ईरान और अमेरिका के बीच तनाव पिछले कई महीनों से चला आ रहा है. 2025 के जून में हुए 12 दिन की जंग से लेकर 2026 में जारी झड़पों तक ईरान ने मिसाइल और ड्रोन हमलों के जरिए जवाब दिया है. अमेरिका और इजरायल ने ईरान की कई सैन्य सुविधाओं पर भारी हमले किए, फिर भी ईरान पीछे हटने को तैयार नहीं है.
राष्ट्रपति ट्रंप ने दावा किया था कि ईरान की 90 प्रतिशत मिसाइल और ड्रोन फैसिलिटीज बर्बाद हो चुकी हैं, लेकिन हकीकत कुछ और ही है. ईरान के पास पहले से बड़ा स्टॉक था. अंडरग्राउंड ठिकाने मजबूत हैं. रूस-चीन जैसी ताकतों की मदद से वह लगातार हथियार बना रहा है.
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2025 में अमेरिका ने ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमले किए थे, जिसे 12 दिन की जंग कहा गया. इसके बाद 2026 में फिर तनाव बढ़ा और दोनों तरफ मिसाइल-ड्रोन हमले हुए. ईरान ने खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी ठिकानों, कुवैत, बहरीन और जॉर्डन जैसे देशों में मौजूद बेस पर हमले किए. अमेरिका की तरफ से हजारों टारगेट पर स्ट्राइक्स हुए, जिसमें ईरान की मिसाइल स्टोरेज, लॉन्चर और प्रोडक्शन साइट्स शामिल थीं.
ट्रंप प्रशासन ने इसे बड़ी सफलता बताया और दावा किया कि ईरान की मिसाइल क्षमता लगभग खत्म हो गई है. लेकिन अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट्स और स्वतंत्र विश्लेषण बताते हैं कि वास्तविक नुकसान 90 प्रतिशत नहीं, बल्कि आधे के करीब है. कई लॉन्चर बरकरार हैं. हजारों ड्रोन स्टॉक में हैं. ईरान हमले जारी रखने में सक्षम है.
ट्रंप के दावों और हकीकत में अंतर
ट्रंप ने कहा था कि ईरान की मिसाइल और ड्रोन फैसिलिटीज का 90 प्रतिशत हिस्सा नष्ट हो चुका है. अमेरिकी अधिकारियों ने भी औद्योगिक बेस का 86 प्रतिशत हिस्सा क्षतिग्रस्त होने का दावा किया. लेकिन यूएस इंटेलिजेंस असेसमेंट के अनुसार केवल एक-तिहाई से आधे लॉन्चर और मिसाइलें प्रभावित हुई हैं.
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कई अंडरग्राउंड मिसाइल सिटी पूरी तरह नष्ट नहीं हो सकीं क्योंकि वे पहाड़ों के अंदर बनी हैं और बहुत गहरी हैं. हमलों के बाद ईरान ने कुछ एंट्रेंस दोबारा खोलकर साइट्स को फिर से इस्तेमाल योग्य बनाया. ड्रोन उत्पादन आसान और सस्ता होने के कारण पूरी तरह रोकना मुश्किल रहा. इससे साफ है कि ट्रंप के दावे युद्ध के दौरान मनोबल बढ़ाने और दुश्मन को कमजोर दिखाने के लिए मजबूत थे, लेकिन जमीनी हकीकत थोड़ी अलग है.

ईरान के पास मिसाइल-ड्रोन स्टॉक क्यों खत्म नहीं हुआ?
ईरान के पास युद्ध शुरू होने से पहले ही मध्य पूर्व का सबसे बड़ा बैलिस्टिक मिसाइल स्टॉक था. 3000 से ज्यादा मिसाइलें थीं. इनमें शॉर्ट रेंज से लेकर मीडियम रेंज तक की मिसाइलें शामिल थीं. ईरान ने इन्हें जानबूझकर फैलाकर रखा था. ज्यादातर अंडरग्राउंड बेस में छिपाया था. ये मिसाइल सिटी नाम की सुरंगें पहाड़ों के अंदर बनी हैं, जो हवाई हमलों से बच सकती हैं.
अमेरिका-इजरायल के हमलों में ऊपरी हिस्से और एंट्रेंस क्षतिग्रस्त हुए, लेकिन अंदर रखी मिसाइलें कई बार सुरक्षित रहीं. इसके अलावा ड्रोन जैसे शाहेद-136 सस्ते और छोटे होते हैं, इन्हें पिकअप ट्रक से भी लॉन्च किया जा सकता है. इसलिए स्टॉक जल्दी खत्म होने वाला नहीं था. ईरान ने सैकड़ों हमले किए, फिर भी उसके पास अभी भी हजारों ड्रोन बचे हुए हैं.
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उत्पादन क्षमता पर असर और सीजफायर के दौरान क्या हुआ?
अमेरिकी हमलों में खोजिर, पारचिन, शाहरूद और इस्फहान जैसी प्रोडक्शन साइट्स को निशाना बनाया गया. ऊपरी इमारतें क्षतिग्रस्त हुईं, लेकिन ईरान ने जल्दी मरम्मत शुरू कर दी. ड्रोन उत्पादन तो और भी आसान है क्योंकि इसे छोटी-छोटी वर्कशॉप और सिविलियन फैक्टरियों में भी किया जा सकता है.

सीजफायर या युद्ध विराम के दौरान ईरान ने रिकंस्टीट्यूशन यानी दोबारा बनाने की कोशिशें तेज कर दीं. उत्पादन क्षमता पहले से ज्यादा नहीं बढ़ी, लेकिन आयात और घरेलू प्रयासों से पहले के स्तर पर बनी रही. चीन से रासायनिक सामग्री आने से ठोस ईंधन वाली मिसाइलें बनाने में मदद मिली.
ईरान में मिसाइल और ड्रोन उत्पादन की मुख्य सुविधाएं
ईरान की मिसाइल प्रोग्राम फैली हुई और छिपी हुई है. सबसे बड़ी असेंबली और प्रोडक्शन कॉम्प्लेक्स इस्फहान क्षेत्र में है, जहां खोमेनेईशहर ड्रोन प्लांट भी है. यहां शाहेद जैसे ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइलों के पार्ट्स बनते हैं. खोजिर तेहरान के पास ठोस प्रोपेलेंट ईंधन और मोटर बनाने का प्रमुख केंद्र है. पारचिन में ईंधन, मिसाइल प्रोडक्शन और रिसर्च-डेवलपमेंट होता है. शाहरूद टेस्टिंग और प्रोडक्शन के लिए जाना जाता है.
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अन्य महत्वपूर्ण जगहें: तबरेज, खोर्रमाबाद का बड़ा अंडरग्राउंड बेस, केरमानशाह के आसपास कई साइट्स, कुम, बंदर अब्बास और लोरेस्तान, इस्फहान प्रांतों में पहाड़ी मिसाइल सिटी. ये सुविधाएं इधर-उधर हैं ताकि एक हमले में सब नष्ट न हों. कई जगहों पर सुरंगें सैकड़ों मीटर गहरी हैं, जहां मिसाइलें छिपाई जा सकती हैं.

रूस और चीन ईरान की मदद कैसे कर रहे हैं?
रूस और चीन ईरान को खुलकर मदद दे रहे हैं, हालांकि सीधे युद्ध में शामिल नहीं. चीन मुख्य रूप से डुअल-यूज केमिकल्स जैसे सोडियम परक्लोरेट (सॉलिड रॉकेट फ्यूल के लिए) की हजारों टन खेप भेजता है. इसके अलावा ड्रोन पार्ट्स, इंजन, बैटरी और इलेक्ट्रॉनिक्स भी सप्लाई करता है. इससे ईरान प्रतिबंधों के बावजूद उत्पादन जारी रख पाता है.
रूस ड्रोन टेक्नोलॉजी शेयरिंग, संभवतः इंटेलिजेंस और लॉजिस्टिक्स सपोर्ट देता है. शाहेद ड्रोन की टेक्नोलॉजी दोनों देशों के बीच आदान-प्रदान हुआ है. नॉर्थ कोरिया भी कुछ क्षेत्रों में सहायता देता है. इस सपोर्ट की वजह से ईरान वेस्टर्न सैंक्शंस को बायपास कर अपनी क्षमता बनाए रख पा रहा है.
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ईरान की रणनीति और भविष्य की चुनौतियां
ईरान की रक्षा नीति एसिमेट्रिक वॉरफेयर पर आधारित है. यानी महंगे हथियारों से सस्ते ड्रोन-मिसाइलों से लड़ना. एक ड्रोन बनाना सस्ता पड़ता है लेकिन उसे रोकने के लिए दुश्मन को बहुत महंगा खर्च करना पड़ता है. ईरान ने अपने प्रॉक्सी ग्रुप्स (हूती, हिज्बुल्लाह आदि) को भी हथियार दिए, जिससे क्षेत्रीय दबाव बढ़ता है. हालांकि लगातार हमलों से उसकी क्षमता घटी है, लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं हुई.

भविष्य में अगर युद्ध लंबा चला तो उत्पादन बनाए रखना चुनौतीपूर्ण होगा, लेकिन चीन-रूस की मदद जारी रही तो ईरान टिक सकता है. अमेरिका-इजरायल को अब गहरी खुफिया जानकारी और बार-बार स्ट्राइक्स की जरूरत है. इस संघर्ष से साफ है कि आधुनिक युद्ध में सिर्फ हवाई हमले काफी नहीं, दुश्मन की अर्थव्यवस्था, सप्लाई चेन और सहयोगियों को भी निशाना बनाना पड़ता है.
लंबी लड़ाई की तैयारी
ईरान ने दिखा दिया है कि वह आसानी से हार मानने वाला नहीं. बड़े स्टॉक, मजबूत अंडरग्राउंड बुनियादी ढांचा, फैला हुआ उत्पादन और रूस-चीन की सामग्री मदद ने उसे लड़ाई जारी रखने की ताकत दी. ट्रंप के दावों के बावजूद युद्ध अभी खत्म होने वाला नहीं दिख रहा. दोनों पक्षों को अब कूटनीति और सैन्य दबाव का संतुलन बनाना होगा. आम नागरिकों पर इसका असर सबसे ज्यादा पड़ रहा है. क्षेत्रीय स्थिरता के लिए शांतिपूर्ण समाधान की जरूरत है, लेकिन फिलहाल तनाव बरकरार है.