scorecardresearch
 

ओवैसी का डर या मायावती का प्रेशर? यादव को हटाकर मुस्लिम पर अखिलेश ने क्यों जताया भरोसा

विधान परिषद में लाल बिहारी यादव की जगह मोहम्मद जासमीर अंसारी को नेता प्रतिपक्ष बनाकर अखिलेश यादव ने बड़ा राजनीतिक दांव चला है. ओवैसी और मायावती की घेराबंदी के बीच सपा प्रमुख ने इस कदम के जरिए अपने कोर मुस्लिम वोटबैंक और पंसमादा समाज को साधने का सीधा संदेश दिया है.

Advertisement
X
अखिलेश यादव ने जासमीर अंसारी पर खेला दांव (Photo-ITG)
अखिलेश यादव ने जासमीर अंसारी पर खेला दांव (Photo-ITG)

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले तमाम राजनीतिक दलों ने अपने समीकरणों को साधना शुरू कर दिया है. सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव के जमाने से M-Y यानी मुस्लिम-यादव समीकरण को साधकर चुनावी मैदान में बेहतर प्रदर्शन करती रही है. लोकसभा चुनाव 2024 में पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक यानी पीडीए पॉलिटिक्स हिट रही, लेकिन उससे मुस्लिम-यादव समीकरण पर असर पड़ा.

अखिलेश यादव के पीडीए फॉर्मूले से सपा के कोर वोटबैंक माने जाने वाले यादव-मुस्लिम समुदाय को उस स्तर का प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाया, जो सपा में पहले मिलता रहा था. ऐसे में 2027 के विधानसभा चुनाव में पार्टी से दोनों समाजों को उम्मीदें कुछ ज्यादा हैं. इसी को देखते हुए अखिलेश यादव ने यूपी की विधान परिषद में लाल बिहारी यादव को हटाकर मोहम्मद जासमीर अंसारी को नेता प्रतिपक्ष बनाने का निर्णय लिया.

विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष के तौर पर जासमीर अंसारी की भूमिका महत्वपूर्ण होगी. सदन में वे विपक्ष की आवाज को उठाने के साथ-साथ सरकार को घेरने का काम करेंगे. ऐसे में सवाल उठने लगा है कि चुनावी तपिश के बीच अखिलेश यादव ने यह बदलाव क्यों किया और क्या यह मुस्लिम वोटों को साधने का नया दांव है?

Advertisement

ओवैसी का डर या मायावती का प्रेशर?

अखिलेश यादव ने लाल बिहारी यादव को हटाकर जासमीर अंसारी को विधान परिषद का नेता प्रतिपक्ष ऐसे समय में बनाया है, जब 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी तपिश गर्म है. AIMIM अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी से लेकर बसपा प्रमुख मायावती तक की नजर मुस्लिम वोटबैंक पर है, जिसके लिए वे सपा को मुस्लिम-विरोधी कटघरे में खड़ा करने की कवायद कर रहे हैं. आजाद समाज पार्टी प्रमुख चंद्रशेखर आजाद और कांग्रेस की नजर भी मुस्लिम वोटबैंक पर टिकी हुई है.

ओवैसी अखिलेश यादव पर मुस्लिम नेताओं की राजनीति खत्म करने का आरोप लगा चुके हैं, तो मायावती ने हाल ही में सपा की पीडीए रथयात्रा के रंग को लेकर मुसलमानों को सियासी संदेश दिया था. मुस्लिम वोटों को लेकर जिस तरह से सपा को निशाने पर लिया जा रहा है, उसे देखते हुए अखिलेश यादव पर प्रेशर बन गया था. इन सबके बीच अखिलेश यादव ने जासमीर अंसारी को उत्तर प्रदेश विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष बनाकर एक बड़ा दांव चला है.

समझें अखिलेश यादव का प्लान क्या है?

मोहम्मद जासमीर अंसारी के जरिए अखिलेश यादव ने मुस्लिम समाज को सीधे अपने पाले में लाने की कोशिश की है. मुसलमानों को वे सीधा संदेश देने का प्रयास कर रहे हैं कि उनके एजेंडे से यह वर्ग कभी बाहर नहीं रहा है. सपा में अभी भी मुसलमानों की अहमियत पहले की तरह ही है.

Advertisement

हालांकि, विपक्षी दलों की ओर से मुस्लिम वोटबैंक को अपने पाले में लाने की कोशिश और समाजवादी पार्टी से मुसलमानों की नाराजगी का मुद्दा लगातार गरमाया जा रहा है. हाल के समय में अखिलेश यादव सॉफ्ट हिंदुत्व के जरिए बीजेपी के वोटों में सेंधमारी की रणनीति पर काम करते दिखे हैं. इसको भी अन्य दल मुद्दा बनाकर मुसलमानों के बीच पैठ बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं.

सीतापुर की लहरपुर विधानसभा सीट से दो बार विधायक रह चुके जासमीर अंसारी को विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष बनाया गया है. अखिलेश ने विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष लाल बिहारी यादव को हटाकर जासमीर अंसारी को यह पद देने का निर्णय लिया है. इस संबंध में अखिलेश ने विधान परिषद के सभापति को पत्र भी भेज दिया है. अखिलेश का प्लान इस रणनीति के जरिए अपनी पीडीए पॉलिटिक्स में मुस्लिम वोटबैंक को मजबूत बनाने का है.

कौन हैं मोहम्मद जासमीर अंसारी?

जासमीर अंसारी यूपी की राजनीति में एक जाना-पहचाना नाम हैं, जो अभी तक विधान परिषद में उपनेता प्रतिपक्ष की भूमिका निभा रहे थे. जासमीर अंसारी की पत्नी कैसर जहां सीतापुर से सांसद रह चुकी हैं. सीतापुर, हरदोई और लखीमपुर खीरी के क्षेत्र में उनकी मुस्लिम समुदाय के बीच अच्छी-खासी पकड़ मानी जाती है.

Advertisement

मोहम्मद जासमीर अंसारी सीतापुर के रहने वाले हैं. जासमीर 2007 और 2012 के विधानसभा चुनाव में सीतापुर की लहरपुर विधानसभा सीट से विधायक रह चुके हैं. उनकी पत्नी कैसर जहां 2009 के लोकसभा चुनाव में बसपा के टिकट पर सीतापुर सीट से सांसद चुनी गई थीं. बाद में उन्होंने वर्ष 2018 में बसपा छोड़कर कांग्रेस पार्टी का दामन थाम लिया.

जासमीर अंसारी बहुजन समाज पार्टी से कांग्रेस होते हुए समाजवादी पार्टी में पहुंचे हैं. अब उन्हें बड़ा पद देकर मुस्लिम वोटबैंक को साधने की कोशिश की जा रही है. यूपी चुनाव से पहले इसे बड़े राजनीतिक घटनाक्रम के तौर पर देखा जा रहा है. जासमीर अंसारी को आजम खान का करीबी भी माना जाता है, सीतापुर जेल में जब आजम खान बंद थे तो उनकी देख-रेख का जिम्मा उन्हीं पर था.

अखिलेश को क्यों लेना पड़ा फैसला?

उत्तर प्रदेश के राजनीतिक मैदान में मुसलमानों की समाजवादी पार्टी से नाराजगी का मुद्दा खासा गरमाया हुआ है. कई मुस्लिम नेताओं की ओर से समाजवादी पार्टी के खिलाफ बयान सामने आए हैं. मुसलमानों को 'बंधुआ मजदूर' समझने वाले बयान प्रदेश के राजनीतिक मैदान में खूब गूंज रहे हैं.

सपा पर आरोप लग रहा है कि बीजेपी की सरकार में मुसलमानों को लेकर उठाए गए किसी भी कदम का उन्होंने मजबूती से विरोध नहीं किया. चाहे लाउडस्पीकर एक्शन हो, हाफ एनकाउंटर हो या बुलडोजर एक्शन, इन मुद्दों पर अखिलेश यादव कभी भी मुखर होकर विरोध करते नजर नहीं आए. राम मंदिर के फैसले से लेकर आजम खान और अन्य मुस्लिम नेताओं पर एक्शन तक के मुद्दों पर उनकी खामोशी को अब राजनीतिक मैदान में जोरदार तरीके से उठाया जा रहा है.

Advertisement

यूपी में मुस्लिम समाज को उचित प्रतिनिधित्व न दिए जाने का मुद्दा भी खूब गरमा रहा है. बहुजन समाज पार्टी और अन्य पार्टियां पहले ही मुसलमानों को बड़ी संख्या में टिकट देकर चुनावी मैदान में उतारने का संदेश दे चुकी हैं. ऐसे में अखिलेश यादव अब एक अलग रणनीति के साथ चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी में हैं. इस कड़ी में जासमीर अंसारी की भूमिका को अहम माना जा रहा है और उनके जरिए समाज को संदेश देने का प्रयास हो रहा है. अखिलेश ने मुस्लिमों के साथ-साथ पसमांदा मुस्लिम समुदाय को भी साधने का दांव चला है.

---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Latest News in Hindi »
Advertisement