पांच राज्यों - पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरलम और पुडुचेरी के विधानसभा चुनाव परिणाम सोमवार को सामने आ गए. इन परिणामों ने भारतीय राजनीति के भविष्य पर एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है. पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की हार, तमिलनाडु में द्रविड़ मुनेत्र कजगम (डीएमके) और अन्नाद्रमुक (एआईएडीएमके) की पराजय तथा केरल में वाम मोर्चे का लगभग सफाया हो जाना इस बात की पुष्टि करता है कि देश में क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का वर्चस्व तेजी से कम हो रहा है.
बंगाल में टीएमसी और तमिलनाडु में डीएमके जैसी मजबूत पार्टियों को जनता ने नकार दिया. बिहार में राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी), उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (सपा) और दिल्ली में आम आदमी पार्टी (आप) की स्थिति भी कमजोर दिखाई दे रही है. यह महज संयोग नहीं, बल्कि पिछले एक दशक से चल रहे एक बड़े ट्रेंड का हिस्सा है. भारत अब अमेरिका और ब्रिटेन की तर्ज पर द्विदलीय व्यवस्था की ओर बढ़ता दिख रहा है.
कई राजनीतिक विश्लेषक इसे लोकतंत्र की परिपक्वता और स्थिरता का संकेत मान रहे हैं. लेकिन सवाल यह है कि क्या हमारे संविधान निर्माताओं की यही मंशा थी?
संघीय ढांचा और क्षेत्रीय दलों की भूमिका
भारतीय संविधान सभा ने 1950 में जो संघीय ढांचा बनाया, वह न तो अमेरिकी मॉडल की तरह शक्तिशाली राज्यों वाला था और न ही ब्रिटिश प्रणाली की तरह पूरी तरह केंद्रीकृत. संविधान निर्माताओं ने भारत को 'राज्यों का संघ' घोषित किया. अनुच्छेद 1 में स्पष्ट है कि भारत राज्यों का संघ होगा.
यह भी पढ़ें: बंगाल में हुमायूं-ओवैसी रहे बेअसर, असम में अजमल का भी फ्लॉप शो... समझें मुस्लिम वोटिंग पैटर्न
यह व्यवस्था विविधता को स्वीकार करती है. भाषाई, सांस्कृतिक, क्षेत्रीय और जातीय अस्मिताओं को राजनीतिक अभिव्यक्ति देने के लिए क्षेत्रीय दलों को पर्याप्त जगह दी गई. संविधान निर्माताओं को पता था कि इतने बड़े और विविध देश को केवल एक या दो राष्ट्रीय दलों के सहारे नहीं चलाया जा सकता.
केंद्रीकरण और बदलती राजनीति
2014 के बाद केंद्र में मजबूत बहुमत वाली सरकार ने नीतियों को इस तरह केंद्रीकृत किया कि राज्य के मुद्दे राष्ट्रीय विमर्श में समाहित होते चले गए. जीएसटी, कृषि कानूनों पर विवाद, सीएए-एनआरसी, वन नेशन वन इलेक्शन और डिजिटल इंडिया जैसी योजनाओं ने राज्यों की स्वायत्तता को सीमित किया.
नतीजतन, क्षेत्रीय दल जो स्थानीय मुद्दों - पानी, बिजली, रोजगार, भाषा और संस्कृति - पर आधारित थे, अब राष्ट्रीय दलों की छाया में सिमटते जा रहे हैं. जहां पहले तमिलनाडु में डीएमके-एआईएडीएमके, बंगाल में टीएमसी, बिहार में आरजेडी-जद(यू) और उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा जैसे गठबंधन राजनीति तय करते थे, वहां अब राष्ट्रीय दलों का प्रभाव बढ़ता दिख रहा है.
द्विदलीय व्यवस्था: फायदे और तर्क
इस बदलाव को सकारात्मक मानने वालों का तर्क है कि द्विदलीय व्यवस्था स्थिरता लाती है. अमेरिका में डेमोक्रेट्स और रिपब्लिकन्स तथा ब्रिटेन में कंजर्वेटिव और लेबर पार्टी के बीच सत्ता परिवर्तन सहज होता है. नीतियों में निरंतरता रहती है और मतदाता के सामने स्पष्ट विकल्प होता है.
इसके अलावा, यह भी कहा जाता है कि क्षेत्रीय दल अक्सर परिवारवाद, जातिवाद और स्थानीय दबाव समूहों से प्रभावित होते हैं, जबकि राष्ट्रीय दल अपेक्षाकृत व्यापक दृष्टिकोण रखते हैं.
यह भी पढ़ें: थलपति विजय की ऐतिहासिक जीत, टीवीके बनी ताकत, परिवार और फैंस में खुशी की लहर
क्या भारत इस मॉडल के लिए तैयार है?
लेकिन सवाल यह है कि क्या भारत की विविधता इस मॉडल को स्वीकार कर पाएगी? क्षेत्रीय दलों ने संघीय ढांचे को मजबूत किया है. 1967 के बाद गैर-कांग्रेसी सरकारों का उदय और 1990 के दशक का गठबंधन युग इस बात का उदाहरण है कि क्षेत्रीय दलों ने केंद्र को राज्यों की मांगों पर ध्यान देने के लिए मजबूर किया. भाषाई राज्यों का गठन और विशेष दर्जे की मांगें भी इन्हीं दलों की देन हैं.
आज जब क्षेत्रीय दल कमजोर हो रहे हैं, तो संघीय भावना भी कमजोर होती दिख रही है. केंद्र और राज्यों के बीच शक्ति संतुलन में बदलाव दिखाई दे रहा है.
क्षेत्रीय दलों की कमजोरियां
हालांकि, क्षेत्रीय दलों की गिरावट के पीछे उनकी अपनी कमियां भी जिम्मेदार हैं. परिवारवाद, भ्रष्टाचार, संगठनात्मक कमजोरी और स्थानीय मुद्दों तक सीमित रह जाना इनकी बड़ी चुनौतियां रही हैं.
मतदाता अब विकास, सुशासन और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे बड़े मुद्दों पर वोट कर रहे हैं, जिससे राष्ट्रीय दलों की पकड़ मजबूत हुई है.
आगे का रास्ता
फिर भी, यह सवाल बना हुआ है कि क्या द्विदलीय व्यवस्था भारत की बहुलता को संरक्षित रख पाएगी? भारत जैसे विविध समाज में अगर केवल दो राष्ट्रीय दल रह गए, तो असम, तमिलनाडु, पंजाब, कश्मीर या पूर्वोत्तर के स्थानीय मुद्दों को कौन उठाएगा? क्या एक राष्ट्रीय पार्टी सभी भाषाई और सांस्कृतिक अस्मिताओं का प्रतिनिधित्व कर सकती है?
इतिहास बताता है कि अत्यधिक केंद्रीकरण से क्षेत्रीय असंतोष बढ़ सकता है. संविधान निर्माताओं का 'अनेकता में एकता' का सपना क्षेत्रीय दलों की सक्रियता पर भी निर्भर करता है.
यह भी पढ़ें: 'मैं अमित शाह हूं...', बंगाल में ममता को दिया वो चैलेंज, जो 12 साल बाद हुआ पूरा
क्या हल है?
आज जब भारत द्विदलीय व्यवस्था की ओर बढ़ता दिख रहा है, तो यह जरूरी है कि इस ट्रेंड पर गंभीरता से विचार किया जाए. लोकतंत्र केवल बहुमत का शासन नहीं, बल्कि विविधता की रक्षा भी है.
राष्ट्रीय दलों को क्षेत्रीय दलों के साथ संतुलन और सहयोग की राजनीति को बढ़ावा देना चाहिए. साथ ही, चुनाव सुधार, राज्यपाल की भूमिका पर स्पष्टता और वित्तीय संघीयता को मजबूत करने जैसे कदम जरूरी हैं, ताकि भारतीय लोकतंत्र की मूल भावना बनी रहे.