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राजनीति में एंट्री करते ही कांग्रेस के लिए चुनौती बन गए थे नरेंद्र मोदी

1985 नरेंद्र मोदी की राजनीति में एंट्री हुई. आरएसएस ने मोदी की लगन और परिश्रम को देखकर बीजेपी में भेजने का फैसला किया. 1987 में नरेंद्र मोदी ने अहमदाबाद नगर निकाय चुनाव में प्रचार में मदद की

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नरेंद्र मोदी (फाइल फोटो)
नरेंद्र मोदी (फाइल फोटो)

भारत की राजनीति की बात अगर साल 2000 के बाद करना शुरू करें तो नरेंद्र मोदी के नाम के बिना इसे पूरा नहीं किया जा सकता. आज हम प्रधानमंत्री मोदी नहीं, बीजेपी कार्यकर्ता और संघ के स्वंयसेवक नरेंद्र मोदी के बारे में बताएंगे.

नरेंद्र मोदी का जन्म 17 सितंबर 1950 में गुजरात के वडनगर में हुआ, लेकिन मोदी के सामाजिक जीवन की शुरुआत जून 1975 में हुई. देश में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगा दी थी और कई बड़े नेताओं को जेल में ठूंस दिया गया था. इस दौरान मोदी को आरएसएस के समर्थन से चलने वाली गुजरात लोक संघर्ष समिति का महासचिव नियुक्त किया गया. कुछ समय बाद आरएसएस पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया. गिरफ्तारी से बचने के लिए मोदी अंडरग्राउंड हो गए.

नरेंद्र मोदी दिल्ली आ गए और केंद्र सरकार के फैसले को चुनौती देने के लिए रणनीति बनाने लगे. इस दौरान उन्होंने सरकार के फैसले के खिलाफ पर्चे छपवाए. इमरजेंसी खत्म हुई और मोदी आरएसएस के प्रचारक बन गए. सूरत और वडोदरा में संघ की शाखाओं के विस्तार के लिए उन्होंने रात दिन काम किया. साल 1979 में उन्हें आरएसएस के काम के लिए दिल्ली बुला लिया गया. अब नरेंद्र मोदी संघ के एक सक्रिय स्वंयसेवक बन चुके थे उन्हें दिल्ली में शोध और इमरजेंसी पर लेख लिखने की जिम्मेदारी दी गई.

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1985 में नरेंद्र मोदी की राजनीति में एंट्री हुई. आरएसएस ने मोदी की लगन और परिश्रम को देखकर बीजेपी में भेजने का फैसला किया. 1987 में नरेंद्र मोदी ने अहमदाबाद नगर निकाय चुनाव में प्रचार में मदद की. इन चुनावों में बीजेपी आराम से जीत गई. 1986 में लाल कृष्ण आडवाणी बीजेपी अध्यक्ष बने और आरएसएस ने अपने कार्यकर्ता बीजेपी में अहम पदों पर नियुक्त करने का फैसला किया. इस दौरान नरेंद्र मोदी को भी बीजेपी गुजरात में संगठन की जिम्मेदारी दी गई.

इसके बाद 1990 में नरेंद्र मोदी को राष्ट्रीय चुनाव समिति का सदस्य बनाया गया. मोदी ने 1990 में लाल कृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा और 1991-92 में मुरली मनोहर जोशी की एकता यात्रा आयोजित करने में मदद की. 1995 के गुजरात विधानसभा चुनाव में बीजेपी जीत गई और नरेंद्र मोदी की रणनीति की चर्चा पार्टी में जोर-शोर से होने लगी. इसी साल नवंबर में नरेंद्र मोदी को पार्टी का राष्ट्रीय महासचिव बनाकर दिल्ली बुलाया गया. 1998 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को पूर्ण बहुमत मिला और केशुभाई पटेल मुख्यमंत्री बने.

2001 में गुजरात में भूकंप आया और सरकार से जनता में नाराजगी को देखते हुए बीजेपी हाईकमान ने नरेंद्र मोदी को राज्य की कमान सौंपने का फैसला किया. 7 अक्टूबर 2001 को नरेंद्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री की शपथ ली. साल 2002 भारत के राजनेताओं द्वारा हमेशा याद किया जाता है क्योंकि इस साल नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री रहते हुए गुजरात दंगे हुए. सरकार आंकड़ों के मुताबिक, इन दंगों में 790 मुस्लिम और 254 हिंदुओं की मौत हुई. जबकि स्वतंत्र एजेंसियों ने इन दंगों में 2000 लोगों के मारे जाने की बात कही.

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दंगों के बीच नरेंद्र मोदी को खुद को साबित करना था क्योंकि राज्य में विधानसभा चुनाव होने थे. मोदी गोवा में हुई बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में अपने इस्तीफे की पेशकश कर चुके थे जिसे पार्टी ने स्वीकार करने से इनकार कर दिया था. मोदी के नेतृत्व में पार्टी ने दिसंबर 2002 में चुनाव लड़ा और 182 में से 127 सीटें बीजेपी को मिलीं. नरेंद्र मोदी ने मुख्यमंत्री की शपथ ली, लेकिन बीजेपी को 2004 में हुए आम चुनावों में हार का सामना करना पड़ा और अटल बिहारी वाजपेयी ने हार के लिए गुजरात दंगों को जिम्मेदार ठहराया. अब बारी राज्य में 2007 के विधानसभा चुनावों की थी और मोदी की एक बार फिर अग्निपरीक्षा की. 2007 के गुजरात विधानसभा चुनावों में भी 182 में से 122 सीटें मिलीं. इसी तरह 2012 में भी बीजेपी को जीत मिली और नरेंद्र मोदी के दिल्ली पहुंचने की आवाज भी उठने लगी.

नरेंद्र मोदी को बीजेपी ने सितंबर 2013 में प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया और पूरे देश में मोदी लहर चल पड़ी. हर तरफ मोदी सरकार के नारे लगने लगे और नतीजों में भी यह दिखा. 2014 में बीजेपी को पूर्ण बहुमत के साथ 282 सीटें मिलीं. 1984 के बाद पहली बार किसी पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला. 26 मई 2014 को नरेंद्र मोदी ने भारत के 14वें प्रधानमंत्री की शपथ ली.

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