घर खरीदने वालों के पैसे की सुरक्षा को लेकर उत्तर प्रदेश रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी (UP-RERA) ने बिल्डर्स के लिए नियमों को और स्पष्ट कर दिया है. अब हर रियल एस्टेट प्रोजेक्ट के लिए बिल्डर्स को तीन अलग-अलग बैंक खाते रखना जरूरी होगा. खरीदारों से मिलने वाली रकम पहले कलेक्शन अकाउंट में जमा होगी. इसके बाद इसका 70 फीसदी हिस्सा रोजाना सेपरेट अकाउंट में और 30 फीसदी ट्रांजैक्शन अकाउंट में ट्रांसफर किया जाएगा.
UP-RERA ने 13 जुलाई 2026 तक किए गए 12 संशोधनों को एक साथ मिलाकर नया फ्रेमवर्क तैयार किया है. इसका उद्देश्य बिल्डर, खरीदार और रियल एस्टेट एजेंट से जुड़े प्रावधानों को एक जगह उपलब्ध कराना है, ताकि अलग-अलग संशोधनों में बिखरे नियमों को समझना आसान हो सके.
प्रोजेक्ट के पैसे के लिए तीन बैंक खाते जरूरी
नए फ्रेमवर्क के तहत हर प्रोजेक्ट के लिए कलेक्शन अकाउंट, सेपरेट अकाउंट और ट्रांजैक्शन अकाउंट रखना होगा. प्रोजेक्ट से जुड़े लोन की रकम भी सेपरेट अकाउंट में जमा करनी होगी. इन खातों का हर वित्त वर्ष ऑडिट कराया जाएगा और ऑडिट रिपोर्ट UP-RERA की वेबसाइट पर अपलोड करनी होगी.
खरीदारों से प्रोजेक्ट के लिए कैश पेमेंट लेना भी प्रतिबंधित रहेगा. इससे प्रोजेक्ट में आने वाले पैसे का रिकॉर्ड ज्यादा पारदर्शी रखने और फंड के इस्तेमाल पर नजर रखने में मदद मिलेगी.
बिल्डर को देनी होंगी जरूरी जानकारियां
प्रमोटर को प्रोजेक्ट से जुड़े आर्किटेक्ट, इंजीनियर और चार्टर्ड अकाउंटेंट की जानकारी देनी होगी. इसके अलावा कस्टमर रिलेशनशिप मैनेजर और संपर्क नंबर या टोल-फ्री नंबर भी उपलब्ध कराना होगा. QPR यानी क्वार्टरली प्रोग्रेस रिपोर्ट के साथ संबंधित प्रोफेशनल्स के जरूरी सर्टिफिकेट भी जमा करने होंगे. कंपनी के डायरेक्टर, पार्टनर या ट्रस्टी में बदलाव, वित्तीय जानकारी और इनकम टैक्स रिटर्न से संबंधित जरूरी अपडेट भी UP-RERA वेबसाइट पर दर्ज करने होंगे.
घर खरीदारों को क्या मिलेगी सुरक्षा?
नए नियमों के तहत बिल्डर को UP-RERA के निर्धारित फॉर्मेट में ऑफर ऑफ पजेशन जारी करना होगा. वहीं, अनरजिस्टर्ड प्रोजेक्ट में प्रॉपर्टी खरीदने वाले लोग भी कुछ जरूरी अतिरिक्त जानकारी उपलब्ध कराकर UP-RERA में ऑनलाइन शिकायत दर्ज करा सकेंगे. प्रॉपर्टी जिसके नाम अलॉट है, उसकी मृत्यु के बाद परिवार के सदस्यों के नाम प्रॉपर्टी ट्रांसफर करने पर फीस ₹1,000 निर्धारित की गई है. परिवार से बाहर प्रॉपर्टी ट्रांसफर होने की स्थिति में यह शुल्क ₹25,000 तक हो सकता है.
एड में दिखानी होगी पूरी जानकारी
बिल्डर और रियल एस्टेट एजेंट को प्रोजेक्ट के एडवर्टाइजमेंट और ब्रोशर में जरूरी जानकारी स्पष्ट रूप से दिखानी होगी. इसमें UP-RERA रजिस्ट्रेशन नंबर, वेबसाइट, QR कोड, कलेक्शन अकाउंट की जानकारी, प्रोजेक्ट लॉन्च की तारीख और एजेंट का रजिस्ट्रेशन नंबर शामिल होगा. एडवर्टाइजमेंट में इस्तेमाल किया जाने वाला प्रोजेक्ट नाम भी स्वीकृत प्लान में दर्ज नाम से मेल खाना चाहिए. इसका उद्देश्य संभावित खरीदारों को प्रोजेक्ट के बारे में सही और सत्यापित जानकारी उपलब्ध कराना है.
रियल एस्टेट एजेंट के लिए भी नए नियम
रियल एस्टेट एजेंट को रजिस्ट्रेशन और रिन्यूअल के लिए ट्रेनिंग सर्टिफिकेट देना होगा. उन्हें अपने लेनदेन का सही रिकॉर्ड रखना होगा और हर तीन महीने में ट्रांजैक्शन से जुड़ी जानकारी जमा करनी होगी. रिपोर्टिंग में देरी पर शुल्क का भी प्रावधान है. QPR देर से जमा करने पर ₹15,000, सालाना ऑडिट रिपोर्ट में देरी पर ₹25,000 और एजेंट की तिमाही रिपोर्ट देर से जमा करने पर ₹10,000 शुल्क देना होगा.
IFMS के पैसे का भी होगा हिसाब
खरीदारों से लिया गया IFMS यानी इंटरेस्ट फ्री मेंटेनेंस सिक्योरिटी भी अलग बैंक खाते में रखना होगा. कॉमन एरिया की मेंटेनेंस की जिम्मेदारी रेजिडेंट्स एसोसिएशन को सौंपे जाने पर पूरी रकम उसे ट्रांसफर करनी होगी. इस फंड का इस्तेमाल केवल कॉमन सुविधाओं के रखरखाव, मरम्मत और जरूरी बदलाव के लिए किया जा सकेगा. इसके लिए उचित रिकॉर्ड रखना और ऑडिट कराना भी जरूरी होगा.
घर खरीदारों के लिए क्या बदलेगा?
अगर आप घर खरीदने की तैयारी कर रहे हैं या पहले से किसी प्रोजेक्ट में फ्लैट बुक कर चुके हैं, तो नए नियम आपके लिए महत्वपूर्ण हैं. अब आप UP-RERA के जरिए प्रोजेक्ट की ज्यादा जानकारी, प्रोग्रेस रिपोर्ट और ऑडिट से जुड़े अपडेट देख सकेंगे. साथ ही, प्रोजेक्ट में खरीदारों से मिलने वाले पैसे के इस्तेमाल को लेकर भी ज्यादा स्पष्टता होगी. पजेशन किस प्रक्रिया के तहत दिया जाएगा और किसी विवाद की स्थिति में शिकायत कहां दर्ज करनी है, इसकी जानकारी भी ज्यादा व्यवस्थित तरीके से उपलब्ध होगी.
अटके प्रोजेक्ट्स के लिए भी प्रावधान
UP-RERA ने अटके हुए प्रोजेक्ट्स से जुड़े नियमों को भी स्पष्ट किया है. इनमें प्रोजेक्ट रजिस्ट्रेशन के एक्सटेंशन या वापसी और जरूरत पड़ने पर प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी दूसरे प्रमोटर को ट्रांसफर करने जैसे प्रावधान शामिल हैं.