भारत, चीन और रूस के बीच आर्थिक तौर पर एकजुट हो जाएं, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था का संतुलन रातो-रात बदल सकता है. ब्रिक्स (BRICS) एक ऐसा मंच है, जिसके जरिये इन तीन देशों के रिश्तों में मजबूती आ सकती है. अगर ये तीन महाशक्तियां पूरी तरह से एकजुट होती हैं, तो यह अमेरिकी वर्चस्व और डॉलर के लिए सबसे बड़ी चुनौती साबित होगा.
दरअसल, मौजूदा दौर में भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है, जबकि चीन ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग का हब बन चुका है, वहीं रूस ऊर्जा और प्राकृतिक संसाधनों का केंद्र है. इन तीनों देश मिलकर वैश्विक जीडीपी का 30% से अधिक और दुनिया की आबादी का लगभग 40% हिस्सा संभालते हैं.
अगर तीनों देश एकजुट हो जाते हैं, तो अमेरिकी डॉलर के विकल्प को तलाशना थोड़ा आसान हो जाएगा, इससे स्थानीय मुद्राओं या ब्रिक्स करेंसी में व्यापार को धीरे-धीरे करके बढ़ाया जा सकता है. फिर अमेरिकी मौद्रिक नीति का प्रभाव कमजोर पड़ जाएगा, और अमेरिका और पश्चिमी देशों का आर्थिक प्रतिबंध लगाने वाला हथियार निष्प्रभावी हो जाएगा.
क्या BRICS के जरिये पूरी तरह एकसाथ आना संभव है?
सिद्धांत रूप में यह जितना शक्तिशाली दिखता है, व्यावहारिक रूप से पूर्ण आर्थिक-राजनीतिक एकत्रीकरण बेहद कठिन और सीमित है. खासकर भारत के सामने कई चुनौतियां हैं.
भारत-चीन सीमा विवाद और आपस में अविश्वास
लद्दाख सीमा पर तनाव और आपसी प्रतिस्पर्द्धा के कारण भारत और चीन के बीच सुरक्षा व कूटनीतिक स्तर पर गहरा अविश्वास है. भारत किसी ऐसे ब्लॉक का हिस्सा नहीं बनना चाहता है, जिसका नेतृत्व चीन के हाथों में पूरी तरह चला जाए.
क्योंकि चीन और रूस जहां स्पष्ट रूप से 'अमेरिका-विरोधी' एजेंडे पर आगे बढ़ना चाहते हैं. वहीं भारत 'गैर-पश्चिमी' नीति पर चलता है. भारत के अमेरिका, यूरोप और जापान के साथ बेहद मजबूत व्यापारिक और तकनीकी रिश्ते हैं, जिन्हें वह रूस या चीन के लिए दांव पर नहीं लगाएगा.
रूस-चीन का कैसे भारत से अलग विचार
बता दें, शुरुआती दौर में BRICS को चीन और रूस के प्रभुत्व वाला मंच माना जाता था. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में भारत इस ग्रुप का एक अत्यंत महत्वपूर्ण संतुलन-केंद्र बन गया है. चीन और रूस शुरुआत में BRICS को अमेरिका व पश्चिमी देशों के खिलाफ एक 'अमेरिका-विरोधी' मंच बनाना चाहते थे. भारत ने मजबूती से रुख अपनाया कि BRICS पश्चिम-विरोधी नहीं, बल्कि गैर-पश्चिमी मंच होना चाहिए. भारत के इस रुख का समर्थन ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसे सदस्यों ने भी किया.
इसके अलावा चीन, भारत और रूस का अमेरिका के खिलाफ एक एकीकृत 'सैन्य या ब्लॉक-स्तरीय गठजोड़' बनना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं दिखता. भारत BRICS में रहते हुए भी अमेरिका के साथ संतुलन बनाए रखेगा, ताकि कोई भी एक महाशक्ति वैश्विक व्यवस्था पर अपना एकाधिकार न जमा सके.
BRICS बैंक (न्यू डेवलपमेंट बैंक- NDB) के गठन में भारत की अहम भूमिका रही और इसके पहले अध्यक्ष भारत के के. वी. कामथ बनाए गए थे. भारत ने BRICS के मंच पर अपने डिजिटल मॉडल जैसे कि UPI, Aadhaar, DigiLocker को वैश्विक स्तर पर बढ़ावा दिया, जिससे विकासशील देश भारत के तकनीकी समाधानों को अपनाने के लिए उसकी ओर देख रहे हैं.
भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था है. BRICS के भीतर भारत का आर्थिक और आर्थिक-नीतिगत वजन चीन के एकाधिकार को चुनौती देने के लिए सबसे मजबूत आधार प्रदान करता है. BRICS के विस्तार के समय भारत ने यह सुनिश्चित किया कि केवल उन्हीं देशों को एंट्री मिले जो गुटनिरपेक्षता और वैश्विक संतुलन में विश्वास रखते हों, ताकि यह मंच किसी एक देश का मोहरा न बने.
इंडोनेशिया का BRICS में शामिल होना
इंडोनेशिया का BRICS में शामिल होना संगठन के विस्तार की रणनीति का हिस्सा है. BRICS के 2023 जोहान्सबर्ग सम्मेलन के दौरान ही इंडोनेशिया के नाम पर सहमति बनी थी. हालांकि अपनी घरेलू चुनावी प्रक्रियाओं के कारण इंडोनेशिया ने औपचारिक रूप से 2025 की शुरुआत में इसमें अपनी पूर्ण सदस्यता दर्ज कराई. इंडोनेशिया दक्षिण-पूर्व एशिया (ASEAN) की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है.
अमेरिका की ब्रिक्स पर नजर
अमेरिका BRICS के जरिए चीन के बढ़ते वैश्विक आर्थिक दबदबे से चिंतित है, जबकि भारत खुद BRICS के भीतर चीन के एकाधिकार को नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभाता है. अमेरिका चाहता है कि भारत BRICS की अमेरिका-विरोधी नीतियों पर अंकुश लगाए, वहीं BRICS के सदस्य भारत के आर्थिक वजन का लाभ उठाना चाहते हैं.