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Exclusive: 'हनुमान अंश' क्यों बनी बड़ी हिट? कुणाल खेमू ने बताया पूरा खेल, बोले- दो हफ्ते बाद हार...

कुणाल खेमू की नई फिल्म वाइब रिलीज हो चुकी है. उन्होंने इस फिल्म को डायरेक्ट भी किया है. फिल्म के सिलसिले में हमने उनसे बात की. इस दौरान उन्होंने हनुमान अंश की ग्रैंड सक्सेस पर भी बात की और फिल्म की कामयाबी का सीक्रेट भी बताया.

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हनुमान अंश की सक्सेस पर क्या बोले कुणाल खेमू. (Photo: ITG)
हनुमान अंश की सक्सेस पर क्या बोले कुणाल खेमू. (Photo: ITG)

‘मडगांव एक्सप्रेस’ से बतौर डायरेक्टर अपनी अलग पहचान बनाने वाले कुणाल खेमू अब एक बार फिर बड़े पर्दे पर लौटे हैं, लेकिन इस बार अंदाज थोड़ा अलग है. उनकी नई एक्शन-कॉमेडी फिल्म ‘वाइब’ थिएटर्स में दस्तक दे चुकी है, जहां एक्शन, कॉमेडी और नए चेहरों का दिलचस्प मेल देखने को मिल रहा है. फिल्म में कुणाल के साथ ‘लापता लेडीज’ फेम स्पर्श श्रीवास्तव और न्यूकमर वंशिका धीर लीड रोल में हैं. फिल्म की रिलीज के मौके पर स्टारकास्ट ने हमसे खास बातचीत की और बताया कि ‘वाइब’ आखिर किस तरह की कहानी है, कुणाल के लिए एक्टिंग और डायरेक्शन के बीच संतुलन कितना चुनौतीपूर्ण रहा और इस फिल्म से उनकी क्या उम्मीदें हैं.

वंशिका, बॉलीवुड में ये आपका डेब्यू है. आपके लिए कैसी ‘वाइब’ है? पहली फिल्म को लेकर नर्वस थीं?

 मैं बहुत एक्साइटेड हूं, नर्वस भी हूं. बस अब उम्मीद कर रही हूं कि फिल्म रिलीज हो गई है तो लोग इसे देखने जाएं और उन्हें करीना अच्छी लगे, मुझे फिल्म में मेरा काम अच्छा लगे. अब फिल्म आ गई है, लोग इसे बड़े पर्दे पर देखने जा सकते हैं, तो मेरे लिए ये बहुत एक्साइटिंग है. मैंने ये बात कई बार कही है, लेकिन सच कहूं तो मैं इस एहसास को शब्दों में बयां नहीं कर सकती.

कुणाल, ‘मडगांव एक्सप्रेस’ के बाद आपकी ये दूसरी डायरेक्टेड फिल्म है. क्या कहीं ये दबाव था कि पहली फिल्म के बाद दूसरी फिल्म उससे बेहतर होनी चाहिए?

हां, अगर मैं कहूं कि बिल्कुल कोई प्रेशर नहीं था, तो मैं झूठ बोलूंगा. प्रेशर था, लेकिन वो कंस्ट्रक्टिव प्रेशर था. ‘मडगांव एक्सप्रेस’ के वक्त शायद ऑडियंस कम या बिना किसी एक्सपेक्टेशन के फिल्म देखने आई थी, लेकिन जब उन्हें फिल्म पसंद आ गई तो अब वही ऑडियंस कुछ उम्मीदों के साथ आपकी अगली फिल्म देखने आएगी. ऐसे में आप चाहते हैं कि आप ज्यादा से ज्यादा लोगों को खुश करें, किसी को निराश न करें लेकिन मेरे लिए ये भी जरूरी था कि ‘वाइब’ को उसकी अपनी पहचान के साथ बनाया जाए. इसमें ह्यूमर है, लेकिन इसके किरदार और पूरा जोन ‘मडगांव एक्सप्रेस’ से बिल्कुल अलग है.

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 तो क्या फिल्म लिखते या बनाते वक्त कभी ये ख्याल आया कि ‘वाइब’ को ‘मडगांव एक्सप्रेस’ से बेहतर साबित करना है?

नहीं, मैंने इस तरह का प्रेशर कभी नहीं लिया कि मेरा अगला काम हर हाल में पिछले काम से बेहतर होना चाहिए. हां, कुछ नया करने की कोशिश जरूर करूंगा, क्योंकि अगर बिल्कुल वही फिल्म बनानी है तो फिर मैं खुद भी बोर हो जाऊंगा. ‘मडगांव एक्सप्रेस’ से अगर लोगों को एंटरटेनमेंट मिला था तो मेरी कोशिश यही रहती है कि मेरी हर फिल्म दर्शकों को एंटरटेन करे. अब ह्यूमर बहुत सब्जेक्टिव चीज है. किसी को ‘वाइब’ का ह्यूमर ज्यादा पसंद आ सकता है, किसी को ‘मडगांव एक्सप्रेस’ का. ये मेरे हाथ में नहीं है. मेरे हाथ में सिर्फ इतना है कि जो मुझे दिल से सही लगता है, मैं उसे ईमानदारी से बनाऊं. इसलिए मैंने सिर्फ इस डर से अपनी कहानी या फिल्म को बदलने की कोशिश नहीं की कि शायद ऐसा करने से दर्शक उसे ज्यादा पसंद करेंगे.

स्पर्श, ‘लापता लेडीज’ के बाद सीधे ‘वाइब’ में नजर आ रहे हैं. बॉलीवुड में अब तक का सफर कैसा रहा है?

मुझे लगता है कि मेरा सफर अभी शुरू ही हुआ है. मैंने अभी बस कुछ ही कदम चले हैं और आगे की जर्नी काफी लंबी है। ‘लापता लेडीज’ के बाद ‘वाइब’ जैसी फिल्म में काम करने का मौका मिलना मेरे लिए किसी वरदान से कम नहीं है. अक्सर ऐसा होता है कि किसी एक किरदार के बाद दर्शक आपको उसी तरह के किरदारों में देखना चाहते हैं, लेकिन एक एक्टर के तौर पर आप हमेशा उस इमेज को तोड़ना चाहते हैं. मेरे लिए ‘वाइब’ वही मौका लेकर आई. इसमें मुझे कुछ अलग करने का अवसर मिला और मैं सच में खुद को बहुत लकी मानता हूं कि इस फिल्म का हिस्सा बन पाया.

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वंशिका, आपकी पहली ही फिल्म में प्रीति जिंटा के साथ स्क्रीन शेयर करने का मौका मिला. उनके साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा?

बचपन में मैंने उनकी लगभग सारी फिल्में देखी हैं इसलिए जब मुझे पता चला कि मैं उनके साथ एक ही फिल्म में काम करने वाली हूं, तो मेरे लिए ये बहुत रियल और खास फीलिंग थी. मेरी फेवरेट फिल्म भी ‘वीर जारा’ है. ऐसे में उनके साथ स्क्रीन शेयर करना और उनके साथ काम करना मेरे लिए बहुत खास अनुभव रहा. मुझे उनके साथ काम करके बहुत मजा आया और मैं इसे हमेशा याद रखूंगी.

कुणाल, कॉमेडी में आजकल एक छोटी-सी बात या जोक भी लोगों को ऑफेंड कर सकता है. ऐसे में ‘वाइब’ लिखते वक्त क्या आपको सेल्फ-सेंसरशिप का ध्यान रखना पड़ा?

अभी तक मेरे साथ ऐसी नौबत नहीं आई है. मेरी अपनी एक सेंसिबिलिटी है और मैं उसी के हिसाब से चीजें लिखता हूं लेकिन किसी चीज को लेकर प्रॉब्लम तभी पता चलती है, जब वह लोगों के सामने आती है और कोई उस पर सवाल उठाता है. अब छोटी-छोटी चीजों पर भी लोग ऑफेंड हो जाते हैं, तो अगर आप हर चीज को उसी डर से देखने लगेंगे तो शायद बहुत से लोग काम ही नहीं कर पाएंगे लेकिन अगर कोई ऐसी मेजर चीज है, जिसे देखकर आपको खुद लगता है कि इसे किसी दूसरे तरीके से भी कहा जा सकता था, तो वहां इंटेंट बहुत मायने रखता है. अगर आपका इरादा किसी को हर्ट करने का नहीं है, तो आपको अपनी बात कहनी चाहिए लेकिन अगर आपके इंटेंट में किसी को ठेस पहुंचाना नहीं था और फिर भी एक बड़े तबके को किसी चीज से बुरा लगा, तो एक क्रिएटिव इंसान के तौर पर आप उससे सीख सकते हैं कि अगली बार उसी बात को किसी दूसरे तरीके से कैसे कहा जाए. यही क्रिएटिव माइंड होने का फायदा है. अगर आप किसी चीज को एक तरीके से नहीं कह सकते तो उसे किसी और तरीके से कहने की कोशिश कर सकते हैं.

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मेरे लिए फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन भी बहुत जरूरी है. हर किसी की अपनी राय होनी चाहिए और उसे जाहिर करने की आजादी भी होनी चाहिए. लेकिन फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन का मतलब ये नहीं है कि आपको हर चीज कहनी ही है. सेल्फ-सेंसरशिप भी जरूरी है सिर्फ इसलिए कि मैं गाली दे सकता हूं, इसका मतलब ये नहीं कि मुझे हर जगह गाली देनी ही है. उस सिचुएशन में उसकी जरूरत क्या है, ये फैसला भी क्रिएटर के हाथ में होता है.

स्पर्श, कुणाल फिल्म के डायरेक्टर भी हैं और एक्टर भी. तो आपके लिए ज्यादा मुश्किल क्या था. डायरेक्टर कुणाल के साथ काम करना या एक्टर कुणाल के साथ?

कुणाल इस फिल्म के लेखक, निर्देशक, प्रोड्यूसर और एक्टर हैं. प्रोड्यूसर होना सच में बहुत मुश्किल काम है. जब तक आप क्रिएटिव लोगों को उनकी क्रिएटिविटी पर ध्यान देने देते हैं, तब तक सब ठीक रहता है, लेकिन जैसे ही आप उन्हें नंबर्स और दूसरी चीजों में उलझाना शुरू करते हैं, तो वो परेशान होने लगते हैं. कुणाल ने काफी लंबे समय तक खुद को इन सब चीजों से अलग रखा और अपना काम पूरी ईमानदारी से करते रहे. लेकिन फिल्म खत्म होते-होते मैं उनमें थोड़ा बदलाव देख पा रहा था. फ्रस्ट्रेशन धीरे-धीरे आने लगी थी. इसके बावजूद उन्होंने खुद को बहुत मजबूत रखा, क्योंकि वह फिल्म में एक्टिंग भी कर रहे थे और अपने को-एक्टर्स पर उसका असर नहीं पड़ने देना चाहते थे.

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जब मैं फिल्म शुरू कर रहा था और हमारी रीडिंग चल रही थी, तब मेरे मन में थोड़ा डर था. मैं पहली बार ऐसी फिल्म पर काम कर रहा था, जहां डायरेक्टर ही मेरे को-एक्टर भी हैं और हमें स्क्रीन भी शेयर करनी है. मेरे लिए सवाल था कि ये सब कैसे होगा? फिर बाद में हमने तय किया कि हम दोनों एक-दूसरे को सिर्फ अपने किरदारों की नजर से देखेंगे. कुणाल ने भी मुझसे कहा, आप मुझे कैसे देखते हो, वो आपका प्रॉब्लम है. मैं तो आपको हार्दिक की तरह जानता हूं. यहां तक कि उन्होंने मेरा नंबर भी हार्दिक के नाम से सेव किया हुआ है.

वंशिका, अब आपका ड्रीम क्या है? आगे किस एक्टर-डायरेक्टर के साथ काम करना चाहेंगी?

मैंने इस बारे में कुणाल सर के साथ मजाक भी किया था. उस वक्त हम फ्यूचर अपॉर्चुनिटीज और इस बारे में बात कर रहे थे कि आगे किस तरह के प्रोजेक्ट्स करने हैं. मैंने उनसे कहा था कि प्लीज आप ‘वाइब 2’, ‘वाइब 3’, ‘वाइब 4’, ‘वाइब 5’ बनाते रहिए, मैं उसमें ही काम करती रहूंगी. अगर किसी पसंदीदा डायरेक्टर के साथ काम करने की बात करूं, तो मुझे इम्तियाज अली बहुत पसंद हैं. उनकी फिल्में मुझे बहुत अच्छी लगती हैं और उनके साथ काम करना मेरे लिए वाकई एक सपना होगा.

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कुणाल, इस समय एक्शन फिल्मों का काफी बोलबाला है. आप उस जोन से बच रहे हैं या फिर कॉमेडी की राह ही चलना चाहते हैं?

नहीं, मुझे खुद एक्शन फिल्में बहुत पसंद हैं. देखिए, मैंने ‘मडगांव एक्सप्रेस’ में कॉमेडी की थी, जो तीन दोस्तों की रोड ट्रिप की कहानी थी. एक्शन-कॉमेडी भी ऐसा जॉनर है, जो मुझे बहुत पसंद है इसलिए इस फिल्म को बनाते वक्त मेरी कोशिश थी कि जिस तरह कॉमेडी को एक प्योरिस्ट की तरह ट्रीट किया जाता है, उसी तरह एक्शन को भी एक्शन की तरह ही ट्रीट किया जाए. मेरा मकसद ये बिल्कुल नहीं था कि अभी एक्शन फिल्मों का दौर चल रहा है, इसलिए एक एक्शन फिल्म बना लेते हैं. मैं हमेशा उस स्क्रिप्ट और उस जॉनर के प्रति ईमानदार रहने की कोशिश करता हूं, जिसे मैं एक्सप्लोर करना चाहता हूं. ‘वाइब’ भी उसी सोच और इरादे के साथ बनाई गई है.

स्पर्श, आपका आगे का क्या प्लान है? अब कौन सी फिल्म कर रहे हैं या कोई ओटीटी प्रोजेक्ट आने वाला है?

अगले महीने ‘दोपहिया’ का सीजन 2 आ रहा है, तो अभी पूरा फोकस उसी पर है कि वह दर्शकों के बीच कैसा परफॉर्म करता है. इसके अलावा नागा चैतन्य और निर्देशक कार्तिक दांडू की आगामी पौराणिक और रहस्यमयी थ्रिलर फिल्म ‘वृषकर्मा’ भी है, जो दिसंबर में रिलीज होने वाली है. बाकी अभी सबसे ज्यादा फोकस ‘वाइब’ पर है. हम चाहते हैं कि फिल्म अच्छा करे और दर्शक इसे पसंद करें.

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कुणाल, शर्मिला जी का भी फिल्म में कैमियो है. उन्हें इस फिल्म के लिए मनाने का क्या प्रोसेस रहा?

मैं शर्मिला जी के पास बिल्कुल ईमानदारी से गया और उनसे कहा कि मेरे पास ये किरदार है, ये कैमियो है और अगर आप इसके लिए हां कहेंगी तो मैं बहुत खुशनसीब रहूंगा. उन्होंने ‘मडगांव एक्सप्रेस’ देखी थी और उन्हें फिल्म पसंद आई थी इसलिए उन्होंने तुरंत हां कह दी. उन्होंने पूरी स्क्रिप्ट तक नहीं सुनी. उन्होंने मुझसे बस पूछा कि किरदार क्या है. मैंने बताया कि कैमियो है, तो उन्होंने कहा, ‘मैं करूंगी तुम्हारी फिल्म.’ मेरे लिए ये बहुत बड़ी बात है. मेरी खुशनसीबी है कि मेरे बायो में ये भी लिखा जाएगा कि मैंने शर्मिला टैगोर को डायरेक्ट किया है.

इस समय ‘हनुमान अंश’ काफी अच्छा चल रही है. क्या आपके मन में कभी ऐसा ख्याल आया है कि कॉमेडी के बाद अब कोई धार्मिक फिल्म बनाई जाए?

देखिए, अभी तक तो ऐसा कुछ नहीं सोचा है, लेकिन कभी मत कहो कि कभी नहीं हो सकता. ‘Never say never.’ और मुझे ‘हनुमान अंश’ के अच्छा करने पर बहुत खुशी है सिर्फ इसलिए नहीं कि एक अच्छी कहानी दर्शकों तक पहुंची और चली, बल्कि इसलिए भी कि इस फिल्म से जुड़े मेकर्स का अपनी फिल्म पर जिस तरह का विश्वास था, वह काबिल-ए-तारीफ है.

आप देखिए, जब किसी फिल्म को शुरुआती एक-दो हफ्तों में थिएटर में बिजनेस नहीं मिलता, तो उसे वहां बनाए रखना किसी के लिए भी बहुत मुश्किल होता है. बड़े-बड़े स्टूडियोज के लिए भी. क्योंकि जब दर्शक नहीं आ रहे होते, तो थिएटर के शोज कम होने लगते हैं. ‘हनुमान अंश’ के साथ भी ऐसा हुआ. लेकिन मैं मानता हूं कि इसके मेकर्स के जज्बे और उनके विश्वास की तारीफ होनी चाहिए कि वे डटे रहे. उन्होंने चार हफ्तों तक अपनी फिल्म को थिएटर में बनाए रखा. चार हफ्ते बाद जो हुआ, वह शायद इसीलिए संभव हो पाया क्योंकि उन्होंने दो हफ्ते बाद हार नहीं मानी. अगर वे उस वक्त फिल्म को लेकर पीछे हट जाते और फिल्म थिएटर से उतर जाती, तो आज जो ‘हनुमान अंश’ के साथ हुआ है, वह शायद नहीं होता. सबसे अच्छी बात ये है कि इस फिल्म ने लोगों को फिल्मों, कला और सिनेमा को लेकर एक तरह का प्रोत्साहन भी दिया है.

कुणाल, आपकी फिल्म ‘वाइब’ दर्शक क्यों देखें? और क्या इसका सीक्वल भी आएगा?

अगर आप एक एंटरटेनिंग फिल्म देखना चाहते हैं, दोस्तों की कहानी देखना चाहते हैं, जिसमें ह्यूमर के साथ एक्शन और कॉमेडी है, तो ‘वाइब’ आपके लिए है. अगर दोस्तों के साथ थिएटर में अच्छा समय बिताना चाहते हैं, हंसना चाहते हैं और एक अच्छी वाइब के साथ वक्त बिताना चाहते हैं, तो थिएटर जाइए और ‘वाइब’ देखिए. अभी सिनेमाघरों में ‘वाइब’ है, तो जाइए, देखिए और एंजॉय कीजिए.

जहां तक सीक्वल की बात है, तो आइडिया जरूर है. लेकिन अभी हम देखना चाहते हैं कि फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कैसा परफॉर्म करती है और बाद में जब ओटीटी पर आती है, तो दर्शकों का रिस्पॉन्स कैसा रहता है. अगर फिल्म की डिमांड होती है और दर्शक इसका सीक्वल चाहते हैं, तो हम जरूर ‘वाइब 2’ बनाने के बारे में सोचेंगे.

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