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ओवैसी से खफा क्यों हैं मौलाना मदनी? बताने लगे कम्युनल, अजमल को भी दे दिया अल्टीमेटम

असम में मुस्लिम वोटर अच्छी खासी संख्या में है, जिनके सहारे मौलाना बदरुद्दीन अजमल ने अपनी राजनीति खड़ी की है. अजमल के समर्थन में असदुद्दीन ओवैसी के उतरने से मौलाना महमूद मदनी चिंतित हो गए हैं और उन्होंने बदरुद्दीन अजमल को अल्टीमेटम तक दे दिया है. सवाल खड़ा होता है कि मदनी को ओवैसी क्यों सांप्रदायिक लग रहे हैं?

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मुस्लिम सियासत पर छिड़ा संग्राम, ओवैसी से मदनी क्यों चिंतित (Photo-ITG)
मुस्लिम सियासत पर छिड़ा संग्राम, ओवैसी से मदनी क्यों चिंतित (Photo-ITG)

हैदराबाद के चार मीनार के दयार से निकलकर असदुद्दीन ओवैसी खुद को मुस्लिम चेहरे के तौर पर स्थापित करने में जुटे हैं. यह बात जमीयत उलेमा-ए-हिंद के प्रमुख मौलाना महमूद मदनी को रास नहीं आ रही है, उन्हें ओवैसी सांप्रदायिक नजर आते हैं. असम विधानसभा चुनाव में मौलाना बदरुद्दीन अजमल के लिए ओवैसी प्रचार के लिए उतरे. इससे महमूद मदनी का पारा और भी चढ़ गया. उन्होंने बदरुद्दीन अजमल को जमियत से बाहर निकालने तक का अल्टीमेटम दे दिया है.

असम विधानसभा चुनाव में ओवैसी ने अपना कोई भी प्रत्याशी नहीं उतारा है. उन्होंने बदरुद्दीन अजमल की पार्टी को समर्थन किया है. यही नहीं ओवैसी ने अजमल के समर्थन में चुनाव प्रचार करने भी उतरे और मुस्लिमों से उन्हें जिताने की अपील की.

बदरुद्दीन अजमल के समर्थन में ओवैसी का चुनाव प्रचार करना महमूद मदनी को हजम नहीं हो पा रहा है. मौलाना महमूद मदनी की तरफ से बदरुद्दीन अजमल को नोटिस भेजकर जवाब मांगा है कि आपने एक सांप्रदायिक पार्टी का समर्थन लिया है, जो जमीयत के वसूलों के खिलाफ है. नोटिस का जवाब नहीं दिया गया तो अन्यथा उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी.  

बदरुद्दीन अजमल को मौलाना मदनी का अल्टीमेटम
मौलाना बदरुद्दीन अजमल साल 2010 से जमीयत उलेमा-ए-हिंद (असम) के अध्यक्ष हैं. एआईयूडीएफ के सियासी पार्टी के गठन में जमीयत उलेमा-ए-हिंद की अहम भूमिका रही थी. मौलाना बदरुद्दीन अजमल ने अपनी इस्लामिक पढ़ाई लिखाई देवबंद मदरसे से की है, जिसके चलते मदनी परिवार के करीब आए. इसके चलते ही जमियत उलेमा-ए-हिंद के जुड़े और असम के अध्यक्ष है, जिसके महमूद मदनी राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.

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मौलाना मदनी और ओवैसी की सियासी अदावत किसी से भी छिपी नहीं है. ऐसे में बदरुद्दीन अजमल का ओवैसी से प्रचार कराना मौलाना महमूद मदनी को पसंद नहीं आया, जिसके चलते उन्होंने जमीयत के वसूलों का हवाला दे रहे हैं. ओवैसी का नाम लिए बगैर कहा कि एक सांप्रदायिक पार्टी से समर्थन लेना जमीयत के खिलाफ है. ऐसे में ओवैसी को मौलाना मदनी क्या सांप्रदायिक मानते हैं,जिसके लिए मौलाना बदरुद्दीन अजमल को अल्टीमेटक तक दे दिया है. 

ओवैसी से मदनी की सियासत अदावत क्यों है?
मुस्लिम क़यादत का मतलब मुस्लिम नेतृत्व यानी मुसलमानों का लीडर. देश में मुसलमानों की आबादी 15 फीसदी है. आज़ादी के बाद से मुस्लिमों की क़यादत कभी किसी राजनीतिक व्यक्ति के हाथों में नहीं थी बल्कि मुस्लिम संगठनों और उलेमाओं के पास रही.जमात-ए-इस्लामी हिंद, जमीयत उलेमा ए हिंद जैसे संगठनों की पकड़ रही.  न्हीं संगठनों ने मुस्लिम राजनीति की दशा और दिशा तय की है, लेकिन नरेंद्र मोदी के केंद्रीय राजनीति में आने के बाद मुस्लिम सियासत पूरी तरह से बदल गई है. 

असदुद्दीन ओवैसी ने हैदराबाद के चार मीनार के इलाके और दायरे से निकलकर देशभर के मुसलमानों की राजनीतिक क़यादत करने का नया सियासी दांव चला. ओवैसी देखते ही देखते मुस्लिमों के बीच लोकप्रिय होने लगे,पहले महाराष्ट्र और अब उत्तर भारत के इलाके में भी अपने सियासी पैर पसारने शुरू कर दिए हैं. 

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बिहार के सीमांचल में दूसरी बार 5 सीटें जीतने में कामयाब रहे हैं. अलग-अलग फिरकों में बंटे मुसलमानों की दीवार को तोड़कर अपनी जगह बना रहे हैं और मुसलमानों से जुड़े हर मुद्दे पर मुखर होकर आ रहे हैं, जैसे एक समय देश के मौलाना और उलेमा नजर आते थे. ओवैसी का तौर-तरीका पूरी तरह से मुस्लिम उलेमाओं की तरह नजर आता है. 

मुस्लिम समुदाय के बीच बढ़ते ओवैसी के सियासी ग्राफ से मौलाना महमूद मदनी चिंतित नजर आए थे. असम में बदरुद्दीन अकेले चुनाव में पड़ गए तो ओवैसी ने उन्हें जिताने के लिए पहुंच गए, जिसके चलते मौलाना मदनी परेशान और चिंतित कुछ ज्यादा ही बढ़ गई. असम में जमीयत का अपना सियासी ग्राफ है, जो अजमल ने तैयार किया है, जो ओवैसी के जाने से मदनी बंधुओं के परेशानी को बढ़ा सकता है. इसीलिए ओवैसी को कम्यूनल बताकर सारे गेम को बदलना चाहते हैं. 

ओवैसी को मौलाना मदनी सांप्रदायिक मानते हैं? 
महमूद मदनी को असदु्दीन ओवैसी कम्यूनल नजर आते हैं, जिसके लिए मौलाना बदरुद्दीन अजमल तक को नोटिस दे दिया है. यही नहीं मौलाना मदनी ने अपने एक इंटरव्यू में कहा था, 'मैं असदुद्दीन ओवैसी साहब को जहां तक जानता हूं, मैं उनकी सियासत और राजनीतिक विचारधारा से सहमत नहीं हूं, उनकी राजनीति बांटने वाली है. उससे उन्हें भी फायदा होता है. दूसरों को उससे ज़्यादा फायदा होता है, लेकिन उससे मुस्लिमों को नुकसान है.' 

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ओवैसी की रैली में जुटने वाली भीड़ पर भी मौलाना मदनी ने कहा था कि यह पागल लोगों का मजमा है. यूपी के मुसलमान ओवैसी को अपना नेता नहीं मानते हैं. उनकी राजनीति को यूपी में पनपने नहीं दूंगा. अब जब मौलाना बदरुद्दीन अजमल ने उसी असदुद्दीन ओवैसी को बुलाकर अपने समर्थन में रैली कराई तो मौलाना मदनी कैसे हजम करते, जिसके लिए उन्होंने बदरुद्दीन अजमल (AIUDF चीफ और असम जमीयत के अध्यक्ष) को नोटिस जारी किया है.

जमीयत ने AIMIM को 'सांप्रदायिक पार्टी' करार देते हुए बदरुद्दीन अजमल से स्पष्टीकरण मांगा है कि उन्होंने विधानसभा चुनाव में इस पार्टी का समर्थन क्यों लिया. जमीयत ने अपनी 1951 की नीति का हवाला दिया है,जो किसी भी सांप्रदायिक संगठन के साथ जुड़ने या समर्थन लेने के खिलाफ है. ऐसे में दिलचस्प बात यह है कि मौलाना मदनी खुद आरएलडी से राज्यसभा सदस्य रहे हैं, जो बीजेपी के साथ सरकार में, उससे पहले भी किया था. मदनी को उस समय जमीयत की वसूलों का ख्याल नहीं आया. 

मौलाना मदनी की खत्म होती सियासत से बेचैन
मुस्लिम सियासत पर नजर रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार सैय्यद कासिम कहते हैं कि मुस्लिम राजनीति अब बदल गई है और उलेमाओं और मुस्लिम संगठनों की पकड़ से बाहर निकली है और ओवैसी मुस्लिम के बीच नए चेहरे के तौर पर उभरे हैं. बिहार चुनाव के नतीजों से साफ है कि मुस्लिमों के बीच ओवैसी की पकड़ मजबूत हो रही है और उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर के बाद अपनी छवि को मुस्लिम राष्ट्रवादी नेता के तौर पर भी स्थापित किया है. 

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सैय्यद कासिम कहते हैं कि ओवैसी के बढ़ते कद के चलते ही मौलाना महमूद मदनी हों या फिर मौलाना अरशद मदनी दोनों बेचैन हैं, क्योंकि अभी तक मुस्लिम क़यादत पर इनकी मजबूत दावेदारी हुआ करती थी.अब एक नई मुस्लिम राजनीति खड़ी हो रही है, जो उनकी पकड़ से बाहर है. मोदी सरकार आने के बाद से महमूद मदनी की छवि सरकार परस्त बन गई थी. 

मुसलमानों के विरोध के बावजूद महमूद मदनी ने कहा था कि सरकार चाहे तो CAA और NRC लागू कर सकती है. इतना ही उन्होंने कहा था कि देश में NRC जरूर आनी चाहिए, जमीयत असम में काफी सालों से यह मांग कर रही थी. हम नहीं डरते, आप हमें घुसपैठिया मत बताइए. इतना ही नहीं महमूद मदनी ने नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा अनुच्छेद 370 को हटाने के कदम का भी समर्थन किया था.

सैयद कासिम भी मानते हैं कि मुसलमानों की समस्याओं पर देशभर में एक खामोशी है, जिसमें सिर्फ असदुद्दीन ओवैसी ही खुलकर बोल रहे थे. इसके चलते मुस्लिम उलेमाओं पर, खासकर जो लोग पहले मुस्लिम मुद्दे पर आक्रामक रहा करते थे, यही बात मदनी बंधुओं को पसंद नहीं आ रही. बदरुद्दीन अजमल के लिए चुनाव में गए तो उससे उनकी घबराहट और भी बढ़ गई. इसीलिए अल्टीमेटम तक देने लगे. 

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