विदेशी निवेशकों ने चार महीने की लगातार बिकवाली के बाद जुलाई में भारतीय शेयर बाजार में फिर वापसी की. उन्होंने 20,200 करोड़ रुपये के शेयर खरीदे. अच्छे कॉरपोरेट नतीजों, मजबूत आर्थिक हालत और वैश्विक चिंताओं में कुछ नरमी आने से भारतीय शेयरों में उनकी दिलचस्पी फिर बढ़ी. विदेशी निवेशक मार्च से जून के बीच भारतीय शेयर बाजार से लगातार अपने पैसे निकाल रहे थे. उस दौरान ऊंची वैश्विक ब्याज दरों, भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं और शेयरों के महंगे वैल्यूएशन को लेकर चिंता बनी हुई थी.
विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (Foreign Portfolio Investors) की जुलाई की खरीदारी को इस संकेत के तौर पर देखा जा रहा है कि वे भारत को लेकर फिर पॉजिटिव रुख अपना रहे हैं. शेयर मार्केट से जुड़े लोगों का कहना है कि जून तिमाही के अच्छे कॉरपोरेट नतीजे, महंगाई के दबाव में नरमी और भारत का मजबूत आर्थिक माहौल विदेशी पूंजी को फिर बाजार में खींच लाने में सफल रहा.
पिछले कुछ महीनों में शेयरों के वैल्यूएशन में आई गिरावट ने भी उभरते बाजारों में ग्रोथ के मौके तलाश रहे वैश्विक निवेशकों के लिए भारतीय शेयरों को ज्यादा आकर्षक बनाया है. साथ ही, कमाई को लेकर बेहतर तस्वीर और देश की इकोनॉमिक ग्रोथ पर भरोसे ने भी विदेशी निवेशकों का रुख बदला है.
विदेशी इंवेस्टर्स का भारत में फिर बढ़ा भरोसा
वैश्विक वित्तीय बाजारों में उतार-चढ़ाव और भू-राजनीतिक जोखिम बने रहने के बावजूद भारत का शेयर मार्केट विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के लिए पसंदीदा ठिकाने के रूप में आगे रहा है. इसके पीछे देश की स्थिर आर्थिक वृद्धि, मजबूत घरेलू मांग और निवेश के अनुकूल नीतियों को वजह बताया गया है. जुलाई के दौरान घरेलू संस्थागत निवेशक (Domestic Institutional Investors) भी बाजार के लिए बड़ा सहारा बने रहे. उन्होंने भारतीय शेयरों में 35,099.25 करोड़ रुपये का निवेश किया.
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हाल के महीनों में उनकी लगातार खरीदारी (भारतीय शेयरों की खरीददारी) ने विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की बिकवाली (भारतीय शेयरों की ब्रिक्री) की भरपाई करने और बाजार में तेज उतार-चढ़ाव के दौरान स्थिरता देने में मदद की. घरेलू और विदेशी, दोनों तरह के संस्थागत निवेशकों की एक साथ भागीदारी से जुलाई में शेयर मार्केट का माहौल बेहतर हुआ. इससे भारत के कैपिटल मार्केट की मजबूती को लेकर भरोसा भी बढ़ा.
ये फैक्टर तय करेंगे विदेशी निवेशकों का रुख
शेयर मार्केट एनालिस्ट्स का मानना है कि आगे चलकर विदेशी निवेश का रुख वैश्विक घटनाक्रमों से प्रभावित रहेगा. इनमें अमेरिकी ब्याज दरों की दिशा, भू-राजनीतिक घटनाएं और दुनिया भर में जोखिम लेने की इच्छा शामिल है. देश के भीतर कॉरपोरेट कमाई की रफ्तार, महंगाई का रुझान और आर्थिक आंकड़े भी निवेशकों का रुख तय करने में अहम रहेंगे.
छोटी अवधि में एफपीआई का निवेश उतार-चढ़ाव वाला रह सकता है. फिर भी भारत की मजबूत अर्थव्यवस्था, निवेश के अनुकूल नीतियां, इंफ्रास्ट्रक्वर में बढ़ता निवेश और लॉन्ग टर्म ग्रोथ की संभावनाएं विदेशी निवेशकों को आकर्षित करती रह सकती हैं. ऐसे में जुलाई में विदेशी निवेशकों की वापसी को भारतीय शेयर मार्केट के लिए उत्साह बढ़ाने वाले संकेत के तौर पर देखा जा रहा है.