भारत के एविएशन सेक्टर में तरक्की के बीच, फेडरेशन ऑफ इंडियन पायलट्स (FIP) ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से एक स्वतंत्र और नई सिविल एविएशन अथॉरिटी (CAA) बनाने की गुजारिश की है. उनका तर्क है कि इंडस्ट्री के विस्तार के साथ तालमेल बिठाने के लिए देश के रेगुलेटरी ढांचे में सुधार की जरूरत है. यहां नेपाल, श्रीलंका, मालदीव का उदाहरण भी दिया गया है.
विस्तृत प्रस्ताव में, FIP के अध्यक्ष कैप्टन सीएस रंधावा ने कहा कि भारत, जो अब दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा डोमेस्टिक एविएशन मार्केट है, प्रमुख क्षेत्रीय अर्थव्यवस्थाओं के बीच एक अपवाद बना हुआ है क्योंकि यह अभी भी सिविल एविएशन मंत्रालय के एक अटैच्ड ऑफिस, डायरेक्टरेट जनरल ऑफ सिविल एविएशन (DGCA) पर निर्भर है.
इस प्रस्ताव में DGCA की जगह एक आधुनिक, स्वायत्त और कानूनी रेगुलेटर लाने की बात कही गई है, जिसके पास ज्यादा वित्तीय, प्रशासनिक और तकनीकी आजादी हो.
FIP ने कहा कि एविएशन सेक्टर आर्थिक विकास, व्यापार, पर्यटन और नैशनल कनेक्टिविटी में सबसे तेजी से योगदान देने वाले क्षेत्रों में से एक बन गया है. हवाई यातायात के लगातार विस्तार और एविएशन टेक्नोलॉजी के अधिक जटिल होने के साथ, उनका तर्क है कि सुरक्षा, दक्षता और कंज्यूमर राइट्स के उच्च मानकों को बनाए रखने के लिए भारत को एक आधुनिक, स्वतंत्र और पेशेवर रूप से प्रबंधित रेगुलेटरी ढांचे की जरूरत है.
बता दें कि भारत में सिविल एविएशन सेक्टर में पिछले दो दशकों में काफी बूम आया है. इस सेक्टर में अब 850 से अधिक विमानों का कमर्शियल बेड़ा है, जबकि यात्रियों की संख्या 239 मिलियन (23.9 करोड़) को पार कर गई है. ड्रोन और एडवांस्ड एयर मोबिलिटी जैसे उभरते क्षेत्रों ने भी एविएशन रेगुलेशन की जटिलता को बढ़ा दिया है.
FIP ने कहा कि DGCA ने सेक्टर को रेगुलेट करने में अहम भूमिका निभाई है, लेकिन सिविल एविएशन मंत्रालय के एक अटैच्ड ऑफिस के रूप में इसकी स्थिति ने प्रशासनिक स्वायत्तता, वित्तीय लचीलेपन, तकनीकी विशेषज्ञों की भर्ती और समय पर रेगुलेटरी निर्णय लेने में सीमाएं पैदा की हैं.
मौजूदा DGCA ढांचे में कमियां गिनाईं
प्रस्ताव में एक अलग सिविल एविएशन अथॉरिटी स्थापित करने की कई वजह गिनाईं गई हैं.
FIP ने कहा कि DGCA के पास सीमित प्रशासनिक स्वायत्तता है क्योंकि प्रमुख रेगुलेटरी निर्णयों के लिए मंत्रालय की मंजूरी की जरूरत होती है. इसकी वित्तीय शक्तियां सरकारी प्रक्रियाओं से बंधी हुई हैं, जबकि भर्ती और खरीद में लंबी सरकारी प्रक्रियाओं का पालन करना पड़ता है.
प्रस्ताव में यह भी बताया गया है कि एविएशन सेक्टर के विशेषज्ञों को सरकारी नौकरी में लाना और उन्हें लंबे समय तक बनाए रखना मुश्किल है. सिविल एविएशन की निगरानी के लिए एयरलाइन कैप्टन, फ्लाइट ऑपरेशंस इंस्पेक्टर, एयरवर्दीनेस इंजीनियर, एयर ट्रैफिक मैनेजमेंट, ह्यूमन फैक्टर्स और थकान प्रबंधन जैसे क्षेत्रों के विशेषज्ञों की जरूरत होती है.
FIP के मुताबिक, सरकारी नौकरी की सैलरी एयरलाइन इंडस्ट्री में काम कर रहे अनुभवी विशेषज्ञों के मुकाबले कम हो सकती है. ऐसे में ज्यादा अनुभव और विशेषज्ञता रखने वाले लोगों को सरकारी नौकरी के लिए आकर्षित करना और उन्हें लंबे समय तक रोककर रखना मुश्किल होता है.