आजतक के सुरक्षा सभा कार्यक्रम में ‘नारी तुम शक्ति हो’ सेशन में वाइस एडमिरल (सेवानिवृत्त) और पूर्व डीजी, आर्म्ड फोर्सेज मेडिकल सर्विस आरती सरीन ने सशस्त्र बलों में महिलाओं की बढ़ती भूमिका और बदलते अवसरों पर विस्तार से बात की. उन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों को याद करते हुए बताया कि उस दौर में सेना में महिलाओं की संख्या बेहद कम थी, लेकिन समय के साथ नीतियों, इंफ्रास्ट्रक्चर और अवसरों में बदलाव ने महिलाओं के लिए नए रास्ते खोले.
आरती सरीन ने बताया कि जब उन्होंने करियर की शुरुआत की थी, तब हालात आज से बिल्कुल अलग थे, उस समय सेना में महिलाओं की संख्या काफी कम थी. धीरे-धीरे महिला अधिकारियों की कमीशनिंग शुरू हुई और इसके बाद उनकी संख्या में लगातार बढ़ोतरी हुई. 1993 में नॉन-मेडिकल महिला अधिकारियों को भी कमीशन किया गया, जिससे सशस्त्र बलों में महिलाओं की भागीदारी का दायरा और बढ़ा.
सशस्त्र बलों में महिलाओं को मिलने वाली पोस्टिंग और सुविधाओं में बदलाव के सवाल पर आरती सरीन ने अपने शुरुआती दिनों का अनुभव साझा किया, उन्होंने बताया कि उनकी पहली पोस्टिंग पोर्ट ब्लेयर में हुई थी. उन्होंने कहा कि उस समय महिलाओं को भी रिमोट एरिया में पोस्टिंग मिलती थी, वहीं, उनके साथ सर्विस में आए पुरुष अधिकारियों में से कई फील्ड एरिया में तैनात किए गए. इसके बाद करीब दो साल बाद उन्हें पोस्ट ग्रेजुएशन का अवसर मिला.
आरती सरीन के मुताबिक, जैसे-जैसे महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ा और नीतियों में बदलाव आया, वैसे-वैसे उनके लिए अवसर भी बढ़ते गए, आज महिला अधिकारी हर तरह की ड्यूटी को पूरी क्षमता के साथ निभा रही हैं. उन्होंने कहा कि महिलाओं को अवसर के साथ-साथ जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर और सुविधाएं भी दी जा रही हैं. इसी वजह से वे यह साबित कर रही हैं कि अगर कोई अपने प्रोफेशन में अच्छा है, तो वह कहीं भी अपनी जिम्मेदारी निभा सकता है.
‘मुझे नहीं लगा था कि मैं इस मुकाम तक पहुंचूंगी’
यह पूछे जाने पर कि क्या करियर की शुरुआत में उन्हें कभी लगा था कि वह सशस्त्र बल चिकित्सा सेवा की शीर्ष जिम्मेदारी तक पहुंचेंगी, आरती सरीन ने कहा कि उन्होंने ऐसा कभी नहीं सोचा था, उन्होंने बताया कि शुरुआत में उनका सिर्फ एक लक्ष्य था एक अच्छा डॉक्टर बनना और यूनिफॉर्म पहनना. आर्मी फैमिली से आने की वजह से उनके मन में शुरू से ही सशस्त्र बलों में जाने की इच्छा थी. उनके लिए यूनिफॉर्म पहनना अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि थी, उन्होंने कहा कि उन्हें दुनिया की सबसे सम्मानित यूनिफॉर्म्स में से दो पहनने का अवसर मिला और यही उनके करियर की शुरुआती प्रेरणा थी.
आरती सरीन ने बताया कि सशस्त्र बल चिकित्सा सेवा में करियर सिर्फ मेडिकल ट्रेनिंग तक सीमित नहीं रहता. एक अधिकारी को अलग-अलग स्तरों पर लगातार प्रशिक्षित किया जाता है और समय के साथ उसमें नेतृत्व और प्रशासनिक क्षमताएं भी विकसित होती हैं. उन्होंने बताया कि शुरुआत में उनका फोकस एक अच्छा डॉक्टर बनने, मरीजों की बेहतर देखभाल करने, पोस्ट ग्रेजुएशन और फिर सुपर स्पेशलाइजेशन हासिल करने पर था, इसके बाद आर्म्ड फोर्सेज मेडिकल कोर के सिस्टम में हर स्तर पर ट्रेनिंग मिलती रही.
धीरे-धीरे अधिकारियों को नेतृत्व की जिम्मेदारियां मिलती हैं और उनकी एडमिनिस्ट्रेटिव क्षमताएं भी विकसित होती हैं. अगर कोई अधिकारी लगातार अच्छा प्रदर्शन करता है, क्षमता दिखाता है और प्रोफेशनल एक्सीलेंस बनाए रखता है, तो वह धीरे-धीरे आगे बढ़ता जाता है. आरती सरीन ने कहा कि आज सशस्त्र बलों में महिलाओं ने कई महत्वपूर्ण नेतृत्व पद हासिल किए हैं. यह बदलाव सिर्फ महिलाओं की संख्या बढ़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इस बात का संकेत है कि उन्हें नेतृत्व और जिम्मेदारी निभाने के समान अवसर भी मिल रहे हैं.
सत्र के दौरान जब उनसे पूछा गया कि क्या करियर के अंत में किसी ऊंची रैंक तक पहुंचना उन्हें खास महसूस कराता है, तो बातचीत सैनिकों के जज्बे और सैन्य डॉक्टरों की भूमिका की ओर मुड़ गई. आरती सरीन ने कहा कि किसी रैंक को सिर्फ एक डेजिग्नेशन के तौर पर देखना पर्याप्त नहीं है. उस रैंक तक पहुंचने के पीछे एक लंबा सफर होता है. इस सफर में ऐसे तमाम अनुभव आते हैं, जो व्यक्ति को भीतर से बदलते और मजबूत करते हैं.
उन्होंने कहा कि सैन्य डॉक्टरों को ऑपरेशंस के दौरान घायल सैनिकों को करीब से देखने का अवसर मिलता है. कई बार सैनिक गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद जिस हौसले और सकारात्मक सोच के साथ परिस्थितियों का सामना करते हैं, वह डॉक्टरों के लिए भी प्रेरणा बन जाता है.
‘गोलियां लगीं, पैर एम्प्यूट हुआ, फिर भी कहते हैं- मैं ठीक हूं’
आरती सरीन ने सैनिकों की जुझारू भावना का जिक्र करते हुए कहा कि भारतीय सशस्त्र बलों में काम करने वाले सैनिकों को ऐसी ट्रेनिंग दी जाती है, जो उनमें देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने का जज्बा पैदा करती है. उन्होंने कहा कि यही भावना सैन्य डॉक्टरों को भी अपना काम पूरी क्षमता से करने के लिए प्रेरित करती है. डॉक्टर जानते हैं कि सैनिक उनके भरोसे हैं और उन्हें हर संभव तरीके से बचाने के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ देना है. यानी जो लोग देश की रक्षा करते हैं, सैन्य डॉक्टर उनके प्रोटेक्टर होते हैं. उनके मुताबिक, ऑपरेशंस के दौरान ऐसे कई उदाहरण देखने को मिलते हैं, जहां सैनिक गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद बेहद सकारात्मक बने रहते हैं.
उन्होंने कहा कि भारतीय सेना का काम सिर्फ युद्ध के मैदान तक सीमित नहीं है. लगातार अलग-अलग तरह के कॉन्फ्लिक्ट और एंटी-टेरर ऑपरेशंस भी होते रहते हैं. ऐसे ऑपरेशंस में सामने आने वाली हर कहानी अपने आप में प्रेरणा देने वाली होती है. उन्होंने कहा कि कई ऐसे इंसिडेंट्स हैं जिन्हें वह सार्वजनिक रूप से साझा नहीं कर सकतीं, लेकिन इन अनुभवों ने उन्हें व्यक्तिगत और पेशेवर तौर पर बहुत प्रभावित किया है.
आरती सरीन के मुताबिक, सैन्य चिकित्सा सेवा की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक मोटिवेशन है. उन्होंने कहा कि डॉक्टर तो सभी बहुत मोटिवेटेड होते हैं, लेकिन आर्मी डॉक्टरों को एक अतिरिक्त जिम्मेदारी और उद्देश्य के साथ प्रशिक्षित किया जाता है, उनके लिए मरीज का इलाज करना सिर्फ मेडिकल ड्यूटी नहीं, बल्कि उस व्यक्ति की रक्षा करना भी है जो देश की रक्षा कर रहा है, उन्होंने कहा कि यही भावना सैन्य डॉक्टरों को कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी काम करने का हौसला देती है. सैनिकों का जज्बा उन्हें प्रेरणा देता है और सैन्य डॉक्टर उसी जज्बे के साथ अपने मरीजों के लिए खड़े रहते हैं.
आरती सरीन ने कहा कि यदि कोई महिला किसी भूमिका के लिए शारीरिक और पेशेवर रूप से फिट है और उसे उस जिम्मेदारी के लिए प्रशिक्षित किया गया है, तो भविष्य में उसके लिए अवसरों की कोई कमी नहीं होगी. उन्होंने यह भी कहा कि आर्म्ड फोर्सेज में काम करने वाले नॉन-मेडिकल कमांडर्स ने भी मेडिकल टीमों को हमेशा पूरा सहयोग दिया और जरूरी उपकरण व संसाधन उपलब्ध कराए, इसलिए यह पूरी तरह एक टीम एफर्ट है.
अपनी ट्रेनिंग के बारे में उन्होंने बताया कि मेडिकल अधिकारियों की भी नियमित फिजिकल ट्रेनिंग होती है. आर्म्ड फोर्सेज मेडिकल कॉलेज में सप्ताह में तीन बार फिजिकल ट्रेनिंग होती थी और मेडिकल अधिकारियों को एनसीसी ट्रेनिंग भी दी जाती है. बाद में एएमसी सेंटर एंड कॉलेज, लखनऊ में भी उन्हें ऐसी ट्रेनिंग दी जाती है, जिससे वे आर्मी, नेवी और एयर फोर्स की यूनिट्स में काम करने और सैन्य वातावरण को समझने के लिए तैयार हो सकें.
महिलाओं के कॉम्बैट रोल पर उन्होंने कहा कि एयर फोर्स और नेवी में यह बदलाव धीरे-धीरे दिखाई दे रहा है और आर्मी में भी आर्टिलरी जैसे क्षेत्रों में महिलाओं की तैनाती शुरू हो चुकी है. उनके मुताबिक, यह बदलाव समय के साथ और आगे बढ़ेगा. उन्होंने कहा कि यदि कोई अधिकारी शारीरिक और पेशेवर रूप से उस भूमिका के लिए सक्षम है और उसे उसके लिए उचित ट्रेनिंग मिली है, तो उसे वह जिम्मेदारी निभाने का अवसर मिलना चाहिए.
उन्होंने कहा कि सार्वजनिक मंचों पर महिला अधिकारियों की मौजूदगी जरूरी है, क्योंकि इससे देश के गांव-गांव तक यह संदेश जाता है कि महिलाओं के लिए सशस्त्र बलों में आगे बढ़ने और नेतृत्व करने के अवसर मौजूद हैं। उनके मुताबिक, सोशल मीडिया और सार्वजनिक कार्यक्रमों के जरिए जब लोग महिला अधिकारियों को इन भूमिकाओं में देखते हैं, तो उन्हें भी पता चलता है कि सेना में महिलाओं के लिए कितने नए रास्ते खुले हैं.
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