ग्रीनलैंड, जो दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है, लेकिन आबादी सिर्फ 56 हजार के आसपास. यह डेनमार्क का हिस्सा है, लेकिन अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इसे खरीदने या कब्जा करने की बात करते रहे हैं. सवाल उठता है- ग्रीनलैंड में कितनी सेना तैनात है? ट्रंप की धमकी से क्या अमेरिका-डेनमार्क में टकराव हो सकता है?
ग्रीनलैंड में सेना की स्थिति
ग्रीनलैंड की रक्षा की जिम्मेदारी डेनमार्क की है. यहां कोई बड़ा सैन्य बल नहीं है, क्योंकि यह शांतिपूर्ण इलाका है. लेकिन कुछ महत्वपूर्ण ठिकाने हैं...
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डेनमार्क की जॉइंट आर्कटिक कमांड: इसमें करीब 300 जवान तैनात हैं. यह कमांड आर्कटिक क्षेत्र की निगरानी और बचाव कार्य करती है.
अमेरिका का पिटुफिक स्पेस बेस (थुले एयर बेस): ग्रीनलैंड के उत्तर-पश्चिम में स्थित यह बेस अमेरिका चलाता है. यहां लगभग 650 अमेरिकी सैनिक और स्टाफ तैनात हैं. यह बेस मिसाइल चेतावनी सिस्टम और स्पेस मॉनिटरिंग के लिए इस्तेमाल होता है.
कुल मिलाकर, ग्रीनलैंड में कोई बड़ी सेना नहीं है. यहां का फोकस सैन्य हमले से ज्यादा पर्यावरण और निगरानी पर है. लेकिन आर्कटिक में बर्फ पिघलने से यहां की रणनीतिक महत्व बढ़ गया है.
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ट्रंप की धमकी का बैकग्राउंड
2019 में ट्रंप ने पहली बार ग्रीनलैंड खरीदने का प्रस्ताव दिया था. उन्होंने कहा कि यह अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी है. डेनमार्क की सरकार ने इसे 'बकवास' बताकर ठुकरा दिया. ट्रंप ने नाराज होकर डेनमार्क की यात्रा रद्द कर दी. अब 2026 में ट्रंप फिर से इस मुद्दे को उठा रहे हैं. व्हाइट हाउस ने कहा है कि ग्रीनलैंड हासिल करने के लिए 'सभी विकल्प' खुले हैं, जिसमें मिलिट्री ऑप्शन भी शामिल है.

डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेट्टे फ्रेडरिक्सन ने इसे NATO गठबंधन के लिए खतरा बताया है. उन्होंने कहा कि अगर अमेरिका ग्रीनलैंड पर कब्जा करता है, तो NATO का अंत हो सकता है. यूरोपीय यूनियन और NATO ने भी अमेरिका की इस बात का विरोध किया है. लेकिन अभी तक कोई सैन्य टकराव नहीं हुआ है.
ग्रीनलैंड क्यों इतना महत्वपूर्ण?
ट्रंप का कहना है कि ग्रीनलैंड अमेरिका की सुरक्षा के लिए जरूरी है. क्यों? आइए समझें...
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रूस से खतरा: रूस का कोला पेनिनसुला (फिनलैंड के पास) उसका मुख्य सैन्य ठिकाना है. यहां से अमेरिका पर मिसाइल हमले का रास्ता ग्रीनलैंड के ऊपर से गुजरता है. ग्रीनलैंड से मिसाइलों को बीच में रोकना आसान होता है, खासकर उनके उच्चतम बिंदु (एपोजी) पर.
आर्कटिक रूट: जलवायु परिवर्तन से आर्कटिक में बर्फ पिघल रही है. नॉर्दर्न पैसेज खुल रहा है, जो चीन से यूरोप तक का छोटा रास्ता है. चीनी जहाज और पनडुब्बियां यहां से गुजर सकती हैं, जो अमेरिका के लिए खतरा है. ग्रीनलैंड का उत्तर-पूर्वी तट इस रास्ते को नियंत्रित करने में मदद करता है.
मानचित्र की गलतफहमी: आम मैप (मर्केटर प्रोजेक्शन) ग्रीनलैंड को बहुत बड़ा दिखाते हैं, लेकिन असल में यह रणनीतिक जगह पर है. ट्रंप का कहना है कि बिना ग्रीनलैंड के अमेरिका की सुरक्षा अधर में है.
विशेषज्ञ कहते हैं कि ट्रंप की रुचि सिर्फ सुरक्षा नहीं, बल्कि आर्कटिक के संसाधनों (खनिज, तेल) में भी हो सकती है. लेकिन डेनमार्क इसे बेचने को तैयार नहीं.

क्या अमेरिका-डेनमार्क में टकराव हो सकता है?
संभावना कम है. दोनों देश NATO के सदस्य हैं, जो एक-दूसरे पर हमला करने से रोकता है. ट्रंप की बातें सिर्फ दबाव बनाने की कोशिश लगती हैं. 2019 के बाद कोई बड़ा विवाद नहीं हुआ. 2026 में भी बातचीत जारी है. डेनमार्क कह रहा है कि ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है. अमेरिका को सम्मान करना चाहिए. अगर मिलिट्री ऑप्शन इस्तेमाल हुआ, तो NATO टूट सकता है, जो ट्रंप को भी पसंद नहीं आएगा.
हालांकि, आर्कटिक में रूस और चीन की बढ़ती गतिविधियां टेंशन पैदा कर रही हैं. यूरोप को यहां अपनी सेना बढ़ानी पड़ सकती है. ग्रीनलैंड के लोग खुद को डेनिश मानते हैं और स्वतंत्रता की बात करते हैं, लेकिन अमेरिका से जुड़ना नहीं चाहते.
ग्रीनलैंड बड़ा रणनीतिक महत्व रखता है. ट्रंप की धमकी से डेनमार्क नाराज है, लेकिन टकराव की बजाय बातचीत का रास्ता खुलेगा. अमेरिका पहले से ही यहां बेस चला रहा है, तो कब्जे की जरूरत क्यों? यह सवाल बना हुआ है.