पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण के लिए 23 अप्रैल को मतदान होना है. जैसे-जैसे मतदान की तारीख करीब आ रही है, राज्य में प्रवासी मजदूरों की वापसी हो रही है. बिहार के ईंट भट्ठों से लेकर असम के निर्माण स्थलों तक, हजारों मजदूर अपना काम छोड़कर वोटिंग के लिए बंगाल लौट रहे हैं.
टीन के बक्सों में अपना सामान समेटे ये लोग खचाखच भरी बसों और 'मैजिक' वैन में सवार होकर कूचबिहार, अलीपुरद्वार, जलपाईगुड़ी और दार्जिलिंग पहुंच रहे हैं. उनके लिए ये सिर्फ वोट देने का मामला नहीं है, बल्कि अपनी राजनीतिक और नागरिक पहचान को सुरक्षित रखने की एक कोशिश है.
उत्तर बंगाल के दिनहाटा जैसे इलाकों में दस्तावेजों को लेकर भारी बेचैनी देखी जा रही है. कई मजदूरों के लिए ये यात्रा SIR और NRC के साये में अपनी जगह पक्की करने की रेस की तरह है.
असम से अपनी पत्नी और छोटे बेटे के साथ लौटे शाह आलम शेख ने अपनी मजबूरी बताई. वर्तमान रिकॉर्ड में नाम दर्ज कराने के लिए उन्हें 2002 तक के दस्तावेजों की जरूरत है. उन्होंने कहा, 'भविष्य में एक और SIR हो सकता है. हमें अपने बच्चों के भविष्य की रक्षा के लिए 2026 की लिस्ट में अपना नाम चाहिए. इसीलिए हम यहां वोट डालने आए हैं.'
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विकास बनाम पहचान की राजनीति
मजदूरों की राय बंटी हुई है. गुजरात से लौटे दिनहाटा के निवासी बिनॉय राय ने राज्य में रोजगार की कमी पर चिंता जताई. उन्होंने कहा कि बंगाल में काम न होने की वजह से उन्हें गुजरात जाना पड़ता है. वो गुजरात के विकास मॉडल से प्रभावित हैं और बोले, 'मैं उसी को वोट दूंगा जो मेरे राज्य का विकास गुजरात की तरह करेगा.'
दूसरी तरफ, बिहार से रातों-रात सफर कर पहुंचे मोहम्मद अशरफ अली और उनके साथी ममता बनर्जी के लिए काफी वफादार हैं. वो 2016 की नोटबंदी के दिनों को याद करते हैं जब उनके पास सिर्फ 500 रुपये का नोट था. अशरफ ने NRC के डर को वजह बताते हुए कहा, 'भले ही जान चली जाए, फिर भी मैं ममता को ही वोट दूंगा.'
सिलीगुड़ी में ममता का समर्थन
सिलीगुड़ी में भी पड़ोसी राज्यों और नेपाल से लौट रहे मजदूर तृणमूल कांग्रेस के पक्ष में नजर आए. हालांकि वो स्थानीय रोजगार की कमी को स्वीकार करते हैं, लेकिन 'शांति' और 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' को ज्यादा जरूरी मानते हैं. ट्रांजिट पॉइंट पर एक मजदूर ने कहा, 'अगर आप मोदी को वोट देंगे, तो सब कुछ (ट्रेन, एयरलाइन) बिक जाएगा, दीदी बेहतर हैं.'
एक मजदूर ने दावा किया कि बीजेपी शासित राज्यों में काम करने वाले उनके भाइयों को वापस आकर वोट देने की अनुमति भी नहीं दी जाएगी. इसीलिए उन्हें 'दीदी' के साथ खड़ा होना चाहिए.
दिनहाटा और कूचबिहार पहुंचने वाली बसों की छतों पर साइकिलें बंधी हुई हैं. अंदर बक्सों में परिवारों की जमा-पूंजी है. इन मजदूरों ने ठेकेदारों के साथ अपना हिसाब जल्दी निपटा लिया है ताकि वो 23 अप्रैल तक बंगाल पहुंच सकें.
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इन प्रवासी मजदूरों के लिए ये वोट सिर्फ प्रतिनिधि चुनने का जरिया नहीं है, बल्कि उनके अस्तित्व का एक दस्तावेज है. उत्तर बंगाल के राजमार्गों से यही संदेश मिल रहा है कि जब अपनी पहचान और वजूद का सवाल हो, तो कोई भी दूरी बहुत ज्यादा नहीं होती.
(इनपुट- पार्थ प्रतिम दाम और मंसूर हबीबुल्लाह)