
बलात्कार और हत्या जैसे जघन्य अपराध के बाद एक सवाल बार-बार सामने आता है- क्या कानून को अपना काम करने देना चाहिए या फिर अपराध कबूल करने वाले दोषियों को तुरंत सजा मिलनी चाहिए? यही सवाल मेघना गुलजार की फिल्म ‘दायरा' आपके सामने रखती है. फर्क बस इतना है कि फिल्म आपको किसी एक जवाब की तरफ धकेलती नहीं, बल्कि दोनों पक्षों को सामने रखकर सोचने पर मजबूर करती है.
मेरे लिए ‘दायरा’ की सबसे बड़ी खूबी यही है कि ये सिर्फ पुलिस और अपराधी की कहानी नहीं है. ये कानून, इंसाफ, पुलिस की जवाबदेही और व्यक्तिगत नैतिकता के बीच की उस पतली लकीर की कहानी है, जहां सही और गलत के बीच का फर्क अचानक धुंधला पड़ने लगता है.
फिल्म 18 सितंबर को सिनेमाघरों में रिलीज होगी, उससे पहले पढ़ें हमारा ये रिव्यू और जानें कैसी है फिल्म...
कहानी में है असली टकराव
फिल्म की कहानी DCP रमन कुमार (पृथ्वीराज सुकुमारन) और DCP अजूनी कोहली (करीना कपूर खान) के इर्द-गिर्द घूमती है. रमन और उसकी टीम पर एक युवती के रेप और मर्डर के आरोपियों को एनकाउंटर में मारने का मामला है. अब इस केस की जांच अजूनी को सौंपी जाती है. यहीं से फिल्म का असली खेल शुरू होता है.
अजूनी साफ कहती है- मैं अपने साथियों की जांच नहीं करती, मैं घटनाओं की जांच करती हूं. उसके लिए वर्दी से पहले कानून है. दूसरी तरफ रमन का मानना है कि जब सिस्टम बार-बार देरी करता है, तब अपराधियों को उनके किए की सजा मिलना भी जरूरी है. यही दोनों के बीच का टकराव फिल्म को बांधे रखता है.
फिल्म कई रियल इंसीडेंट्स से प्रेरणा लेते हुए अपनी कहानी बनाती है. 2012 के निर्भया केस के बाद कानून और रेप के मामलों में हुई बहस भी कहानी में आते हैं. लेकिन अच्छी बात ये है कि फिल्म सिर्फ उस घटना को दोहराने के बजाय देरी से मिलने वाले इंसाफ और पुलिस की जिम्मेदारी जैसे सवालों को कहानी का हिस्सा बनाती है.

करीना और पृथ्वीराज ने संभाला मोर्चा
करीना कपूर खान बतौर DCP अजूनी काफी असरदार लगी हैं. उनके किरदार में वो आम बॉलीवुड वाली गुस्सैल पुलिस अफसर की छवि नहीं है. अजूनी अपनी बात डायलॉग, तर्क और सूखे हास्य से रखती है. उनका शांत लेकिन सख्त अंदाज किरदार को अलग बनाता है. पृथ्वीराज सुकुमारन का रमन भी उतना ही मजबूत है. उनका किरदार जरूरत से ज्यादा चीखता-चिल्लाता नहीं, बल्कि अपनी चुप्पी और आंखों के एक्सप्रेशन से दबाव बनाता है. रमन कानून की प्रक्रिया जानता है, लेकिन उसके लिए इंसाफ में देरी भी एक बड़ी समस्या है.
सबसे दिलचस्प बात दोनों के बीच की प्रोफेशनल टक्कर है. करीना और पृथ्वीराज की केमिस्ट्री यहां रोमांस वाली नहीं, बल्कि विचारों और कानून की लड़ाई वाली है और यही फिल्म की बड़ी ताकत बनती है. सपोर्टिंग कास्ट में कंवलजीत सिंह, अचिंत कौर, अनुजा साठे, सीमा आजमी, बिस्वपति सरकार और जितेंद्र जोशी अपने-अपने हिस्से में ठीक बैठते हैं. हालांकि कुछ किरदारों को ज्यादा स्क्रीन टाइम नहीं मिलता.
मेघना गुलजार को ऐसे विषयों की समझ पहले भी ‘तलवार’ और ‘राजी’ में दिखाई दी है. ‘दायरा’ में भी उनका डायरेक्शन कहानी पर हावी होने के बजाय कहानी को आगे बढ़ाता है. फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर ज्यादातर जगहों पर जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल हुआ है. बेवजह का शोर या ओवर-द-टॉप साउंड डिजाइन नहीं है. इससे सिचुएशन और कलाकारों की परफॉर्मेंस को सांस लेने की जगह मिलती है.
स्क्रीनप्ले में दम, लेकिन दूसरा हाफ थोड़ा कमजोर
फिल्म का पहला हाफ सबसे मजबूत हिस्सा है. अजूनी की जांच, रमन का नजरिया और दोनों के बीच बढ़ता टकराव आपको कहानी में बनाए रखता है. शुरुआती हिस्से में जो सवाल खड़े किए जाते हैं, उनसे उम्मीद होती है कि फिल्म आगे जाकर इंसाफ और कानून की पूरी बहस को और गहराई से खोलेगी.
लेकिन इंटरवल के बाद फिल्म कुछ हद तक एक्शन और घटनाओं के नतीजों पर ज्यादा चली जाती है. अपराधियों की तलाश और आगे की घटनाओं को स्क्रीनप्ले थोड़ा सुविधाजनक तरीके से समेटता है. जिस सिस्टम और कानूनी प्रक्रिया की गहराई पहले हाफ में महसूस होती है, दूसरे हाफ में उस पर उतना फोकस नहीं रहता. यहीं फिल्म थोड़ी अपनी शुरुआती धार खोती है.
वहीं पीड़िता की मां के छोटे से किरदार में क्षिति जोग काफी असर छोड़ती हैं. उनका दर्द फिल्म को एक जरूरी इमोशनल एंकर देता है.

मैं मानती हूं कि ‘दायरा' एक अच्छी और गंभीर क्राइम थ्रिलर है, जिसकी सबसे बड़ी ताकत इसका सवाल है- कानून अपना काम करे या इंसाफ तुरंत हो? एक महिला होने के नाते मैं इससे बहुत रिलेट कर पाई. आप मुझपर पक्षपात का इल्जाम भी लगा सकते हैं. लेकिन मैं आपको ये जरूर बता दूं कि फिल्म उस सवाल का फैसला आपके लिए नहीं करती. यही इसकी खूबसूरती भी है और कुछ जगह इसकी सीमा भी.
पहला हाफ जबरदस्त तरीके से माहौल बनाता है, करीना और पृथ्वीराज उसे पूरी ताकत देते हैं, जबकि दूसरे हाफ में कहानी थोड़ी सीधी हो जाती है. फिर भी 143 मिनट की ये फिल्म आपको बांधे रखती है और थिएटर से निकलने के बाद भी इसके सवाल दिमाग में घूमते रहते हैं. अगर आपको सीरियस क्राइम थ्रिलर, पुलिस ड्रामा और सोचने पर मजबूर करने वाली कहानियां पसंद हैं, तो ‘दायरा’ आपके लिए एक ऐसी फिल्म है जिसे बड़े पर्दे पर देखा जा सकता है.