scorecardresearch
 

'राम हमारे संस्कार और आदर्श हैं', अयोध्या में मालिनी अवस्थी ने बताई रामकथा की अहमियत

मालिनी अवस्थी ने कहा कि किसी फिल्म या रचना की आलोचना जरूर होनी चाहिए, लेकिन उसे देखे और समझे बिना अपनी राय बनाना ठीक नहीं है. उन्होंने लोगों से अपील की कि रामायण पर बन रही फिल्मों और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों को देखें और नई पीढ़ी को भी अपनी सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराएं.

Advertisement
X
पंचायत आजतक अयोध्या में मालिनी अवस्थी (Photo-ITG)
पंचायत आजतक अयोध्या में मालिनी अवस्थी (Photo-ITG)

पंचायत आजतक अयोध्या में मशहूर लोक गायिका मालिनी अवस्थी शामिल हुईं. इस दौरान उन्होंने अयोध्या के बदलते स्वरूप, दीपोत्सव की परंपरा, राम मंदिर, भारतीय संस्कृति और लोक परंपराओं पर विस्तार से बात की. उन्होंने कहा कि एक समय अयोध्या उदास और शांत नगरी हुआ करती थी, लेकिन अब वहां की रौनक लौट आई है. मालिनी अवस्थी ने कहा कि भगवान राम भारतीय समाज के संस्कार और आदर्श हैं. राम सिर्फ धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं हैं, बल्कि भारतीय परिवारों और जीवन मूल्यों का हिस्सा हैं.

मालिनी अवस्थी ने अयोध्या में अपने पुराने दिनों को याद करते हुए बताया कि करीब 28 साल पहले उन्हें डेढ़ साल तक अयोध्या में रहने का मौका मिला था. उस समय अयोध्या का माहौल काफी उदास और शांत था. रामलला के दर्शन टेंट में होते थे और शासन-प्रशासन की ओर से भी उस समय की स्थिति अलग थी. हालांकि, रामनवमी के मौके पर तब भी श्रद्धालुओं का उत्साह देखने लायक होता था. गोंडा, देवीपाटन, नेपाल और बिहार से बड़ी संख्या में लोग भगवान राम का जन्मोत्सव मनाने अयोध्या पहुंचते थे.

उन्होंने कहा कि अब अयोध्या का पूरा स्वरूप बदल गया है. शहर की पुरानी उदासी दूर हो गई है और यहां उत्सव का माहौल दिखाई देता है.

यह भी पढ़ें: अखिलेश के अयोध्या दौरे की खबर पर जयेंद्र राठौर का तंज, माफी मिलने में लगेंगे 30 साल

Advertisement

दीपोत्सव ने दुनिया को अयोध्या से जोड़ा

दीपोत्सव के आयोजन पर बात करते हुए मालिनी अवस्थी ने कहा कि दीपावली का असली अर्थ भगवान राम का 14 साल के वनवास के बाद अयोध्या लौटना और परिवार का फिर से एक होना है. दीपावली केवल दीप जलाने का त्योहार नहीं, बल्कि अपनों के साथ मिलने और खुशियां बांटने का अवसर भी है. उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अयोध्या में दीपोत्सव की शुरुआत करके इसी मूल भावना को दुनिया के सामने रखने की कोशिश की है. अब दीपोत्सव के दौरान अयोध्या में लाखों दीये जलाए जाते हैं और दुनियाभर के लोग इस आयोजन का इंतजार करते हैं. इस साल 30 लाख दीये जलाने का लक्ष्य भी इसी उत्साह का प्रतीक है.

मालिनी अवस्थी ने दीपोत्सव की एक खास बात साझा करते हुए बताया कि इस आयोजन में अब तक कोई अप्रिय घटना नहीं हुई है. बड़ी संख्या में युवा और छात्र पूरे उत्साह से दीये जलाने में जुटते हैं. उन्होंने सरयू घाट का एक पुराना अनुभव भी साझा किया, जब रात करीब साढ़े आठ-नौ बजे लोग बुझते हुए दीयों में दोबारा तेल डालकर उन्हें जला रहे थे. उनके मुताबिक, यह दृश्य बताता है कि लोगों के लिए दीपोत्सव सिर्फ एक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था और सामूहिक भागीदारी का उत्सव बन चुका है.

Advertisement

दीपोत्सव में दुनिया की अलग-अलग रामकथाओं का मंचन खास

मालिनी अवस्थी ने कहा कि दीपोत्सव की सबसे खूबसूरत बात सिर्फ लाखों दीये जलाना नहीं है, बल्कि इस दौरान दुनिया के अलग-अलग देशों और संस्कृतियों की रामायण और रामकथाओं का मंचन भी होता है. उन्होंने बताया कि श्रीलंका, इंडोनेशिया, रूस और नेपाल जैसे देशों की रामलीलाओं में रामकथा को अलग-अलग अंदाज में प्रस्तुत किया जाता है.

यह भी पढ़ें: बीजेपी के 'गुंडाराज' से जनता परेशान, पवन पांडेय का दावा- बनेगी सपा सरकार

'राम हमारे संस्कार हैं, सिर्फ धार्मिक आस्था नहीं'

भगवान राम के भारतीय समाज में महत्व पर मालिनी अवस्थी ने कहा कि राम भारतीय परिवारों के संस्कार और जीवन के आदर्श हैं. उन्होंने कहा कि बच्चा जन्म से ही अपने घर में राम का नाम सुनता है. दादा-दादी और परिवार के दूसरे सदस्यों के अभिवादन से लेकर शादी-ब्याह के गीतों तक राम का जिक्र मिलता है. इस तरह इंसान को पता भी नहीं चलता और वह राम के आदर्शों से जुड़ता चला जाता है.

उन्होंने कहा कि राम आदर्श पुत्र, आदर्श भाई और आदर्श पति के रूप में भारतीय समाज के सामने एक उदाहरण हैं. भगवान राम ने पिता के वचन का सम्मान करने के लिए राजपाट छोड़कर वनवास स्वीकार किया. उन्होंने वनवास के दौरान अपनी सेना खुद तैयार की और वनवासियों को साथ लेकर रावण से युद्ध किया. मालिनी अवस्थी के मुताबिक, राम का जीवन हर व्यक्ति को मर्यादा, त्याग और आदर्शों के साथ जीने की सीख देता है. यही वजह है कि महात्मा गांधी ने भी रामराज्य की कल्पना को अपने विचारों में जगह दी थी.

Advertisement

21 साल पहले दूरदर्शन में राम जन्म का जिक्र करने पर रोक का दावा

मालिनी अवस्थी ने अपने करियर का एक पुराना अनुभव साझा करते हुए बताया कि करीब 21 साल पहले दूरदर्शन दिल्ली में उनकी एक रिकॉर्डिंग के दौरान राम जन्म से जुड़ी प्रस्तुति पर आपत्ति जताई गई थी. उन्होंने बताया कि वह होली और फागुन के गीतों के साथ रामनवमी से जुड़ी एक चैती प्रस्तुत करना चाहती थीं, लेकिन रिकॉर्डिंग के दौरान प्रोड्यूसर ने उन्हें रोक दिया.

उनके मुताबिक, प्रोड्यूसर ने कहा था कि राम के अयोध्या में जन्म लेने की बात नहीं गाई जा सकती, क्योंकि उस समय यह मामला अदालत में विचाराधीन था. मालिनी अवस्थी ने इस पर आपत्ति जताई और कहा कि लोक परंपराओं में राम के अयोध्या में जन्म लेने की मान्यता पीढ़ियों से चली आ रही है. उन्होंने रिकॉर्डिंग छोड़ने का फैसला किया.

उन्होंने कहा कि उस समय सोशल मीडिया नहीं था, इसलिए ऐसी घटनाएं लोगों के सामने नहीं आ पाती थीं. लेकिन आज हर व्यक्ति के पास अपनी बात रखने का मंच है. मालिनी अवस्थी ने इस अनुभव को याद करते हुए कहा कि करीब 19 साल बाद उन्हें रामलला के मंदिर के प्राकट्य उत्सव के अवसर पर अयोध्या में प्रस्तुति देने का अवसर मिला. उनके लिए यह लंबे इंतजार के बाद मिला एक भावुक और खास अनुभव था.

Advertisement

यह भी पढ़ें: अखिलेश यादव ने रामलला के दर्शन के लिए क्यों चुना 12 दिसंबर की तारीख

राम से दूरी बनाने वाले कलाकार भी अब रामकथा से जुड़ रहे

मालिनी अवस्थी ने कहा कि समय के साथ कलाकारों और समाज के एक वर्ग के नजरिये में भी बदलाव आया है. उन्होंने कहा कि पहले कई कलाकार भजन गाने या राम का नाम लेने से परहेज करते थे, लेकिन अब वही कलाकार रामकथा और भक्ति से जुड़ी प्रस्तुतियां कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि आज कई कलाकार रामायण और सुंदरकांड जैसे विषयों पर कार्यक्रम तैयार कर रहे हैं. यहां तक कि जो लोग पहले राम और अयोध्या से दूरी बनाकर रखते थे, वे अब अयोध्या आ रहे हैं और अपनी आस्था जाहिर कर रहे हैं. उनके मुताबिक, यह बदलाव बताता है कि लोग अपनी संस्कृति और परंपराओं से फिर जुड़ना चाहते हैं. उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में राम का स्थान हमेशा से रहा है, लेकिन कई बार राजनीति और गलत धारणाओं के कारण इस पर बहस खड़ी होती रही.

रामायण पर आलोचना हो, लेकिन रचनात्मकता पर रोक नहीं

रामायण पर बन रही फिल्मों और उनके प्रस्तुतिकरण को लेकर चल रही बहस पर मालिनी अवस्थी ने कहा कि भारत में रामकथा की अनेक परंपराएं रही हैं. वाल्मीकि रामायण के अलावा जैन, बौद्ध और अलग-अलग भाषाओं में रामायण की रचनाएं मौजूद हैं. भवभूति, कालिदास और दूसरे रचनाकारों ने भी अपनी कल्पना और दृष्टिकोण से रामकथा को प्रस्तुत किया है. उन्होंने कहा कि लोकगीतों में भी रामायण से जुड़े कई ऐसे प्रसंग मिलते हैं, जिनमें महिलाओं और समाज की भावनाओं को अलग अंदाज में व्यक्त किया गया है. भारतीय परंपरा की खासियत रही है कि यहां रामकथा को लेकर अलग-अलग कल्पनाओं और प्रस्तुतियों को जगह मिली है.

---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Latest News in Hindi »
Advertisement