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राज्यसभा चुनाव में सपा ने क्यों नहीं उतारा तीसरा उम्मीदवार, क्या जादुई आंकड़ा नहीं जुटा पाए अखिलेश

राज्यसभा चुनाव में सपा द्वारा तीसरा प्रत्याशी न उतारे जाने के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं कि क्या पार्टी 111 विधायकों के जादुई आंकड़े से पिछड़ गई. हालांकि, क्रॉस-वोटिंग के जोखिम से बचने और 2027 के विधानसभा चुनाव पर ध्यान केंद्रित करने की अखिलेश यादव की रणनीति के चलते पार्टी ने केवल दो सीटों पर ही अपने उम्मीदवार सीमित रखे हैं.

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अखिलेश यादव ने राज्यसभा में उतारे सिर्फ दो प्रत्याशी (Photo-Getty)
अखिलेश यादव ने राज्यसभा में उतारे सिर्फ दो प्रत्याशी (Photo-Getty)

उत्तर प्रदेश से राज्यसभा की 10 सीटों के लिए हो रहे चुनाव में समाजवादी पार्टी ने अपना तीसरा उम्मीदवार न उतारकर सियासी गलियारों में चल रही तमाम अटकलों पर विराम लगा दिया है. बीजेपी के 8 प्रत्याशियों के ऐलान के बाद कयास लगाए जा रहे थे कि सपा भी अपना तीसरा प्रत्याशी उतारकर मुकाबले को दिलचस्प बनाएगी, लेकिन नामांकन की समय सीमा समाप्त होने तक सपा ने खुद को केवल दो सीटों तक ही सीमित रखा.

राज्यसभा के लिए सपा ने चार नामांकन पत्र खरीदे थे. सपा नेताओं द्वारा तीन प्रत्याशी उतारने और अखिलेश यादव द्वारा 'सरप्राइज उम्मीदवार' दिए जाने के दावे किए जा रहे थे. हालांकि, सपा की तरफ से केवल प्रो. रामगोपाल यादव और धनराज नथवानी ने ही नामांकन दाखिल किया. तीसरे उम्मीदवार के न उतरने से अब 10 सीटों के लिए मैदान में केवल 10 उम्मीदवार ही बचे हैं. ऐसे में अगर किसी का पर्चा खारिज नहीं होता है, तो सभी 10 उम्मीदवारों का निर्विरोध चुना जाना लगभग तय है.

सपा द्वारा तीसरा उम्मीदवार न उतारे जाने के बाद यह सवाल उठ रहे हैं कि क्या पार्टी विधायकों के 'नंबर गेम' में पिछड़ गई और 111 विधायकों का जादुई आंकड़ा नहीं जुटा पाई? या फिर अखिलेश यादव ने किसी संभावित क्रॉस-वोटिंग के जोखिम से बचने के लिए यह कदम उठाया है?

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सपा ने क्यों नहीं उतारा तीसरा उम्मीदवार?

उत्तर प्रदेश विधानसभा में विधायकों की संख्या के आधार पर बीजेपी के पास सात और सपा के पास दो सीटें आसानी से जीतने का संख्याबल था. असल मुकाबला 10वीं सीट को लेकर माना जा रहा था, क्योंकि इसके लिए दोनों ही दलों के पास स्पष्ट बहुमत नहीं था. माना जा रहा था कि 10वीं सीट के लिए दोनों पक्ष जोर-जमाइश करेंगे. सपा के एक विधायक ने स्वीकार किया कि प्रस्तावक के तौर पर कुछ कोरे नामांकन पत्रों पर विधायकों के हस्ताक्षर भी कराए गए थे.

राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए प्रथम वरीयता के आधार पर 37 विधायकों के वोटों की जरूरत होती है. 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा के 111 विधायक जीतकर आए थे, लेकिन 2026 तक यह संख्या घटकर 98 रह गई है (इसमें वे बागी विधायक शामिल नहीं हैं जिन्होंने 2024 के राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग की थी). कांग्रेस के 2 विधायकों को जोड़ने पर भी यह आंकड़ा केवल 100 तक ही पहुंचता है.

दो सीटों को सुरक्षित जिताने के लिए सपा को 74 विधायकों के वोट चाहिए थे, जिसके बाद पार्टी के पास 26 अतिरिक्त (सरप्लस) वोट बचते. तीसरी सीट जीतने के लिए सपा को कम से कम 11 और विधायकों के समर्थन की जरूरत थी. चूंकि पिछली बार क्रॉस-वोटिंग के कारण सपा को बड़ा झटका लगा था, इसलिए इस बार तीसरा उम्मीदवार उतारने पर मुकाबला कड़ा हो जाता. ऐसी स्थिति में बीजेपी के पास निर्दलीय, छोटे दलों और सपा के असंतुष्ट विधायकों को साधने का मौका होता. अखिलेश यादव पार्टी में किसी नई बगावत या टूट का जोखिम नहीं उठाना चाहते थे, इसलिए उन्होंने कदम पीछे खींचना ही मुनासिब समझा.

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111 विधायकों का आंकड़ा नहीं जुटा सकी सपा?

अखिलेश यादव ने दोनों प्रत्याशियों के नामांकन के दौरान संकेत दिए थे कि यदि आंकड़े पूरे हो गए तो तीसरे उम्मीदवार का ऐलान कर दिया जाएगा. हालांकि, इसके लिए कम से कम 111 विधायकों के समर्थन की दरकार थी. दो सीटें सुरक्षित करने के बाद सपा के पास 26 अतिरिक्त वोट थे (जिसमें जेल में बंद सपा विधायक रमाकांत यादव का वोट भी शामिल था). इस स्थिति में पार्टी के सामने 12 अन्य विधायकों को जोड़ने की कड़ी चुनौती थी.

सपा की नजर तटस्थ और विपक्षी विधायकों पर थी. सुभासपा के तीन ऐसे विधायक जो सपा पृष्ठभूमि के रहे हैं, उनके साथ आने की उम्मीद थी. इसके अलावा यदि पार्टी से निष्कासित न किए गए बागी विधायक लौट आते, तो आंकड़ा 32 तक पहुंच सकता था. फिर भी तीसरी सीट के लिए 6 से 7 वोटों की कमी पड़ रही थी.

अखिलेश यादव ने बागी विधायकों से पुरानी बातें भुलाकर बीजेपी को रोकने के लिए एकजुट होने की अपील भी की थी. सपा को उम्मीद थी कि दो साल पहले बागी हुए विधायक वापस आ सकते हैं. लेकिन बीजेपी प्रत्याशियों के नाम के ऐलान के बाद बागी विधायक राकेश प्रताप सिंह, अभय सिंह और विनोद चतुर्वेदी ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात कर ली, जिससे यह साफ हो गया कि वे सपा में नहीं लौटेंगे.

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वहीं सुभासपा से केवल अब्बास अंसारी ने अखिलेश यादव से मुलाकात की थी. बीजेपी के किसी अन्य सहयोगी दल में भी कोई टूट देखने को नहीं मिली. तमाम कोशिशें के बावजूद सपा आखिरकार तीसरे उम्मीदवार के लिए विधायकों का जुगाड़ नहीं कर सकी 

सपा के बाकी विधायकों ने भी अपने हाथ खड़े किए

समाजवादी पार्टी ने तीसरे उम्मीदवार की सारी तैयारी कर ली थी यहां तक की प्रस्तावक और सेट भी तैयार था, लेकिन बीजेपी के भीतर से कम से कम 4 से 5 विधायक की जरूरत थी जो नहीं हो पाया. बागी विधायक जिन्होंने पिछली बार समाजवादी पार्टी से बगावत करके भाजपा को वोट किया था और चार विधायकों को समाजवादी पार्टी ने निलंबित नहीं किया था वह भी टूट नहीं पाए 

आरएलडी के विधायक चट्टान की तरह पार्टी के साथ बने रहे. अखिलेश यादव के सामने एक और बड़ा चैलेंज था 8वें उम्मीदवार के सामने उन्हें अपना तीसरा उम्मीदवार महिला कर्मी चेहरे के खिलाफ खड़ा करना था, यह बीजेपी का एक मास्टर स्ट्रोक जैसा था. 

संतोष गंगवार की बेटी श्रुति गंगवार के सामने समाजवादी पार्टी को नंबर गेम मिला और कोई ऐसा चेहरा नहीं मिला जो चुनाव लड़ने को तैयार हो सके. ऐसे में अखिलेश यादव ने ट्वीट कर बता दिया कि वह तीन सीट जीतने के लिए नहीं बल्कि 403 सीट जीतने के लिए तैयारी कर रहे हैं. नतीजतन, सपा जरूरी संख्याबल नहीं जुटा पाई और उसने तीसरी सीट का दांव छोड़ दिया.

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2027 का चुनाव ही असली लक्ष्य: अखिलेश यादव

तीसरा प्रत्याशी न उतारने के फैसले पर अखिलेश यादव ने स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी का मुख्य ध्यान राज्यसभा की एक अतिरिक्त सीट पर नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों (मिशन 2027) पर है. उन्होंने संकेत दिया कि पार्टी किसी जोड़-तोड़ में ऊर्जा गंवाने के बजाय आगामी राज्य चुनावों के लिए अपने संगठन को एकजुट रखना चाहती है.

2024 के लोकसभा चुनावों के नतीजों से उत्साहित सपा अब राज्यसभा के बजाय 2027 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी से सीधे आर-पार के मूड में है.

उधर, बीजेपी और उसके सहयोगियों (अपना दल एस, आरएलडी, सुभासपा, निषाद पार्टी) का संयुक्त आंकड़ा 8 प्रत्याशियों को जिताने के लिए पूरी तरह पर्याप्त है. सपा द्वारा मैदान खाली छोड़ने से बीजेपी के सभी 8 और सपा के 2 उम्मीदवारों का निर्विरोध निर्वाचन तय हो गया है. साफ है कि सपा नंबर गेम में थोड़ा पीछे जरूर थी, लेकिन इस फैसले की मुख्य वजह जोखिम प्रबंधन (रिस्क मैनेजमेंट) ही रही.

सभी 10 राज्यसभा प्रत्याशी चुने जाएंगे निर्विरोध

उत्तर प्रदेश की 10 सीटों के लिए बीजेपी के 8 और सपा के 2 उम्मीदवारों ने नामांकन दाखिल किया है. कुल सीटों के बराबर ही प्रत्याशी होने के कारण मतदान की नौबत नहीं आएगी. नामांकन प्रक्रिया 29 सितंबर से शुरू होकर 6 अक्टूबर दोपहर 3 बजे तक चली. 7 अक्टूबर को पर्चों की जांच होगी और 9 अक्टूबर तक नाम वापस लिए जा सकेंगे.

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सपा की ओर से प्रो. रामगोपाल यादव और धनराज नथवानी मैदान में हैं. वहीं बीजेपी की ओर से धर्मपाल सिंह, वरिष्ठ अधिवक्ता राधाकांत ओझा, प्रकाश पाल, विद्यासागर सोनकर, गोपी कृष्ण पांडेय, प्रियंका सिंह रावत, रामप्रताप सिंह चौहान और श्रुति गंगवार (झारखंड के राज्यपाल संतोष गंगवार की बेटी) ने पर्चा भरा है. यदि जांच में सभी पर्चे वैध पाए जाते हैं, तो 9 अक्टूबर को सभी 10 प्रत्याशियों को निर्विरोध निर्वाचित घोषित कर दिया जाएगा.

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