उत्तर प्रदेश का मैनपुरी जिला अपनी समृद्ध ऐतिहासिक विरासत, कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था और राजनीतिक महत्व के लिए पूरे देश में जाना जाता है. ब्रज क्षेत्र का यह महत्वपूर्ण जिला प्राचीन परंपराओं और आधुनिक राजनीति का एक अनूठा संगम पेश करता है. माना जाता है कि इस क्षेत्र का नाम 'मयैन' या महान ऋषि मयन ऋषि के नाम पर पड़ा था, जिन्होंने यहां आश्रम बनाकर तपस्या की थी.
मध्यकाल में यह क्षेत्र चौहान वंश के राजपूत राजाओं का प्रमुख केंद्र रहा. 1857 की क्रांति से लेकर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन तक मैनपुरी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. यहां स्थित 'समान पक्षी अभयारण्य' को देखने के लिए दूर-दराज से लोग आते हैं. लकड़ी पर तारकशी और पीतल की नक्काशी के लिए भी यहां की हस्तशिल्प कला दुनिया भर में प्रसिद्ध है.
मैनपुरी मुख्यतः एक कृषि-प्रधान जिला है. यहां की अधिकांश जनसंख्या आजीविका के लिए खेती और पशुपालन पर निर्भर है. यह जिला धान और बढ़िया क्वालिटी वाले बासमती चावल के उत्पादन के लिए जाना जाता है. क्षेत्र में आलू की खेती भी खूब होती है. मैनपुरी के कपूरी तम्बाकू की अपनी अलग पहचान है. यह जिला भारतीय राजनीति में विशेष महत्व रखता है और इसे समाजवादी पार्टी (सपा) का अभेद्य गढ़ माना जाता है.
बात सियासत की
राजनीति की बात की जाए तो मैनपुरी सपा संस्थापक 'मुलायम सिंह यादव की राजनीतिक कर्मभूमि' कही जाती है. यहां से मुलायम सिंह यादव कई बार सांसद रहे और वर्तमान में भी यह सीट सपा का मजबूत आधार है. अभी मुलायम की बहू डिंपल यादव मैनपुरी लोकसभा सीट का प्रतिनिधित्व कर रही हैं. 2022 के उपचुनाव में भी डिंपल ने जीत दर्ज की थी. 1996 के बाद से मैनपुरी लोकसभा सीट पर लगातार समाजवादी पार्टी ही जीतती आ रही है.
मैनपुरी में सबसे ज्यादा मतदाता यादव समुदाय से हैं. इसके अलावा शाक्य, ठाकुर, लोधी, ब्राह्मण और जाटव (दलित) मतदाता यहां के चुनावों में बेहद निर्णायक भूमिका निभाते हैं.
मैनपुरी जिले में कुल 4 विधानसभा सीटें हैं:
मैनपुरी
किशनी (सुरक्षित)
मैनपुरी विधानसभा सीट का हाल:
जिला मुख्यालय की इस सीट पर समय-समय पर भाजपा और सपा दोनों का कब्जा रहा है. 2012 और 2017 में यहां सपा ने जीत दर्ज की थी, लेकिन 2022 में भाजपा ने यहां बड़ा उलटफेर किया. भाजपा के जयवीर सिंह ने 99 हजार से अधिक वोट पाकर सपा के राजकुमार उर्फ राजू यादव को नजदीकी मुकाबले में हरा दिया था. इस सीट पर जातीय समीकरण की बात करें तो यादव, शाक्य, ठाकुर, ब्राह्मण और वैश्य मतदाता बेहद अहम रोल अदा करते हैं.
भोगांव विधानसभा सीट का हाल:
1993 से 2012 तक भोगांव विधानसभा सीट पर सपा का दबदबा रहा. लेकिन 2017 के बाद से यह सीट भाजपा का मजबूत स्तंभ बन चुकी है. 2017 और 2022 के चुनावों में लगातार भाजपा के रामनरेश अग्निहोत्री ने सपा के आलोक कुमार शाक्य को शिकस्त दी. पार्टी ने अग्निहोत्री को इस जीत का इनाम भी दिया और उन्हें यूपी सरकार में मंत्री बनाया. भोगांव शाक्य और लोधी राजपूत मतदाता बहुल सीट है. ठाकुर, यादव और ब्राह्मण मतदाता भी निर्णायक हैं.
किशनी विधानसभा सीट का हाल:
मैनपुरी जिले की किशनी विधानसभा सीट समाजवादी पार्टी का अभेद्य दुर्ग मानी जाती है. परिसीमन के बाद से ही यहां सपा का एकछत्र राज रहा है. 2017 और 2022 के चुनाव में सपा के इंजीनियर ब्रजेश कठेरिया ने अच्छे खासे अंतर से जीत हासिल की. जातीय समीकरण की बात की जाए तो यहां जाटव (दलित) और यादव मतदाताओं का वर्चस्व है. इसके अलावा शाक्य और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के वोटर भी बढ़ी तादाद में हैं.
करहल विधानसभा सीट का हाल:
करहल विधानसभा को समाजवादी पार्टी का सबसे मजबूत किला माना जाता है. यहां से पार्टी को हराना बेहद मुश्किल समझा जाता है. 2022 में सपा राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव खुद करहल से पहली बार विधानसभा चुनाव लड़े थे. 2022 में उन्होंने करीब डेढ़ लाख वोट हासिल कर इस सीट पर बड़ी जीत दर्ज की थी. अखिलेश ने भाजपा के प्रो. एसपी सिंह बघेल (वर्तमान केंद्रीय मंत्री) को 65 हजार से अधिक वोटों से हराया था. बाद में 2024 में अखिलेश यादव के सांसद बनने पर यह सीट खाली हुई थी. उपचुनाव में यादव परिवार के ही चिराग तेज प्रताप सिंह यादव यहां से विधायक चुने गए.
गौरतलब है कि इस सीट पर भारी संख्या में यादव मतदाता हैं. साथ ही शाक्य, पाल (बघेल) और ठाकुर मतदाता भी अच्छी-खासी तादाद में हैं. यादव समाज सपा का परंपरागत वोटर रहा है. इसलिए करहल में सपा की जीत की राह और भी आसान हो जाती है.
कुल मिलाकर 2017 के विधानसभा चुनावों में मैनपुरी जिले की 4 में से 3 सीटों पर सपा और 1 सीट पर भाजपा जीती थी. वहीं 2022 के विधानसभा चुनावों में कांटे की टक्कर देखने को मिली और परिणाम 2-2 की बराबरी (सपा 2, भाजपा 2) पर आ छूटा. करहल और किशनी जहां सपा का गढ़ बने हुए हैं, वहीं सदर मैनपुरी और भोगांव सीट पर भाजपा ने अपनी मजबूत पकड़ बनाई है. अब सबकी निगाहें 2027 के चुनाव पर टिकी हुई हैं.