूरे प्रसंग का सबसे खूबसूरत हिस्सा शायद इसके आखिर में आता है. बाबा जाने लगते हैं तो रामबेटी हिचकिचाते हुए बस इतनी गुजारिश करती हैं- आप दाढ़ी बनाकर रखा करिए, ऐसे ही अच्छे लगते हैं. बाबा उनकी इस छोटी-सी इच्छा को मुस्कुराकर स्वीकार कर लेते हैं और नाई के पास जाकर दाढ़ी बनवा लेते हैं.
कहने को ये फिल्म का एक छोटा-सा सीन है, लेकिन मुझे इस दृश्य में प्रेम का एक बेहद शांत और खूबसूरत रूप नजर आया. यहां प्रेम पाने की जिद नहीं है, कोई आलोचना नहीं, बेरुखी वाले सवाल-जवाब नहीं... तामझाम नहीं है, कोई स्वार्थ नहीं है. रामबेटी ने अपने हिस्से का प्रेम मांगा जरूर, लेकिन निस्वार्थ भाव से, अपने हक से. पर जब उन्हें पति की राह और उनकी असल पहचान समझ आई, तो उन्हें रोकने के बजाय उनकी इच्छा का सम्मान किया.
सांसारिक नजरिए से अधूरी, लेकिन भावनाओं में पूरी
सांसारिक नजरिए से देखें तो नीम करोली बाबा और रामबेटी की ये कहानी अधूरी लग सकती है. एक पत्नी को पति का साथ नहीं मिला, दोनों का वैसा दाम्पत्य जीवन नहीं रहा जैसा आमतौर पर किसी शादी से उम्मीद की जाती है.
लेकिन प्रेम सिर्फ देह का रिश्ता नहीं, एक भावना भी है. और शायद इसी जगह ये कहानी अपनी सबसे खूबसूरत मंजिल तक पहुंचती है. रामबेटी के मन में पति के लिए प्रेम था, बाबा के मन में पत्नी के लिए सम्मान. और कई बार किसी रिश्ते को पूरा करने के लिए यही दो चीजें काफी होती हैं.
मैंने जब फिल्म में ये हिस्सा देखा तो सच कहूं, मन में उतर गया. लगा कि प्रेम हमेशा किसी को अपने पास रखने का नाम नहीं है. कभी-कभी सामने वाले की राह को स्वीकार कर लेना, उसकी छोटी-सी ख्वाहिश का सम्मान कर देना भी प्रेम को पूरा कर देता है. सांसारिक हिसाब से ये कहानी भले अधूरी हो, लेकिन अंतरमन से देखें तो ये दुनिया की किसी मशहूर प्रेम कहानी से कम पूरी नहीं लगती.
फिल्म का दूसरा पार्ट भी जल्द आने वाला है, इसलिए मुमकिन है कि आगे रामबेटी और नीम करोली बाबा के रिश्ते की कहानी को और विस्तार मिले. जानकारी के मुताबिक, बाबा और रामबेटी के तीन बच्चे- दो बेटे और एक बेटी थे और बाद में पत्नी रामबेटी उनके साथ रहने लगी थीं. यानी पर्दे पर दिखी ये छोटी-सी कहानी आगे चलकर एक और बड़ा भावनात्मक अध्याय खोल सकती है.