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'धुरंधर 2' दमदार स्टोरी टेलिंग के बावजूद क्यों लगती है प्रोपेगेंडा फिल्म?

‘धुरंधर 2’ बॉक्स ऑफिस पर इतिहास रच रही है, लेकिन साथ ही ‘प्रोपेगेंडा’ की बहस में भी घिर गई है. फिल्म में मोदी सरकार, नोटबंदी और आतंकी नेटवर्क के कनेक्शन को दिखाने का तरीका चर्चा में है. कहानी के बहुत सारे इवेंट रियल घटनाओं से बहुत मेल खाते हैं. तो फिर फिल्म 'प्रोपेगेंडा' क्यों लग रही है?

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क्यों प्रोपेगेंडा लगती है 'धुरंधर 2'? (Photo: ITGD)
क्यों प्रोपेगेंडा लगती है 'धुरंधर 2'? (Photo: ITGD)

‘धुरंधर 2’ के लिए दिल्ली में 200 रुपये के सबसे सस्ते टिकट से लेकर 2400 रुपये के सबसे महंगे टिकट तक के शोज सोल्ड-आउट रहे. मुंबई में चौबीसों घंटे थिएटर्स खुले. ईद पर ‘धुरंधर 2’ हिंदी सिनेमा के इतिहास में पहली बार एक दिन में 100 करोड़ नेट कलेक्शन लेकर आई.

इनमें से कुछ भी दर्शकों के धुआंधार सपोर्ट के बिना पॉसिबल नहीं है. पर दूसरी तरफ ‘धुरंधर 2’ प्रोपेगेंडा के टैग से भी लड़ रही है. क्रिटिक्स, मीडिया और सोशल मीडिया इस बहस में बंटे जा रहे हैं. दर्शकों का ये रिस्पॉन्स और ‘प्रोपेगेंडा’ की बहस ‘धुरंधर 2’ के दो बिल्कुल अलग पहलू हैं. मगर दोनों को एक ही चीज जोड़ती है— आदित्य धर की स्टोरीटेलिंग. और ‘धुरंधर 2’ प्रोपेगेंडा लग क्यों रही है, इसका जवाब भी इसी स्टोरीटेलिंग में छुपा है.

पीएम मोदी की रफ्तार और ‘धुरंधर 2’ की धार
आईबी चीफ अजय सान्याल (आर माधवन) का पाकिस्तान में घुसकर आतंकी नेटवर्क तबाह करने प्लान ‘मिशन धुरंधर’, पहली फिल्म में ही कामयाब होने लगा था. लेकिन ‘धुरंधर 2’ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शपथग्रहण के साथ इस मिशन की पावर ही बदल जाती है. स्क्रीन पर पीएम मोदी की नोटबंदी वाली ऐतिहासिक स्पीच भी आती है.

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पीएम के कई बार स्क्रीन पर नजर आने के बाद ‘धुरंधर 2’ नोटबंदी से आतंकी नेटवर्क को हुए नुकसान दिखाने लगती है. पाकिस्तान में बैठे मेजर इकबाल, दाऊद इब्राहिम और आतंकी किरदार बार-बार जिक्र कर रहे हैं कि एक ‘चायवाले’ ने उन्हें तबाह कर दिया है. इस नेटवर्क का इंडियन चैनल बना एक गैंगस्टर कम नेता फ्रस्ट्रेशन में कह रहा है— ‘एक चायवाला घुसकर फट गया है हम में!’

ये किरदार उत्तर प्रदेश के एक रियल नेता की याद दिलाता है, जिसकी हत्या टीवी पर लाइव दिखाई गई थी. इस हत्या को फिल्म मिशन धुरंधर से ही जोड़ देती है. भारत में आतंकी साजिशों का हिस्सा रहे कई बड़े आतंकवादियों की भी पाकिस्तान में इसी तरह हत्या होती है, जैसे उस भारतीय नेता की हुई थी.

फिल्म में 2014 में पीएम मोदी का आना, सरकार बदलना और नोटबंदी आखिरकार मिशन धुरंधर की कामयाबी के अल्टीमेट कारण बनते हैं. जबकि पिछली सरकार और विपक्षी पार्टियों को ‘धुरंधर 2’ अजय सान्याल के मिशन को कमजोर करने वाला दिखाती है. एक पॉइंट पर भारत में नई सरकार आने से नाराज एक पाकिस्तानी आतंकी कैरेक्टर दूसरे से कह रहा है— ‘तुमने तो दावा किया था कि हमारे लोगों की सरकार आएगी’.

इन सारी चीजों की वजह से ही ‘धुरंधर 2’ को प्रोपेगेंडा का टैग दिया जा रहा है. लेकिन क्या कहानी के कॉन्टेक्स्ट में रियल पॉलिटिकल फैसलों को दिखाना गलत है? क्या ये फिल्ममेकर को किसी एक पॉलिटिकल रंग में रंगता है? इसे समझने के लिए ये देखिए कि ‘धुरंधर 2’ ने रियल पॉलिटिकल घटनाएं दिखाने का नैरेटिव किस शर्त पर चुना है.

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पर्सनल एजेंडा, प्रोपेगेंडा और एलियंस!
पाकिस्तान की जमीन पर खड़े होकर ‘मिशन धुरंधर’ को अंजाम देने की जिम्मेदारी जसकीरत सिंह रांगी की है. रणवीर का किरदार उन रियल लाइफ हीरोज को ट्रिब्यूट होना चाहिए था जिन्होंने जसकीरत की तरह अपनी जिंदगी भारत के नाम कर दी और फिर भी गुमनाम ही रहे. और इसके लिए जसकीरत के शरीर और आत्मा, दोनों का टूटना ‘धुरंधर 2’ में भरपूर इमोशनल तरीके से दर्ज होना चाहिए था.

‘धुरंधर 2’ छोटी फिल्म नहीं है, इसका रनटाइम ऑलमोस्ट 4 घंटे है. मगर ये अपने हीरो के साथ उतनी मजबूती से नहीं खड़ी दिखती, जितनी मजबूती से वो देश के साथ खड़ा है. जसकीरत के साथ जो हुआ, वो किसी भी इंसान को इमोशनली जर्जर बना सकता है. सोल्जर बनने जा रहा 21 साल का लड़का अन्याय के चलते किलर बन जाता है. क्यों? क्योंकि देश का करप्ट सिस्टम उसके साथ खड़ा नहीं हुआ. क्या जसकीरत की इस शिकायत, इस दुख को फिल्म में ज्यादा जगह नहीं मिलनी चाहिए थी?

‘धुरंधर 2’ इस दुख को जगह देती तो है, पर एक करप्ट सिस्टम से पीड़ित जसकीरत, सान्याल की एक छोटी सी स्पीच से देश के लिए खड़ा हो जाता है. पाकिस्तान में जसकीरत अपने दो दोस्तों को एक झटके में सिर्फ खोता ही नहीं, उनके मरने की वजह भी बनता है. इस बोझ का वजन एक किरदार को कितना इंटरनल दर्द दे सकता है!

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‘धुरंधर 2’ इस सीक्वेंस में ‘बाजीगर ओ बाजीगर’ गाकर जसकीरत के किलिंग मशीन वर्जन को सेलिब्रेट करती है और आगे बढ़ जाती है. लेकिन एंडिंग के वक्त फिल्म के पास सान्याल को उसकी प्लानिंग को सेलिब्रेट करने का पूरा वक्त है. जबकि सान्याल ने भी वही किया जो उससे उम्मीद की जाती है और जसकीरत ने भी. आलम (गौरव गेरा) और रिजवान (मुस्तफा अहमद) की पर्सनल कहानी का तो जिक्र भी 'धुरंधर 2' को जरूरी नहीं लगता.  

कहानी के हीरोज के साथ इमोशनल सहानुभूति रखने के मौके पर तेज कदमों से आगे निकल जाना. और देश के प्रति अपनी ड्यूटी ठीक से निभाने के लिए राजनीतिक नेतृत्व को सेलिब्रेट करने के लिए ठहर जाना— यही ‘धुरंधर 2’ में आदित्य धर की इंटेंशन पर सवाल उठने की वजह बन रहा है.  

‘धुरंधर 2’ का ये नैरेटिव आदित्य की पर्सनल चॉइस भी हो सकती है, जिसका उन्हें पूरा अधिकार है. और अगर ये कोई पॉलिटिकल मोटिवेशन भी है, तो कम से कम जनता को इसमें कोई नुकसान नहीं नजर आ रहा. पब्लिक अगर देशहित में परेशानियां सहते हुए भी एटीएम की लाइनों में लग सकती है, तो देश की नैतिक जीत को सेलिब्रेट करने वाली ‘धुरंधर 2’ के लिए टिकट की लाइन में भी लग सकती है.

अपने देश के लिए आम जनता का सेंटिमेंट इतना ही पावरफुल होता है. 'धुरंधर 2' पसंद आई इसलिए ये जनता अतीक अहमद के आपराधिक रिकॉर्ड, अज्ञात बंदूकधारियों द्वारा पाकिस्तान में मारे गए आतंकियों के रियल नाम, और पाकिस्तान से भारत के पंजाब तक ड्रग्स का कारोबार कर रहे किरदारों की रियल लाइफ इंस्पिरेशन— सारी जानकारी खोदकर निकाल चुकी है. आदित्य धर की डिटेलिंग का शोर पूरे सोशल मीडिया पर है.

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आदित्य धर की ‘धुरंधर 2’ फैक्ट्स को फिक्शन से इस तरह जोड़ती है कि कुछ समय बाद लोग उसे सच भी मानने लगेंगे. ये पूरा सच है या नहीं, ये सिर्फ सरकार को पता है. लेकिन बता नहीं सकती, क्योंकि ऐसी जानकारियों का बाहर आना देश की सुरक्षा और डिप्लोमेसी के लिए रिस्क होता है. इसलिए ‘धुरंधर 2’ एक ऐसे सेफ जोन में है, जहां न कोई इसे पूरी तरह फेक बता सकता है, न पूरी तरह सच. इससे एक दिलचस्प कहानी याद आती है.

हॉलीवुड में स्टीवन स्पीलबर्ग ने ऐसी एलियन फिल्में बनाई हैं कि जनता को इनके होने पर यकीन होने लगा. एक कॉन्सपिरेसी थ्योरी ये है कि एलियंस सच में होते हैं और सुरक्षा एजेंसीज का उनसे कॉन्टैक्ट भी हुआ है. लेकिन ये जानकारी बाहर आना बवाल पैदा कर सकता है. इसलिए अमेरिका का डिफेंस डिपार्टमेंट पेंटागन, स्पीलबर्ग के साथ मिलकर जनता को धीरे-धीरे एलियंस के प्रति जागरूक करने के लिए प्रोपेगेंडा फिल्में बना रहा है. इसे ‘सॉफ्ट डिस्क्लोजर’ थ्योरी कहा जाता है.

स्पीलबर्ग ने 1977 में अपनी पहली एलियन फिल्म ‘क्लोज एनकाउंटर्स ऑफ द थर्ड काइंड’ (Close Encounters of The Third Kind) बनाई थी. कहानी रियल लगे, इसलिए उन्होंने एस्ट्रोनॉमर और प्रोफेसर जॉन एलेन हाईनेक को अपनी फिल्म पर कंसल्टेंट रखा था. ट्विस्ट ये है कि अमेरिका ने एलियंस के होने या UFO से कॉन्टैक्ट की बात कभी ऑफिशियली स्वीकार नहीं की, लेकिन यूएस एयरफोर्स ने UFO की स्टडी के लिए तीन बड़े प्रोजेक्ट चलाए. और इन तीनों में एडवाइजर थे— जोसेफ एलेन हाईनेक. स्पीलबर्ग के कंसल्टेंट! 

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