सवाई माधोपुर के गंगापुर सिटी सदर थाना पुलिस ने करीब 26 साल पहले मर चुके व्यक्ति के खिलाफ जारी स्थायी गिरफ्तारी वारंट के आधार पर लखनऊ सुरक्षा में तैनात सिपाही को गिरफ्तार कर ले गई और जेल भेज दिया. 166 दिनों तक सिपाही जेल में रहा. एक अगस्त को उसे रिहा किया गया. हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने मामले में पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाते हुए सिपाही को राहत दी है और पुलिस को भविष्य में अधिक सावधानी बरतने की सलाह दी है, ताकि किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का हनन न हो.
15 फरवरी को हुई थी गिरफ्तारी
जानकारी के मुताबिक जिस अखिलेश त्रिपाठी के खिलाफ राजस्थान में गिरफ्तारी वारंट जारी था, वह अलीगंज, लखनऊ का रहने वाला था. उसका मूल निवास देवरिया में था. उसने अलीगंज के पते पर एक फर्म पंजीकृत कराई थी. इसी फर्म के जरिये धोखाधड़ी किए जाने के मामले में राजस्थान के सवाई माधोपुर में केस दर्ज हुआ था. वारंट में दर्ज अखिलेश के पिता का नाम विश्वनाथ था. खास बात यह है कि वारंट वाला अखिलेश त्रिपाठी 17 सितंबर 1998 को मर चुका था.
इसके बावजूद उसके नाम से मिलती-जुलती जानकारी के आधार पर राजस्थान पुलिस ने विकासखंड गोमतीनगर निवासी सिपाही अखिलेश त्रिपाठी को 15 फरवरी 2026 को लखनऊ से गिरफ्तार कर लिया. अगले दिन 16 फरवरी को उसे जेल भेज दिया गया. जिस सिपाही की गिरफ्तारी हुई, वह मूलरूप से अंबेकर नगर का रहने वाला है.
बताने पर नहीं मानी राजस्थान पुलिस
अखिलेश ने बताया कि गिरफ्तारी के दौरान ही उन्होंने पुलिस से कहा था कि उनको कोई गलतफहमी हुई है. उनका किसी भी तरह के धोखाधडी केस से संबंध नहीं है, इसके बावजूद पुलिस ने उनकी एक न सुनी. नाम एक था, लेकिन पिता का नाम अलग-अलग था. फिर भी पुलिस ने जांच नहीं की थी. हाईकोर्ट में उनकी ओर से बताया गया कि शुरुआत से ही उनका बचाव यह रहा कि गिरफ्तारी वारंट में जिस व्यक्ति का नाम और पहचान है, वह वे नहीं हैं.
वारंट में उनके पिता का नाम भी दर्ज नहीं था. अदालत ने भी माना कि जारी वारंट और वर्तमान आवेदक के बीच कोई संबंध नहीं था. फिलहाल एसपी ने भी मामले में गलती मानते हुए माफी मांगी गई है. मामले की सुनवाई के दौरान सवाई माधोपुर की पुलिस अधीक्षक ज्येष्ठा मैत्रेयी भी अदालत में पेश हुई. उन्होंने स्वीकार किया अनुरोध पर संबंधित मजिस्ट्रेट अदालत उन्हें पहले ही रिहा कर चुकी थी.
छूटने के बाद नहीं हो रही है नियुक्ति
अखिलेश ने बताया कि जेल से छूटने के बाद वह सीधे लखनऊ आए. वह अपने कमांडेंट से मिले. फिर उन्हें ज्वाइनिंग नहीं कराई गई. इसके बाद वह डीआईजी से भी मिले, लेकिन वहां से भी ज्वाइनिंग नहीं कराई गई है. ऐसे में अखिलेश बस इधर से उधर चक्कर लगा रहे हैं. उनके पास हाईकोर्ट के आदेश से लेकर सभी दस्तावेज उपलब्ध हैं.