इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट बैंक ऑफ इंडिया (IDBI Bank) में अपनी हिस्सेदारी बेचने की सरकार की योजना के बीच इसके कर्मचारियों और पेंशनर्स की चिंताएं बढ़ गई हैं. बैंक यूनियनें इस डील का विरोध कर रही हैं और इसे निजीकरण के साथ विदेशीकरण का कदम बता रही हैं. इस बीच, डिपार्टमेंट ऑफ इन्वेस्टमेंट एंड पब्लिक एसेट मैनेजमेंट (DIPAM) के सेक्रेटरी अरुणीश चावला ने भरोसा दिलाया है कि IDBI बैंक के मौजूदा कर्मचारियों की सेवा शर्तें पूरी तरह सुरक्षित रहेंगी. उन्होंने कहा कि पेंशनर्स के पेंशन लाभों की सुरक्षा का भी पूरा ध्यान रखा जाएगा.
बिजनेस टुडे को दिए एक इंटरव्यू में अरुणीश चावला ने कहा कि IDBI बैंक के मौजूदा कर्मचारियों की सेवा शर्तों में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि बैंक के पेंशनर्स के हितों की सुरक्षा की जाएगी और इसके लिए एक अलग पेंशन फंड रखा गया है. चावला ने कहा, 'सेवा शर्तें पूरी तरह सुरक्षित रहेंगी. बैंक में पेंशनर्स भी हैं. उनके पेंशन लाभ सुरक्षित रहेंगे और इसके लिए एक अलग पेंशन फंड निर्धारित किया गया है.'
बैंक संगठनों की चिंताओं पर उन्होंने कहा कि कर्मचारियों और पेंशनर्स को डरने की जरूरत नहीं है. सरकार बैंक की स्ट्रेटेजिक रिस्ट्रक्चरिंग एक रनिंग बिजनेस के रूप में कर रही है. इसका मतलब है कि IDBI बैंक का कामकाज जारी रहेगा और यह बोर्ड के अधीन संचालित कंपनी बना रहेगा. कर्मचारियों के साथ बातचीत की जिम्मेदारी भी बैंक मैनेजमेंट के पास बनी रहेगी.
कब पूरा होगा IDBI बैंक का डील?
अरुणीश चावला के मुताबिक, IDBI बैंक में रणनीतिक हिस्सेदारी बिक्री की प्रक्रिया चालू वित्त वर्ष में पूरी करने का लक्ष्य है. हालांकि, शेयर खरीद समझौते पर हस्ताक्षर भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ओर से बोली लगाने वाले खरीदार को मंजूरी मिलने के बाद ही किए जाएंगे. केंद्र सरकार ने IDBI बैंक में 60.72 फीसदी हिस्सेदारी बेचने की योजना को मंजूरी दी है. इस सौदे में कनाडा की कंपनी फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स (Fairfax Financial Holdings) का नाम सामने आया है. हालांकि, सौदे की प्रक्रिया और अंतिम शर्तों को लेकर कर्मचारियों की यूनियनों की चिंताएं बनी हुई हैं.
बैंक संगठन क्यों कर रहे हैं विरोध?
केंद्र सरकार की हिस्सेदारी बिक्री की योजना का बैंकिंग और बीमा क्षेत्र के कर्मचारी संगठन विरोध कर रहे हैं. केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी के तुरंत बाद IDBI बैंक के अधिकारियों और कर्मचारियों के संयुक्त मंच ने इस प्रस्ताव पर आपत्ति जताई थी और सरकार से फैसले की समीक्षा करने की मांग की थी. संगठन ने कहा था कि जनता को इस बात का प्रमाण मिलना चाहिए कि किसी राष्ट्रीय संपत्ति को बेहद कम कीमत पर नहीं बेचा जा रहा है.
यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस (UFBU) ने भी इस कदम का विरोध किया है. सात बैंक यूनियनों वाले इस संगठन का दावा है कि वह बैंकिंग क्षेत्र के करीब 90 फीसदी कर्मचारियों का प्रतिनिधित्व करता है. UFBU ने इस फैसले को केवल निजीकरण नहीं, बल्कि 'विदेशीकरण' भी बताया है.
काली पट्टी बांधकर विरोध करेंगे कर्मचारी
IDBI बैंक की हिस्सेदारी बिक्री के विरोध में UFBU ने अपने सदस्यों से 16 अक्टूबर को काली पट्टी बांधकर काम करने की अपील की है. संगठन का कहना है कि राष्ट्रीय महत्व के बैंक में विदेशी निवेशक को नियंत्रण सौंपने के फैसले पर दोबारा विचार किया जाना चाहिए. दूसरी ओर, सरकार का कहना है कि बैंक का रणनीतिक पुनर्गठन किया जाएगा और मौजूदा कर्मचारियों तथा पेंशनर्स के हितों की रक्षा की जाएगी. अब इस सौदे की अगली प्रक्रिया RBI की मंजूरी और शेयर खरीद समझौते पर निर्भर करेगी.